December 16, 2019

कहां गइल मोर गांव रे!

गांव छूटा तो लगभग सब कुछ गुम हो गया। ऐसा अब लगता है। यह अलग बात है कि गांव भी किसी लोभ में छोड़ा था और अब गांव की याद भी स्मृतियों में बसे गांव के लोभ के कारण है। बलम कलकत्ता निकल गए जैसे गीत में गांव छोड़ने की पीड़ा का साक्षात दर्शन होता है। पता नहीं, नथ वाली किस नवेली ने अपने पति को बेरोजगारी का ऐसा ताना दिया कि पति परदेस जाने को बाध्य हुआ और कवि को उसकी विरह व्यथा का सजीव चित्रण करने के लिए लिखना पड़ा- लागल झुलनिया के धक्का, बलम कलकत्ता निकल गये।
गांव जब भी जाता हूं एक आदमी पर मेरी खास निगाह रहती है। वह हैं मेरे घर के बगल के एक बड़े भाई-राजबल्लभ भैया। उनके नाम का हम अपभ्रंश उच्चारण करते हैं- राजबलम भैया। वर्ष 2008 में मेरी मां का निधन हुआ था और गांव में तकरीबन बीस दिन लगातार रहने का मौका मिला। यह वही वक्त था, जब दुनिया में मंदी पर कोहराम मचा था। लोगों की नौकरियां जा रही थीं, इनक्रीमेंट तो दूर, लोगों की सैलरी घटायी जा रही थी। बाजार में महंगाई से लोग और परेशान थे। मंदी हर शहरी के चेहरे पर खतरनाक लकीर की तरह तब देखी-समझी जा सकती थी।

राजबलम भैया की दिनचर्या भोर के चार बजे से शुरू होती थी और रात नौ बजे तक चलती थी। सुबह उठते ही बैलों को सानी के लिए नाद पर बांधना। उनको सानी-पानी देना। गोबर बटोरना और उसे खेत में डालने के लिए खांची (छइंटी) में रखना। फिर हाथ धोकर चापाकल से एक लोटा ताजा पानी निकालना और उसे पीना। फिर बैठ कर खैनी बनाना और एक हाथ में पानी भरा लोटा और सिर पर गोबर भरी खांची लेकर शौच के लिए खेत की तरफ निकल जाना।
लौटते में उनके एक हाथ में खाली लोटा और खांची तथा दूसरे हाथ में चंवर की मिट्टी का ढेला व किसी पेड़ की टहनी दातून के लिए होती थी। नल के पास पहुंच कर मिट्टी से वह हाथ धोते और लोटा माज कर उसमें पानी भर लेते। फिर टहनी के दातून से दांत साफ करते। यह सब निपटाते छह-सात बज जाते। तब तक घर से चार-पांच रोटियां और नेनुआ की सब्जी आ जाती। वह नाश्ता करते और हल-बैल के साथ खेत जुताई के लिए निकल जाते। दोपहर 11-12 बजे तक लौटते। थोड़ी देर सुस्ता कर खैनी खाते। फिर द्वार (दुआर) पर झाड़ू-बुहारू करते। नहा-धोकर तैयार होते और थोड़ा आराम करते। चार बजे उठते और सत्तू नमक, मिर्च-अचार लेकर खाते। फिर बैलों को सानी देकर जरूरी सामान के लिए बाजार निकल जाते। बाजार से जो जिंस खरीदी सूची में होते उनमें अमूमन नमक, मसाले, मिर्च, दवा, खैनी जैसी चीजें होती। पांच-छह बजे तक बाजार से लौट आते। आने के साथ मक्के का भूंजा और नमक-मिर्च खाते। उनके इस दिनभर के रूटीन में रोजाना औसतन मामूली दस-पंद्रह रुपये का खर्च होता। कभी न महंगाई की बात उनसे सुनी, न मंदी का कोई रोना सुना। अलबत्ता खाद और पानी की महंगाई पर कभी कभार जरूर चर्चा करते।

हमने उनकी इस दिनचर्या को शहरी तरीके से देखना शुरू किया। शहरों में सुबह उठते ही बोरिंग से पानी के लिए मोटर चलाओ। यानी बिजली और मोटर-बोरिंग के रखरखाव पर खर्च। शहरी सुबह चाय पीते हैं, यानी चाय पत्ती, दूध और चीनी के साथ गैस का खर्च। शहर में तो हैं तो खबरों से अपडेट रहना ही पड़ेगा। यानी अखबार का खर्च। शौच जाना है तो सिगरेट या खैनी चाहिए ही। इसका खर्च। वाशरूम गये तो उसकी साफ-सफाई के लिए हार्पिक-ब्रश वगैरह का खर्च। हाथ धोने के लिए साबुन का खर्च। रोज दाढ़ी बनानी है तो ब्लेड-क्रीम का खर्च। नहाने के लिए साबुन-शैंपू पर खर्च। नाश्ते के लिए ब्रेड, बटर जैसी चीजों के लिए खर्च। दोपहर के खाने का खर्च ऐसा कि उनका काम सिर्फ रोटी-सब्जी से चल जाता था, शहरों में रोटी, दाल, दो सब्जी और चावल का खर्च। इन सबको पकाने के लिए गांव में आज भी लकड़ी का इस्तेमाल होता है, पर शहर तो गैस पर निर्भर हैं। यानी गैस का खर्च। शाम को चाय-बिस्किट का खर्च और रात के खाने का खर्च। उनकी दवाओं की फेहरिश्त में कभी कभार सिर दर्द और बुखार-खांसी से आगे की दवा शामिल नहीं होती, लेकिन शहर में शुगर, ब्लड प्रेसर जैसी राजरोग की दवाओं का बड़ा खर्च। तब समझ में आया कि शहरी लोग क्यों मंदी-महंगाई पर इतना हाय-तौबा मचा रहे हैं और गांवों में इसकी चर्चा भी किसी की जुबान पर नहीं।
गांव छोड़े तकरीबन 30 साल हो रहे हैं। बीच-बीच में जाता हूं। उन दिनों ताजिया हर हिन्दू परिवार के दरवाजे से होकर गुजरता, ठहरता। सभी लोग खिरनी-मलीदा चढ़ाते। मुसलिमों की आस्था में हिन्दुओं की आस्था भी शामिल होती। कभी कोई विवाद नहीं हुआ। गांव के लोग गंवार होते हैं, ज्ञानी नहीं होते। यह आम धारणा है। अगर यह सच है तो मैं गंवार-अज्ञानी होना ही पसंद करूंगा क्योंकि खुराफात की जगह इसमें शायद ही होती है। बाद के दिनों में होली के मौके पर मुसलिम भी हमारे घरों में जुटते। हमारी कोशिश होती कि उन्हें पुआ ही खिलाया जाए। इसलिए कि झटके का मीट मुसलिम नहीं खाते और रंग-गुलाल से परहेज करते हैं। हम किसी मुसलिम को तब रंग-गुलाल नहीं लगाते थे और मीट पूछ कर ही परोसते थे। इसलिए हमारे यहां होली के दिन मीट किसी मुसलिम द्वारा कटे खस्सी का आता था। फिर भी परोसने के पहले एहतियातन पूछ लेते थे। इसी तरह मिलाद के मौके पर उनके घरों से भी बुलावा आता। हम जाते। मिलाद की कुछ बातें तो समझ में आतीं, पर आयतें संस्कृत की तरह कभी नहीं। लोभ सिर्फ प्रसाद का होता था। ईद में सेवइयां सूखी आतीं। इसलिए कि उनके घरों के बर्तन हमारे लायक नहीं होते, ऐसा वे मानते थे। मैं एक बार जाड़े के मौसम में अपने एक मुसलमान मित्र के घर गया। उनकी मां ने रात में मेरे खाने के लिए दही-चूड़ा का बंदोबस्त किया जो किसी अहीर के घर से मंगाया था। मैंने पूछा कि ऐसा क्यों किया तो उन्होंने बड़ी साफगोई से कहा था कि हमारे घर के बर्तन आपके लायक नहीं हैं। इतनी साफगोई और ईमानदारी अब तक के शहरी जीवन में मैंने शायद ही कहीं देखी।


इसीलिए कहता हूं कि सेकुलरिज्म सिर्फ वोट के लिए नहीं, बल्कि इसका वास्तविक रूप देखना हो तो गांवों में जाइए।
गांव में शाम को कुछ लोग यह देखने की कोशिश करते कि किसके घर से धुआं नहीं उठ रहा है। अगर धुआं नहीं निकलता तो समझ जाते कि उसके घर खाने-पकाने का कोई सामान नहीं है। फिर कोई टोह लेने जाता और पूछ-जान कर खाने की चीजें उसके घर पहुंचा देता। एक घर के चूल्हे की आग से कई घरों में चूल्हा जलता। किसी के घर अचानक कोई मेहमान आ जाए तो उसकी हर जरूरत की चीज आस-पड़ोस से मिल जाती। कुटुंब को पता भी नहीं चल पाता कि वह जो विविध चीजें खा रहा है, वे किसी एक घर की नहीं हैं, कई धरों से आई हैं। किसी शादी या दूसरे आयोजन में कुटुंब आते तो हर घर के लोग उनके सत्कार में शामिल रहते। कई घरों से थालियां, कटोरे, तश्तरियां जुटाई जाती। खाट, चादर, तकिया, बिस्तर कई घरों से आते। लोग खुशी-खुशी देते या पहुंचाते। एक दूसरे के सुख-दुख में शामिल होना गांव का स्वभाव रहा है। शहरों में किसी की मौत हो जाए तो भाड़े पर लोग श्मशान जाने के लिए जुटाए जाते हैं, लेकिन गांवों में सुन-जान कर इतने लोग जुट जाते हैं कि घर वाले को कोई परेशानी नहीं होती। किसी की बंसवारी से बांस काटे जाते हैं तो किसी के सूखे पेड़ की लकड़ी। कोई पैसा नहीं मंगता। उल्टे अंतिम संस्कार में वह पूरे समय साथ रहता है।
(वरिष्ठ पत्रकार। पटना,कोलकाता, रांची के कई अखबारों में संपादक रहे। वर्तमान में कशिश न्यूज बिहार झारखंड में संपादक।)

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