December 16, 2019

साझा प्रगति की राह पर बढ़ता बुनकरों का गांव पुरैनी

महमूद अंसारी
मेरा नाम महमूद है, महमूद अंसारी। मेरा पिता बुनकर थे। हमने भी कुछ सोचा नहीं और बुनकर हो गए। पढ़े लिखे नहीं हैं। कभी उसकी जरूरत भी महसूस नहीं हुई। अगर होती भी तो उसके लिए पैसे कहां थे। अभी मेरी उम्र साठ के आसपास हो रही है। सरकारी रिकार्ड के हिसाब से अब मुझे काम नहीं करना चाहिए क्योंकि मेरी उम्र हो गई है। इसलिए अब बुनकर को मिलने वाले किसी भी सरकारी योजना का फायदा मुझे नहीं मिलता। फिर भी अपने लिए और अपने परिवार के लिए काम तो करना ही होता है। मेरे गांव का नाम है पुरैनी जो भागलपुर जिले के जगदीशपुर प्रखंड में है। यहां शेख बिरादरी और अंसारी बिरादरी के लोग ज्यादा हैं। शेख बिरादरी के लोग बीड़ी बनाने का काम करते हैं। यहां से बाहर बीड़ी सप्लाई भी होता है। अंसारी बिरादरी के लोग पुश्तैनी तौर पर कपड़ा बुनने का काम करते हैं।

भागलपुर के इलाके में ऐसे बहुत से गाँव हैं जहां हथकरघा से कपड़ा बुनाई का काम होता है। लेकिन धीरे-धीरे लोग इस काम को छोड़ रहे हैं। नये लड़के इस काम को नहीं करना चाहते। वे बाहर जाकर अच्छा कमा लेते हैं। पहले हैंडलूम का काम बहुत होता था। अब पावरलूम पर ज्यादा काम होता है। इससे महाजन को ज्यादा मुनाफा होता है। हैंडलूम पर काम करने में जितनी मेहनत लगती है, उसके हिसाब से मजदूरी नहीं मिलती। अगर मैं अपनी ही बात कहूं तो मेरी हालत पहले से खराब ही हुई है।

नवासी से पहले मेरे पास येजडी मोटरसाईकल थी। आप सोचेंगे कि यह नवासी क्या है? जैसे किसी इलाके में बाढ़, भूकम्प या अगलग्गी से जोड़कर किसी घटना को याद रखा जाता है, उसी तरह हम लोग नवासी में हुए दंगे को याद करते हैं। तब मैं किसी महाजन के साथ भी काम करता था और अपना सामान बनाकर बनारस बेचने जाता था।


अब मेरे पास एक पुरानी मोटरसाईकल है जो मैंने एक मोटरमैकेनिक से खरीदा है। इस बीच नए-नए महाजन आते गए, अमीर होते गए। बुनकर की हालत खराब होती गई। बुनकर के नाम पर सरकार पैसे खर्च करती है लेकिन वो पैसा हम तक पहुंचता नहीं है। नवासी के दंगे से पहले और उसके बाद काफी फर्क पड़ा है। हमारे गांव में तो दंगे का असर नहीं हुआ था लेकिन आसपास के बहुत से बुनकरों के गांव जला दिए गए। उनके घरों को लूटा गया। वे अपनी जान बचाकर भागे। फिर मुस्लिम बहुल आबादी वाले गांवों के आसपास जमीन खरीदकर घर बनाया। उन बुनकरों ने एक मजदूर के तौर पर जिंदगी शुरू की। जो वापस बुनकर के काम की तरफ लौटे भी, वे अब किसी और के लिए काम करते थे। बहुत से लोग शहरों की ओर पलायन कर गए। शहरों की ओर पलायन का सिलसिला अब भी जारी है। मेरे लड़के भी बाहर रहते हैं। वो बुनकर का काम नहीं करना चाहते। मैं भी नहीं चाहता कि वे यह काम करें। मुझे ही इतने साल यह काम करके क्या मिला। मेरे बचपन के साथी जो कुछ और काम करते थे, उनकी हालत मुझसे बेहतर है। मैंने कई बार कोशिश की अपना काम करने की। एक-दो बार पैसे जमा करके अपना काम शुरू किया, लेकिन जिसको माल दिया उसी ने पैसा दबा लिया। पैसे निकले नहीं। निकले भी तो ऐसे कि किसी काम के नहीं रहे। बस किसी तरह खर्च हो गए। थोड़ी चालबाजी और मक्कारी सीख गया होता तो शायद मैं भी आगे निकल गया होता। वो मुझसे हुआ नहीं। आज भी ईमानदारी से मजदूरी करता हूं उसी से खुश हूँ। किसीतरह घर चल ही जाता है।

इस बीच पिछले साल कुछ नया हुआ है। बुनकरों को इतना छला गया है कि जल्दी किसी पर भरोसा नहीं होता। एक लड़का बाहर से आया। उसका घर बिहार में ही है, दिल्ली में काम करता था। उसने पूछा कि क्या आपको पता है कि आप जो सामान बनाते हैं शहर में उसकी कीमत क्या होती है। हम लोग को क्या पता, कितने में बिकता है। हम बनाकर महाजन को दे देते हैं बाकी वो जाने कितने में बेचे, किसको बेचे। हमको जो मजदूरी मिलनी होती है, मिल जाती है। उसने कहा कि वो हमारे माल को शहर में काफी अच्छे दाम पर बेचेगा। पैसे भी हमारे खाते में आएंगे। उस पैसे में से हमको उसकी मजदूरी देनी होगी। बात तो बहुत अच्छी थी। ऐसा पहले किसी ने नहीं कहा। मैंने और मेरे कुछ बुनकर साथियों ने कहा कि ठीक है, देखते हैं क्या होता है। उसने यह भी कहा कि वह हमारे साथ रहेगा, हमारे ही गांव में ताकि वह हमारे काम को अच्छे से समझे। वह यह कह कर चला गया कि हम लोग किराए का एक कमरा खोज के रखें तब वह आएगा। हम में से किसी के पास इतनी जगह नहीं कि उसे रख सके। कुछ महीने बाद एक कमरा खोज लिया गया, तब वो आया। फिर हम लोगों ने काम के बारे में और सोचना शुरू किया।

हम सबने मिलकर एक सहकारी संस्था बनाने का निर्णय लिया। जब हम लोगों ने सहकारी समिति के रजिस्ट्रेशन के बारे में भागलपुर के सहकारिता कार्यालय में पता किया तो हमें बताया गया कि फिलहाल पंजीकरण नहीं हो रहा है, जब होगा तब आईएगा। यह जानकर हमें काफी निराशा हुई। हमारे साथ जो लड़का जुड़ा है, उसने पटना में किसी ऊंचे अधिकारी को इस बाबत लिखा भी, लेकिन उसका कोई जवाब नहीं आया। मुझे ऐसा लगा जैसे उम्मीद जागते-जागते फिर से सो गई। फिर हमारे नये साथी ने कहा कि हम सब मिलकर एक कम्पनी शुरू करते हैं। मुझे नहीं पता था कि कम्पनी कैसे खुलेगा। मुझे लगता था कि यह बड़े लोगों का काम है। हम बुनकर लोग भला क्या सोच सकते हैं। फिर फैसला हुआ कि ठीक है एक कम्पनी खोलते हैं। इस तरह हम सबने मिलकर एक कम्पनी की शुरूआत की। कोलिका वीवर्स कलेक्टिव प्राईवेट लिमिटेड।

इस कम्पनी के तीन साझेदार हैं। एक मैं, एक वह लड़का जफर जिसने हमारे साथ काम करना शुरू किया, तीसरी साझेदार हैं बीबी तमन्ना जो कशीदाकारी का काम करती हैं। हम तीनों लोग अलग-अलग तरह से काम करते हैं। मेरा काम है कपड़ा बुनना और दूसरे बुनकरों से बुनवाना। कच्चा सामना खरीदना, कारीगरों तक सामान पहुंचाना, सामान की गुणवत्ता देखना। तमन्ना जी सूट डिजाईन करने, कशीदा करने का काम करती हैं। कई और महिलाओं से काम कराती हैं।

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