November 15, 2018

कृषि संकट पर संसद में 10 दिन के ​विशेष सत्र का हो आयोजन: पी साईनाथ

संतोष कुमार सिंह

नयी दिल्ली: जाने माने कृषि पत्रकार पी साईनाथ ने प्रभाष परंपरा न्यास द्वारा आयोजित कार्यक्रम में कृषि संकट और मीडिया पर आयोजित व्याख्यान को संबोधित करते हुए मांग किया कि देश इस वक्त खेती-बाड़ी के इतने बड़े संकट से गुजर रहा है कि इस पर चर्चा के लिए संसद का 10 दिन का विशेष सत्र बुलाया जाना चाहिए। तभी जाकर कोई समाधान निकल सकता है। उनका सुझाव है कि इसमें सिर्फ किसान, खेती और इससे जुड़े मामलों पर ही चर्चा हो।

इन मुद्दों पर हो चर्चा

  1. स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों पर चर्चा
  2. खेत मजदूर की आत्महत्याएं बढ़ गई हैं, लेकिन सरकारी परिभाषा तय नहीं है।
  3. कृषि मार्केट पर चर्चा हो, ताकि किसानों को उनकी फसल का वाजिब दाम दिलाने का रास्ता निकल सके
  4. बटाई पर खेती करने वालों को कैसे सहूलियत देंगे? अभी बटाई पर खेती लेने वालों को लोन नहीं मिलता, लोन उसी को मिलता है जिसके नाम जमीन का पट्टा है।
  5. अगर खेती में प्राकृतिक आपदा से नुकसान हुआ तो मुआवजा खेत के मालिक को होगा जिसके नाम जमीन का पट्टा है, बटाईदार को नहीं।
  6. महिला किसान के अधिकार पर भी चर्चा हो, उन्हें किसानों के बराबर अधिकार मिलना चाहिए
  7. आंकड़े जुटाने के तरीकों पर भी खुलकर चर्चा होनी चाहिए
  8. एग्रीकल्चर को पब्लिक सर्विस घोषित किया जाए जहां न्यूनतम मजदूरी तय की जाए
  9. गांवों में कर्ज की सबसे बड़ी वजह है स्वास्थ्य। कर्ज की सबसे बड़ी वजह महंगा इलाज कृषि में काम करने वालों के इलाज का खर्च सरकार उठाए
  10. किसानों से सीधे संसद भवन में बुलाया जाए जहां वो खुद अपनी समस्याओं के बारे में बताएं

पी साईनाथ ने कहा कि  मौजूदा कृषि संकट को पांच शब्दों में समझा जा सकता है। कॉरपोरेट हाईजैक ऑफ इंडियन एग्रीकल्चर। पॉलिसी बनाने वाले और राजनेता कृषि की अनदेखी इसलिए कर देते हैं क्योंकि बड़े अखबारों और चैनलों के लिए खेती और ग्रामीण भारत कोई खबर ही नहीं है।

पत्रकार साहब मेरी भैंस ले लो

अपने भाषण के दौरान पी साईनाथ कि जब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे उस वक्त  महाराष्ट्र के यवतमाल के एक किसान को प्रधानमंत्री पशुपालन योजना के तहत भैंस मिली। उन्हीं दिनों में उस घटना की रिर्पोटिंग के सिलसिले में वहां पहुंचा। बातचीत के दौरान एक किसान भैंस लेकर मेरे पास आ गया और बोला कि ये भैंस आप खरीद लो। मैंने कहा मैं तो पत्रकार हूं। तुम इस भैंस को क्यों बेच रहे हो, किसान थोड़ी पी रखी थी, उसने समझाया इस साधारण भैंस नहीं है, प्रधानमंत्री की भैंस है। मैंने कहा भाई भैंस तुम्हारे लिए है, उसने कहा सिरदर्द है। अगर तुम पत्रकार हो तो मेरी बात प्रधानमंत्री तक पहुंचा दो कि अगली बार सरकारी कर्मचारियों की सैलरी के बजाए उन्हें भी भैंस दी जाए। तब उन्हें किसानों के दर्द का अंदाज होगा।

साईनाथ ने इसी क्रम में एक और मामले की चर्चा की। उन्होंने कहा कि किसान को जबरन दुधारू पशु दिए जाने का एक और मामला यवतमाल की एक महिला किसान कमला बाई हुडे का है। उन्हें भी उसी योजना के तहत भैंस मिली थी। लेकिन हफ्तेभर के अंदर कमला बाई उसे बेचने निकल पड़ीं। उनसे पूछा कि वो इस भैंस को क्यों बेच रही हैं, तो कमला बाई ने कहा ये भैंस नहीं भूत है, पूरे परिवार से ज्यादा इसके खाने में खर्च आता है। उन्होंने वो भैंस अपने पड़ोसी को मुफ्त में पकड़ा दी पर पड़ोसी भी हफ्ते भर में वापस कर गया। अधिकारियों के मालूम ही नहीं है कि किसान की जरूरत क्या है? यही वजह है कि दिल्ली में योजना बनी कि किसानों की आय बढ़ाने के लिए उन्हें दुधारू पशु दिया जाए तो बहुत से लोगों को बिना सोचे समझे भैंस दे दी गई, जबकि हर किसान पशुपालन में भी पारंगत हो ऐसा जरूरी नहीं है। हर किसान की जरूरतें और कौशल अलग होता है। लेकिन सरकारी अधिकारी इसे नहीं समझते।

आत्महत्या का आंकड़ा छुपाने की नई तरकीब

किसानों की आत्महत्याओं की वजह से होने वाली बदनामी  से बचने के लिए राज्य और केंद्र शासित राज्यों की सरकारों ने इसके आंकड़े जुटाने का तरीका ही बदल दिया है। जैसे 2011 में 6 राज्यों ने रातोंरात घोषित कर दिया कि उनके यहां किसानों की आत्महत्याएं खत्म हो गई हैं। इसका मतलब ये माने की भारत किसानों के लिए स्वर्ग बन गया है। 2014 में किसानों की आत्महत्या गणना की तौर तरीके बदल दिए गये हैं ताकि बाजी​गरी के जरिए जमीनी हकिकत छुपाई जा सके।

मीडिया की भूमिका

मीडिया की भूमिका पर चर्चा करते हुए साईनाथ ने कहा कि मौजूदा कृषि संकट को पांच शब्दों में बताया जा सकता है। कॉरपोरेट हाईजैक ऑफ इंडियन एग्रीकल्चर। पॉलिसी बनाने वाले और राजनेता कृषि की अनदेखी इसलिए कर देते हैं क्योंकि बड़े अखबारों और चैनलों के लिए खेती और ग्रामीण भारत कोई खबर ही नहीं है। देश में कृषि संकट इतना बड़ा है लेकिन मीडिया को इस संकट की विकरालता का अंदाजा ही नहीं है। किसानों की आत्महत्याओं के बारे में मीडिया की जानकारी बहुत कम है। ज्यादातर बड़े अखबारों और चैनलों में कृषि के लिए संवाददाता ही नहीं है। इसी तरह अखबारों ने श्रमिकों के लिए अलग से कोई संवाददाता नहीं रखा हुआ है।

प्रभाष जोशी के जन्म दिन पर आयोजित कार्यक्रम में पी साईनाथ द्वारा दिये गये भाषण का संपादित अंश..समाप्त।

 

About The Author

एक दशक से भी ज्यादा से पत्रकारिता में सकिय। संसद से लेकर दूर दराज के गांवो तक के पत्रकारिता का अनुभव। ग्रामीण समाज व जनसरोकार से जुड़े विषयों पर पत्र पत्रिकाओं में लेखन। अब पंचायत खबर के जरिये आपके बीच।

Related posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *