November 15, 2018

पिपलांत्री गांव में बेटियों के जन्म पर लगाए जाते हैं पौधे…

मोईनुद्दीन चिश्ती

पिपलांत्री, राजसमंद: बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ सिर्फ नारा न रहे जमीनी ह​किकत बने इसके लिए पिपलांत्री के  ग्रामीणों ने एक राह दिखाई है। लगातार गिरते लिंगानुपात को लेकर चल रहे तमाम समाजशास्त्रीय विश्लेषण और राजनी​तिक चेतना का ध्वजवाहक बना पिपलांत्री के ग्रामीण पर्यावरण और मानव के बीच के अन्योन्नाश्रय संबंध को पुख्ता करते हुए हम सब के लिए एक मिसाल बन गये हैं।
एक तरफ जहां कठोर कानूनी प्रावधान होने के बावजूद, कन्या-शिशु एवं कन्या-भ्रूण हत्या को लेकर कोई खास सफलता मिलती नहीं दिखी वहीं अपने अनूठे प्रयोग की बदौलत यहां के लोगों ने इस सपने को जमीन पर उतारा है और इससे साबित होता है कि बेटियों की रक्षा के लिए कागजी प्रावधानों के साथ-साथ जमीनी उपायों को अपनाने की भी सख्त जरूरत है।

चलते हैं​ पिपलांत्री की ओर
राजस्थान के राजसमन्द जिले के ‘आदर्श ग्राम’, ‘निर्मल गांव’ और ‘पर्यटन ग्राम’ कहलाने वाले पिपलांत्री गांव के पूर्व सरपंच और वर्तमान में जलग्रहण कमेटी के अध्यक्ष श्यामसुंदर पालीवाल ने अपने गांव की बेटियों के सुनहरे भविष्य का सपना कुछ अनूठे अंदाज़ में संजोया है। श्यामसुंदर ने सरकारी प्रयासों की साझेदारी में एक ठोस मुहिम की शुरूआत की है।
अन्ना ने दिखाई राह
‘किरण निधि’ नामक इस योजना की शुरुआत आचार्य महाश्रमण एवं प्रमुख समाजसेवी एवं गांधीवादी विचारक अन्ना हजारे ने की। श्यामसुंदर का स्पष्ट कहना है कि आज की तारीख में दहेज़ की कुप्रथा के चलते बेटियों को पराया धन समझा जाता है और बढ़ती बेरोजगारी से शिक्षित युवकों की भी बड़ी खेप खड़ी हो गई है। नवविवाहिताओं के लिए संकटों के बादल मण्डरा रहे हैं। आम ग्रामीण कभी भी दहेज देकर, दहेज दानवों की मांग पूरी पाता। कन्या वध, कन्या-भ्रूणहत्या का मूल कारण भी यही आर्थिक समस्या है। इस भयंकर तकलीफ से निजात पाने के लिए एक तरीके के रूप में श्यामसुंदर ने इन गांव वालों को एक युक्ति सुझाई। इन आर्थिक कष्टों को दूर करने के लिए नवजात कन्या के माता-पिता यदि बच्ची के जन्म पर पौधारोपण करके, उनका अठारह वर्ष तक पालन पोषण कर लें, तो कन्या के विवाह के लिए पर्याप्त अर्थव्यवस्था जुटाई जा सकती है।

अब समझने लगे हैं ग्रामीण

हालांकि शुरूआत में पालीवाल को इस योजना के क्रियान्वयन में काफ़ी भी अड़चनें आईं, लेकिन उन दिनों विभिन्न सरकारी योजनाओं के सफल क्रियान्वयन के लिए पिपलांत्री ग्राम पंचायत को कई पुरस्कार मिल चुके थे और गांव वालों में इसको लेकर बड़ा उत्साह था। ‘पंचायत आपके द्वार’ कार्यक्रमों के दौरान पालीवाल ने ढाणी-ढाणी तक पदभ्रमण करके नारी-शक्ति को जागरूक किया। महिला स्वयं सहायता समूहों एवं भामाशाहों ने कन्या-सुरक्षा की दृष्टि से इस योजना को अनूठा माना। देशभर में विभिन्न सामाजिक कुरीतियों के कारण आज हम सभी लोग कन्या वध एवं कन्या भू्रण हत्या की विडंबना झेल रहे हैं, वहीं पिपलांत्री ने इसका सटीक पर्यावरणपरक निराकरण ढूंढ निकाला।
बेटी बोझ नहीं वरदान
बेटी के भविष्य को लेकर चिंता करने की जरूरत नहीं, क्योंकि बेटी का खर्च परोटने वाले सौ-सौ पेड़ पनप रहे हैं। इस बारे में श्यामसुंदर पालीवाल बताते हैं, ‘‘हमारा प्रयास रहा है कि इस स्वावलम्बी गांव की बेटियां इतनी स्वावलम्बी हों कि आज की महंगाई को देखते हुए मां-बाप उनको बोझ नहीं समझें। इतने सालों तक नियमित रूप से ग्राम पंचायत की सांख्यिकी को समझते हुए मैंने यह पाया कि वर्ष में औसतन 120 प्रसूति होती है, जिसमें आधी अर्थात् 60 बच्चियां मान लें। गांव में बच्ची पैदा होने पर कन्या के माता-पिता से 10,000 रुपये के अलावा दानदाताओं-भामाशाहों से अनुरोध करके कन्या के नाम कुल 31,000 रुपये की एफ.डी. करवाई जाती है। इस प्रकार एफ.डी. में माता-पिता की भी सहभागिता रखी जाती है।

ग्राम पंचायत इसका पूरा लेखा-जोखा रखती है तथा अवधि पूरी होने पर एफ.डी. रिवाइज करवा दी जाती है। ‘किरण निधि’ योजना की सफलता से ग्रामवासी बेहद अभिभूत हैं। अब गांव में किसी भी प्रसूता को अपने गर्भस्थ शिशु के भविष्य को लेकर चिंता करने की कोई जरूरत नहीं पड़ती।

वर्ष 2006 से इस गाँव में बेटियों के नाम पौधे लगाये जा रहे हैं, जिनकी अब तक अनुमानित संख्या 66600 है, बेटियों के नाम पर गत 3 सालों से यह एफडी करवाई जा रही है। इस योजना को देशभर में अपनाए जाने की जरुरत है, साथ ही दानदाताओं को भी आगे बढ़कर पहल कर इस योजना को कामयाब बनाने की जरूरत है।

श्यामसुंदर पालीवाल ने ग्राम पंचायत स्तर पर प्रवर्तित इस अनूठी योजना में समय की मांग अनुसार कई विशिष्टताएं भी शामिल कर ली हैं, ताकि शिशु कन्या को घर-परिवार-विद्यालय में समुचित विकास का अवसर मिले। ग्राम पंचायत कन्या के जन्म पर ग्राम पंचायत में रजिस्ट्रार {जन्म-मृत्यु} के पास सूचना दर्ज करवाती है। इसी के साथ जननी सुरक्षा योजना एवं सरकारी योजना में अन्य लाभकारी बॉन्ड भरवाने के लिए समुचित औपचारिकता भी की जाती है।

पेड़ लगा बेटी का भविष्य गढ़ा
कन्या जन्म की खुशी में मां-बाप, दादा-दादी, नाना-नानी एवं रिश्तेदारों द्वारा 111 पौधे रोपे जाते हैं। इन पौधों की सुरक्षा का ध्यान ग्राम पंचायत रखती है, ताकि किसी भी कन्या के परिजनों की मेहनत बेकार न जाए। महिला स्वयं सहायता समूह, बुजुर्ग माताएं, बुआ-दादी वगैरह समय-समय पर इन पौधों की निराई-गुड़ाई करती रहती हैं। बड़ी होती बालिका को यह बोध कराया जाता है कि ये पौधे उसी के हम उम्र हैं और उसी के जन्म की यादगार हैं।
बेटी के नाम से चल रही है योजना
यह अनमोल कार्य ‘किरण निधि’ योजना के प्रणेता श्यामसुंदर पालीवाल की दिवंगत सुश्री किरण पालीवाल की स्मृति में चलाई जा रही योजना में किया जा रहा है। इस योजना को न सिर्फ राजसमंद जिले के पिपलांत्री गांव में, बल्कि समूचे जिले सहित देशभर और विदेशों में भी खूब ख्याति मिली है।
क्या कहते हैं पालीवाल
सामाजिक सरोकारों के पैरोकार श्यामसुंदर पालीवाल कहते हैं, ‘‘इस योजना के अनेक लाभ हैं। गावं में जन्म लेने वाली बच्ची जिसके माता-पिता निर्धन हों या अपनी बच्ची का पालन-पोषण करने में असक्षम हों, उन बच्चियों को चयनित कर उनके माता-पिता से 10000 रुपये और दानदाताओं से 21000 रुपये {कम या ज्यादा} यानी कुल 31000 रुपयों को 18-20 साल के लिये बैंक में एफ.डी. करवा दिया जाता है। इस एफ.डी. के बदले उस बच्ची के माता पिता से 10 रुपये के स्टाम्प पेपर पर एक शपथ पत्र लिखवाया जाता है, जिसमें निम्न शर्तें होती हैं –

● मेरे परिवार में कोई भी व्यक्ति भ्रूण हत्या नहीं करेगा।

● बेटी के जन्मदिन पर लगाये गए 111 पौधों एवं बेटी का पालन-पोषण समान रूप से किया जाएगा।

● मैं अपनी बेटी को शिक्षा से वंचित नही रखूंगा।

● मैं अपनी बेटी का बाल विवाह किसी भी परिस्थिति में नहीं करूंगा, न होने दूंगा।

● बेटी के बालिग होने पर यह रुपया उसकी उच्चशिक्षा अथवा शादी-ब्याह में खर्च करूंगा।

● बेटी के जन्म पर रोपे गए पेड़, जो अब वृक्ष बन चुके हैं, उन पर गांव का अधिकार होगा।

जिस बेटी के नाम पर दानदाता अथवा माता-पिता ने जो सहयोग राशि उपलब्ध करवाई थी, वह 18 से 20 वर्षों में कुछ लाख रुपये होगी, इस राशि से जवान हुई बच्ची को शादी-ब्याह अथवा उच्च शिक्षा में मदद मिलेगी। इतना ही नहीं, बेटी के जन्म पर लगाये गए पौधे अब पेड़ बन चुके होंगे। एक पेड़ की अनुमानित कीमत एक लाख रुपये भी मान लें तो 111 वृक्षों की कीमत एक करोड़ ग्यारह लाख रुपये हुई। हम एक करोड़ ग्यारह लाख रुपये भी न मानते हुए मात्र 25 लाख रुपये ही मान लें फिर भी उन वृक्षों से मिली ऑक्सीजन, वृक्षों की जड़ों से रोकी गई मिट्टी की कीमत का अंदाजा नहीं लगा सकते। एक पेड़ अपनी जड़ों में सालभर का पानी सोखकर रखता है। हम उस कीमत का भी अंदाजा नहीं लगा सकते।”

मदद को आगे आया बैंक

हाल ही में यूनियन बैंक ऑफ इंडिया ने अपने सीएसआर मद से 60 लाख रुपये की राशि गांव की 300 बेटियों की शिक्षा के लिए स्वीकृत की है, जिससे कक्षा 1 से 12 तक की बेटियों को शिक्षा से जुड़ी सभी सुविधाएं मुहैया करवाई जाएंगी। यह इस योजना की याब तक कि सबसे बड़ी जीत है।

(लेखक कृषि, पर्यावरण पत्रकार हैं। पिपलान्त्री गाँव के कार्यों पर 3 पुस्तकें लिखी हैं, चौथी प्रकाशनाधीन है)

 

About The Author

एक दशक से भी ज्यादा से पत्रकारिता में सकिय। संसद से लेकर दूर दराज के गांवो तक के पत्रकारिता का अनुभव। ग्रामीण समाज व जनसरोकार से जुड़े विषयों पर पत्र पत्रिकाओं में लेखन। अब पंचायत खबर के जरिये आपके बीच।

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