November 15, 2018

मानसून ने दी दस्तक

  • अच्छा मानसून न सिर्फ कृषि पैदावार की संभावनाएं बढ़ाता है, बल्कि वह तरह-तरह के उद्योगों के लिए ग्रामीण बाजार के दरवाजे भी खोलता है।

बहारों के मौसम ने दस्तक दे दी है। मानसून की बौछारें सबसे पहले जब केरल में पड़ती हैं, तो उनकी गूंज पूरे देश के खेत-खलिहान से लेकर हाट-बाजार तक में सुनाई देती है। इस बार देश को यह खुशखबरी दो दिन पहले ही मिल गई है। यह भी माना जाता है कि मानसून के ध्वजारोहक के रूप में मानसून-पूर्व की बारिश उसके आगे-आगे चलती है। महाराष्ट्र के पुणो तक से मानसून-पूर्व बारिश की खबरें आने लगी हैं। संयोग से पूवरेत्तर भारत में भी मानसून पहुंच गया है। समुद्री चक्रवात मोरा की मेहरबानी से वहां तो यह कुछ ज्यादा ही जल्दी पहुंच गया है। यह बात अलग है कि पूवरेत्तर में जिस समय बरसात हो रही है, पड़ोसी बांग्लादेश मोरा की आशंकाओं को लेकर सहमा हुआ है।

असल में, मानसून के समय पूर्व या समय पर दस्तक देने से ज्यादा महत्वपूर्ण यही होता है कि बरसात के पूरे मौसम में उसकी प्रगति कैसी रहती है? ऐसा कई बार हुआ है कि मानसून देर से आया, लेकिन जब आया, तो दुरुस्त आया और पूरे देश की पानी की जरूरत को पूरा कर गया। इसके विपरीत यह भी हुआ है कि मानसून समय पर आ गया, लेकिन उसके बाद कमजोर पड़ गया, और देश के कुछ हिस्से प्यासे ही रह गए। पिछले कुछ साल से लगातार ऐसा हुआ है। पिछले साल भी कुलजमा मानसून अच्छा रहा था, लेकिन कुछ इलाकों की प्यास ठीक से नहीं बुझा सका था। ऐसे क्षेत्रों के किसानों के लिए यह काफी बुरा अनुभव होता है, इसलिए मई शुरू होते-होते पूरा देश यह कामना करने लगता है कि इस बार मौसम की हवाएं दगा न दें।वैसे विज्ञान की भाषा में मानसून और कुछ नहीं हवा, नमी और बादलों का एक ऐसा प्रवाह है, जो हमारे पूरे उप-महाद्वीप को कुछ सप्ताह के लिए बारिश का उपहार देता है। लेकिन बरसात का यह मौसम विज्ञान से कहीं ज्यादा हमारे लोक जीवन, हमारी संस्कृति और सबसे बड़ी बात है कि हमारी अर्थव्यवस्था के लिए महत्व रखता है। अच्छे मानसून का सबसे बड़ा मतलब है, खरीफ की बहुत अच्छी उपज होना और रबी की फसल के लिए अच्छी संभावनाओं का बनना। देश के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि की हिस्सेदारी भले ही तेजी से कम हो रही हो, लेकिन देश की 70 फीसदी जनता अभी भी कृषि पर निर्भर रहती है और इस आबादी के लिए अच्छी फसल काफी महत्वपूर्ण होती है। लेकिन अच्छी फसल देश के उद्योगों के लिए भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। मसलन हम सीमेंट उद्योग को लें। जिस साल फसल अच्छी होती है, सीमेंट की बिक्री बढ़ जाती है। देश के सीमेंट उत्पादन की 40 फीसदी खपत अभी भी ग्रामीण क्षेत्रों में होती है और ग्रामीण क्षेत्रों में कितना निर्माण होगा, यह इस पर निर्भर करता है कि कृषि उपज कैसी हुई है। जाहिर है कि बारिश की ये बूंदें उद्योगों के लिए ग्रामीण बाजार के दरवाजे भी खोलती हैं।जब हम केरल में मानसून की खबरें देख-पढ़ रहे हैं, हमें श्रीलंका से आ रही खबरों को भी नजरंदाज नहीं करना चाहिए। लगातार बारिश से वहां कई इलाकों में बाढ़ आ चुकी है और इसमें जान-माल का नुकसान भी हुआ है। ये खतरे हमारे यहां काफी ज्यादा हैं, इसलिए यह समय मानसून का स्वागत करने से ज्यादा उसके लिए पूरी तैयारियां करने का भी है। आमतौर पर नगरपालिकाओं, ग्राम पंचायतों और जल परियोजनाओं के पास मानसून के लिए तैयारी करने का बाकायदा एक कैलेंडर होता है, फिर भी हर बार जब ज्यादा बारिश होती है, तो जनता के सामने परेशानियां पैदा हो ही जाती हैं। जरूरत इस बात की है कि हम नई सोच और कुशलता के साथ परेशानियों के कारणों से मुकाबला करें। और यह मनाएं कि इस बार मानसून पूरे देश के लिए अच्छा रहे।( हिन्दुस्तान से साभार)

 

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एक दशक से भी ज्यादा से पत्रकारिता में सकिय। संसद से लेकर दूर दराज के गांवो तक के पत्रकारिता का अनुभव। ग्रामीण समाज व जनसरोकार से जुड़े विषयों पर पत्र पत्रिकाओं में लेखन। अब पंचायत खबर के जरिये आपके बीच।

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