August 20, 2019

बंद होठों की चीत्कार ‘धुमकुड़िया’

जीतेन्द्र सिंह
धुमकुड़िया नागपुरिया भाषा में बनी फिल्म लीक से हट कर बनाई गयी है,जो निर्देशक की जीवन में प्राप्त अनुभवों से बनी है। यह फिल्म स्थानीय स्तर पर अपने समाज की बात कहती है,लेकिन उसका प्रभाव पुरे विश्व के आदिवासियों के लिए समानांतर रूप से सामान्य हो जाता है।
‘धुमकुड़िया’ झारखंड के आदिवासियों लड़कियों की तस्करी एवं झारखंड राज्य की आदिवासियों के साथ छल की कहानी बताती है। सीधे-साधे ग्रामीण लोग परिस्थितियों वश अपनी बात कह नहीं सकते और जो उनके अगुआ बने हुए है जो इन्हीं आदिवासियों के बीच पैदा हुए लोग है। लेकिन वह भी स्वार्थ वश उनकी बातें अपने फायदे के लिए उनकी बातें भिन्न भिन्न तरीकों से उठा उसे समाप्त कर दीकुओं के दलाल बने हुए है ।


सच्ची घटनाओं पर आधारित इस फिल्म की नायिका रिशु ​हॉकी खिलाड़ी बनने का सपना लिए गांव छोड़ती है और बुधुआ नाम के मानव तस्कर के हाथों नायिका रिशु अपनी बहन के पास रांची आती है। अपनी जीजा की सहमति पाकर ​हॉकी प्रशिक्षण पाने दिल्ली चली जाती है। वहीं से बुधुआ उसके जीजा और रिशु साथ-साथ वहां की जन जीवन की कथा अपने अपने तरीके से शुरू हो जाती है। फिल्म में दर्शकों के सामने भिन्न-भिन्न तरीके से चरित्रों के माध्यम से झारखंड की विवशता और मजबूरी की कहानी दिखाई देने लगती है।
नायिका रिशु अपने विरोध को स्वर नहीं दे पाती लेकिन उसकी खामोशी और प्रायः रोज यौन उत्पीड़ित होते अपनी ही पत्थरायी आँखों से देखती रह जाती है। उधर दलाल बन चुका बुधुआ अपने लोगों की शोषण पर गुस्से में चीखता है, लेकिन उसकी चीख अनेक सुविधाओं की प्राप्ति के कारण दबी सुनायी देती है। जीजा कुछ पाने की आकांक्षा न इधर न उधर वाली दुविधा की स्थिति में जीने लगता है। लेकिन फिल्म में दर्शकों को रिशु की पत्थरायी आँखें, उसके जीजा और मां की छटपटाहट के साथ बुधुआ की दबी चीख-यंत्रणा जरूर सुनायी देने लगता और फिल्म में अपनी पूरी यंत्रणा कथा कह जाती है।


युवा निर्देशक नंदलाल नायक सहजता से पूरे झारखंड की औरतों की एवं समाज की तस्वीर कम संवाद और ज्यादा चित्रों में प्रवाह रूप से झारखंड की छवि आंकते है।इस फिल्म को देखकर आप महसूस करने नहीं बच सकते है। यह फिल्म नारीवादी न होकर आदिवासी औरतों की यथा​र्थ की फिल्म बनती है ।


जहां आजकल की ज्यादा फिल्मों से हमेशा केन्द्रीय कंटेंट गायब रहते है। वहीं ‘धुमकुड़िया’ औरतों की तस्करी जैसी कंटेंट को रखते हुए चलचित्र की भाषा , चरित्रों की विदग्धता, स्थितियों, परिवेश की गहन परतों को भी सामने लाते हुए झारखंड की आंतरिक कथा कहते हुए जीवंत और ज्वलंत प्रश्नों को उठाती है। नागपुरिया भाषा में बनी यह फिल्म समानांतर फिल्मों कि श्रृंखला में खड़ी होकर बेबाकी से विचार करने पर मजबूर करती है।
इस फिल्म की फोटोग्राफी सत्यजीत राय फिल्म इंस्टीट्यूट के पास आउट रूपेश कुमार ने किया है ,जिसका संपादन प्रकाश झा ने किया है। झारखंड के लोकगायक पद्मश्री मुकुंद नायक जी ने इस फिल्म की संगीत दिया है।इस फिल्म में रिकंल कच्छप, प्रद्युम्न नायक, गीता गुहा,सुब्रत दत्ता और राजेश जैश ने अभिनय किया है। निर्माता सुमित अग्रवाल और निर्देशक नंदलाल नायक के निर्देशन में बनी यह फिल्म अपनी भाषा में रचनात्मक तटस्थता को संभव बनाती है।

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