April 04, 2020

धीरे-धीरे ही सही बदल रही है बालुडीह की तस्वीर

गुरुस्वरूप मिश्रा
‘बदल गया है गांव मेरा बदल गयी हैं गलियां भी, अब तो सूखी-सूखी हैं फूलों की ये कलियां भी। चौपालों में सूनापन है, चौराहे पर सन्नाटा है। हस्तशिल्प के पंखे गायब, मिलता अब तो फर्राटा है।’
यह कविता गांव-देहात की बदलती तस्वीर की हकीकत बयां कर रही है। गांव की चर्चा होते ही अक्सर कच्ची सड़कें, खेत-खलिहान में गुली-डंडा खेलते बच्चे और रात में ढ़िबरी के पास बैठकर पढ़ते छात्र जेहन में तैरने लगते हैं। अगर गांव को लेकर आपकी धारणा आज भी ऐसी ही है, तो इस भ्रम से बाहर निकलिए। कच्ची सड़कों की जगह पीसीसी सड़कों पर रफ्तार से बात करतीं गाड़ियां, साइकिल की जगह बाइक, पैदल की बजाए साइकिल से स्कूल जाती लड़कियां, हर घर में मोबाइल, अंधेरे में ढ़िबरी या लालटेन की जगह बिजली या सोलर लाइट की सुविधाएं-बदलते बालुडीह की यही कहानी है। यह गांव झारखंड के पलामू जिले के पांकी प्रखंड की नवडीहा पंचायत में है। पांकी-रांची मुख्य सड़क पर सोरठ गांव से पूर्व दिशा में नावाडीह के बाद यह गांव है। गांव में प्रवेश करते ही आहर के किनारे करीब 100 साल पुराना विशाल बरगद का पेड़ आपका स्वागत करता है।

वर्ष 1956 की बात है. बालुडीह में कुल 12 घर थे। दो घर ब्राह्मण, तीन घर कुम्हार (प्रजापति), दो घर यादव और पांच घर भुइयां जाति के थे। गांव में प्रवेश करते ही सबसे पहले ब्राह्मण टोला मिलता। दायीं ओर कुम्हार टोली और जंगल के समीप यादव और भुइयां टोली थी। इस छोटे से गांव की आबादी करीब 50 थी। सभी के मकान मिट्टी के थे। खेती-बारी ही आजीविका का मुख्य साधन था। पीने के पानी के लिए चार कुएं थे। गांव में कोई स्कूल नहीं था। काफी गरीबी थी। किसी के पास साइकिल तक नहीं थी। महज पांच सौ मीटर की दूरी पर घने जंगल थे। इसलिए यह गांव नक्सल प्रभावित रहा।
भुइयां टोली में पांकी के पूर्व मुखिया हरिद्वार साव का मिट्टी का भंडार घर था। उसी में वर्ष 1985 में स्कूल चलने लगा। 90 के दशक में स्व. रामनंदन मिश्र ने स्कूल के लिए उलगाड़ा गांव में जमीन दी। जिसमें राजकीय उत्क्रमित मध्य विद्यालय चलता है। इसमें चोरया, उलगाड़ा और बालुडीह, तीनों गांवों के बच्चे पढ़ने आते हैं, लेकिन इसमें सिर्फ एक पारा शिक्षिका हैं जो सभी बच्चों को पढ़ाती हैं। गांव में पहला चापाकल 1997 में लगा, आज चार चापाकल है। 2010 में गांव में आयी बिजली जो किसी चमत्कार से कम नहीं थी।

होली-दिवाली और दशहरे का आनंद ही कुछ अलग था। ग्रामीणों की टोली एक दूसरे के गांवों में जाकर होली खेला करती थी। अब वो होली नहीं रही। झारखंड बनने के बाद से गांव की सूरत धीरे-धीरे बदली, लेकिन कई जरूरी कार्य बाकी हैं। अब पलाश और आम के पेड़ खोजने से भी नहीं मिलते। पलाश के फूलों को चुनने और इनके झुरमुटों में छिपने-पकड़ने का खेल भी सपना हो गया। आज बच्चों में क्रिकेट का जुनून है। बरसात में कोई हाथ में चप्पल-जूता उठाकर चलता नहीं दिखता। ढ़िबरी बारने के दिन भी लद गये। पहले गांव में गिनती के पढ़े-लिखे लोग थे, अब हर घर में पढ़ा-लिखा मिल जायेगा। ऐसा भी नहीं है कि यह गांव विकसित हो गया। अभी कई अहम सुविधाओं की कमी है, लेकिन हाल के वर्षों में हुए जमीनी बदलाव भी कम नहीं हैं, सुकून देते हैं। धीरे-धीरे ही सही बालुडीह की तस्वीर बदल रही है।
जंगल से बिल्कुल सटे इस गांव के पांच मुहान (चौक) पर हर शाम चौपाल सजती थी। बुजुर्ग, पुरुष, महिलाएं और युवा जुटते थे और बतकही होती थी। गांव के सबसे बुजुर्ग 80 वर्षीय प्यारी प्रजापति कहते हैं कि 1952 में देववंश नारायण सिंह, मंगलपुर पंचायत के मुखिया थे। बुजुर्ग होने के बावजूद साइकिल से गांवों में घूम-घूम कर पंचायती किया करते थे। उनकी साइकिल देखने के लिए बच्चों की भीड़ लग जाती थी। 70 के दशक से गांव में कुछ बदलाव दिखने लगा। कुछ घरों में साइकिल आयी। फिर गांव में रेडियो बजने लगे। गांव में रोजगार का अभाव था। काम की तलाश में लोग पंजाब और दिल्ली जाने लगे थे। आज भी गांव के युवा रोजगार के लिए राज्य से बाहर जाने पर मजबूर हैं।

बालुडीह गांव के संजय नाथ मिश्रा बताते हैं कि 1976 में इस गांव में बाढ़ आयी थी। जंगल से काफी सटा होने और तालाबों के लबालब भर जाने से बरसाती पानी गांव के बीच वाली मिट्टी की सड़क को धोती हुई चोरया की तरफ निकल गया था। मिट्टी धुल जाने से पथरीली सड़क पर चलना काफी मुश्किल हो गया था। यादव टोला काफी ऊंचाई पर था, कच्ची संकरी सड़क करीब आठ फीट नीचे थी। इस कारण उन्हें काफी कठिनाई होती थी। इसी रास्ते से होकर गांव के लोग गाय-बकरी चराने जंगल जाते थे। बरसात के दिनों में गांव में प्रवेश करनेवाली मुख्य सड़क पर चलना भी कष्टदायक था। हाथ में चप्पल-जूता उठाकर काफी मशक्कत से लोग इस केवाल मिट्टी की सड़क पर चल पाते थे। अब भी मोरम-पत्थर वाली सड़क है, लेकिन लोगों को थोड़ी राहत है। गांव में मिनी आंगनबाड़ी केंद्र है। सेविका सिंधू मिश्रा बताती हैं कि यहां करीब 20 बच्चे हैं जिन्हें पोषाहार दिया जाता है। प्रभा देवी कहती हैं कि पहले इस गांव के लड़के-लड़कियां मिडिल स्कूल तक की पढ़ाई के लिए दो किलोमीटर दूर मंगलपुर पैदल जाते थे, चार किलोमीटर दूर हाईस्कूल, पांकी जाना होता था। अब स्थिति बदली है। लड़कियों को सरकार से साइकिल मिली है जिससे वे आराम से पढ़ाई करने पांकी जाती हैं।
शंभूनाथ मिश्रा बताते हैं कि जंगल से सटा होने के कारण बालुडीह नक्सल प्रभावित इलाका था। नब्बे के दशक में पांकी इलाके में नक्सलियों की तूती बोलती थी। उनके इशारे के बिना पत्ता तक नहीं हिलता था। पुलिस-नक्सली मुठभेड़ के बीच कई बार आम आदमी पीस जाता था। गांव वाले दो पाटों के बीच पीसने को मजबूर थे। आज भी स्थितियां ज्यादा नहीं बदली हैं, लेकिन पहले की अपेक्षा बेहतर है। बचपन में गांव में नक्सलियों का आना, भोजन के लिए रुकना, सुदूर जंगलों में जन-अदालत लगाना और आसपास में कई घटनाओं को अंजाम देना, आज भी याद आता है। गांव में उनके धमकने पर गजब की खामोशी छा जाती थी। भय के कारण सब कुछ राम भरोसे रहते थे।
(पत्रकारिता में मास्टर डिग्री। पंचायतनामा, रांची समेत कई पत्र-पत्रिकाओं में लेखन)

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