December 16, 2019

मेरा गांव, मेरी स्मृतियों का बगीचा

संजय राय,दिल्ली ब्यूरो प्रमुख
उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले में महर्षि दुर्वासा की तपोभूमि से गुजरने वाली तमसा और मंजुषा नदियों के संगम पर बसा एक छोटा-सा गांव है दुबैठा। मेरे जीवन के शुरुआती सोलह वर्ष इसी गांव की हवा, पानी और मिट्टी में बने। विशाल घर, घर के सामने खुले मैदान जैसा दुआर और खलिहान, उसके आगे खेत और फिर जंगल और जंगल से गुजरती तमसा नदी। आज पचास वर्ष की उम्र हो गयी, लेकिन शायद ही कोई ऐसा दिन बीता हो जब मुझे गांव की याद न आई न हो। गांव की यादों के साथ जागना और उसी की यादों को लेकर सोना। बीच में शहर के सारे जंजाल। यही मेरी दिनचर्या थी, है और जीवन के अंत तक रहेगी, ऐसा मेरा विश्वास है।

मेरी स्मृतियों में बसे बगीचा में आमों की मिठास है, अमरूद का कसैलापन है, करौने और नींबू की खटास है, शहतूत का रसीलापन है और इन सबके अलावा न जाने क्या-क्या है। कुछ बिलकुल स्पष्ट, कुछ धुंधला, कुछ मटमैला तो कुछ ऐसा भी है जिसे बता नहीं सकता। इस बगीचे में अब कुछ बूढ़े आम बचे हैं। बिलकुल अकेले। एक दौर वह था जब इन आमों का साथ निभाते थे बगीचे के एक कोने में लगे नरकट, उसके बगल में खड़ा करौना, करौने के बगल में शहतूत, उसी के पास लगे कटहल के पेड़, हरी चाय, हल्दी, सूरन, अदरक, नींबू, अमरूद, सोटा और लाठी बनाने के लिए दुबहन, अरवी, बंडा और केला के हरे-भरे पेड़। बचपन में इन आम के पेड़ों की जो छाया थी, वह कम हो गई है। इन पेड़ों की दशा साझे के बुज़ुर्गों से अलग नहीं हैं।

उन्नीस सौ चौरासी में संयुक्त परिवार बंटा और यहीं से शुरू हुई इस बगीचे के उजड़ने की कहानी। बगीचे के सभी पेड़-पौधे एक-एक करके चले गए, लेकिन जिद्दी आम के अपनी अपनी दुर्दशा के बावज़ूद खड़े रहे। इस बदहाली के बीच उनका साथ दे रहे हैं सदाबहार दूब, जंगली घास और कुछ कीड़े-मकोड़े। अब का बगीचा खंडहर है। बगीचे के चारों तरफ बेहया के पेड़ लगे थे। बेहया का पेड़ बिलकुल अपने नाम के अनुरूप ही होता है। इसके टूटे तने थोड़ी-सी भी नमी मिलने पर एक नए पेड़ में तब्दील हो जाते हैं। बेहया के पत्ते बिलकुल पान की तरह होते हैं, नरम और मुलायम। हम बच्चे इन पत्तों को तोड़कर पान बनाते और षरारत सूझती तो दोस्तों को खिलाने की कोशिश करते, लेकिन कोई खाता नहीं था। बड़े-बुज़ुर्गों ने समझा रखा था कि बेहया जहर होता है। उनकी इस नसीहत की परख के लिए हम बेहया के पत्ते तोड़कर जानवरों को खिलाते, वे इन्हें सूंघकर छोड़ देते। बगीचा पूरी तरह सुरक्षित रहे, इसीलिए चारों तरफ बेहया लगाया गया था। हमें यह बात काफी बड़ा होने पर समझ में आई। छोटी घंटियों के आकार का बेहया का फूल काफी आकर्षक लगता था। हम इन्हें तोड़कर सूंघते, लेकिन कोई खुशबू नहीं होती। फिर दूसरा फूल तोड़ते, सूंघते, फेंकते, फिर तीसरा, फिर चौथा, सूंघने और खुशबू न मिलने के बाद फूलों को फेंकने की लम्बी मशक्कत के बाद निष्कर्ष पर पहुंचते कि बेहया के फूल सिर्फ सुंदर दिखते हैं,उनमें खुशबू नहीं होती।

बगीचे में ऐसे सैकड़ों जंगली पौधे थे, जिनके फूलों को तोड़कर हम सुगंध पाने की लालसा में घंटों भटकते। नतीजा यह होता कि पास के खलिहान में कुछ ही घंटों के भीतर इधर-उधर बिखरे फूल ऐसे दिखते थे मानो किसी कलाकार ने एक विशाल कैनवास पर प्रकृति के रंगों को अनायास ही बिखेरकर एक ऐसी कलाकृति की रचना कर दी हो जो उसके जीवन की सर्वोत्तम कृति बन गयी हो। याद आती है इन फूलों के साथ खेलते समय हम बच्चों के मन में उमड़ने वाले उन भावों की, जिनके बारे में सोचना जीवन की यात्रा को हमेशा जीवंत रखेगा। वह उल्लास, वह खुशी, वह चहचहाहट, वह धमाचौकड़ी, वह मार, वह पिटाई, वह रूठना और वह मनाना-ये सभी स्मृतियां मेरे जीवन का वह अनमोल धन हैं, जिन्हें कुबेर की सारी सम्पदा से भी नहीं खरीदा जा सकता है। जीवन का वह स्वर्णिम समय दुबारा लौटकर नहीं आएगा, यह सोचकर मन दुखी होता है। लेकिन साथ ही यह सोचकर अच्छा लगता है कि ईश्वर ने मुझे स्वर्णिम स्मृतियों के जिस खजाने से रूबरू कराया, वही खजाना मेरे जीवन का अनमोल संबल है।

अभी भी मेरा अपने गांव से संबंध बना हुआ है। साल में दो-तीन बार गांव जाना होता है। खेती-बाड़ी की देखभाल, शादी-त्यौहार या किसी करीबी की तेरहवीं में। अब मेरे बचपन का गांव पूरी तरह बदल चुका है। इंसानों से ज्यादा पक्के मकान हो गए हैं। चहल-पहल गायब है। खलिहान ढूंढ़ने पर भी नहीं मिलते। पोखरे-तालाब पट गए हैं। गांव तक पक्की सड़क बन गयी है। गाय-बैल-भैंस पूरी तरह गायब हो चुके हैं। हर घर में दोपहिया वाहन है। कुछ के पास कार भी है। जंगल पूरी तरह कट कर खेत बन गए हैं। गोबर फेंकने और खेती करने में लोग अपनी तौहीन समझते हैं। बच्चे मोबाइल पर खेलकर दिनचर्या पूरी कर लेते हैं। शिक्षित लोग शहर पकड़ लिए हैं। गांव में सन्नाटा पसरा रहता है। नदी अपनी दुर्दशा पर रो रही है। आम का बगीचा ठूंठ होने के कगार पर है।
हमारे बचपन का पूरा गांव एक परिवार की तरह था। आपस में लड़ाई-झगड़ा भी होता था, लेकिन शाम को एक जगह बैठकर सारे गिले-शिकवे दूर कर लिए जाते थे। बाबा लोगों की पीढ़ी में अधिकतम सातवीं कक्षा तक लोग पढ़ पाए थे। इस पीढ़ी के बहुत कम लोग परदेश यानी किसी बड़े महानगर में काम करने के लिए गए थे। वे लोग बंबई या फिर कलकत्ता की मिलों में काम करते थे। उनकी कमाई का कुछ हिस्सा मनीआॅडर के रूप में हर महीने आता था। पोस्टमैन चौबेजी जब अपनी सायकिल से गांव में घुसते थे तो सबकी उत्सुकता बढ़ जाती थी। पूरा गांव चौबेजी को घेर लेता था।

चाचा लोगों की पीढ़ी बारहवीं और स्नातक तक पहुंची। इस पीढ़ी के लोगों में कई लोग शिक्षक बने जिनमें से कुछ मुंबई और कोलकाता में शिक्षक हुए। अगर चाचा लोगों की पीढ़ी में मुझे जीवन में आगे बढ़ने और कुछ करने के लिए प्रेरित किया मेरे ताऊजी उदयभानु राय ने। मैंने उनको देखा था, लेकिन कुछ भी याद नहीं है। कम उम्र में ही उन्होंने किसी कारणवश घर को हमेशा-हमेशा के लिए त्याग दिया और फिर कभी लौटकर आए नहीं। लेकिन उनके व्यक्तित्व और उनकी मेधाशक्ति का उदाहरण देकर हमें बताया जाता कि उनके जैसा व्यक्ति परिवार में कोई नहीं हुआ। दिव्य और सुदर्षन व्यक्तित्व था उनका। हिंदी, संस्कृत और अंग्रेजी भाषा पर जबरदस्त पकड़ थी उनकी। चाची के बक्से में एक बार कोलकाता के बिड़ला हाईस्कूल में पंडित जवाहर लाल नेहरू के साथ ताऊजी की फोटो ने मुझे प्रेरणा दी। मैंने निश्चय किया कि मैं भी अपने ताऊजी जैसा बनूंगा और समाज में अपना अलग स्थान बनाऊंगा। इसमें कितना सफल हुआ, यह मैं नहीं बता सकता।
बचपन के गांव और अब के गांव को देखकर मन बेहद दुखी हो जाता है। मैं अपने नए घर के सामने चारपाई पर बैठकर खुली आंखों से गांव की बची सुंदरता को अपनी स्मृतियों के खजाने में भरने की कोशिश करता हूं। इन्हीं खुली आंखों से अपने गांव के खोए वैभव को वापस लाने का सपना भी देखता हूं। जब रात में सोता हूं तो मुझे अपने बचपन का गांव सपनों में दिखाई देता है। वही पुराना बगीचा, वही खेत-खलिहान, वही जंगल, वही नदी और वही पुष्तैनी घर। बाबा, आजी, बुआ, गाय, बैल, भैंस, तालाब सब कुछ वैसा ही दिखता है जो मेरे बचपन में था। नींद टूटती है। मन को समझाता हूं। यह सब अब सपना है। मैं खुद को सौभग्यशाली समझता हूं कि मेरे पास देखने के लिए कम से इतना खूबसूरत सपना तो है।
(आज दैनिक के ​दिल्ली ब्यूरो प्रमुख)

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