April 04, 2020

नैहर के मोह बीच छूटी जाती नेह की डोर…

भारती सिंह

कुरियर से सीमा की शादी का कार्ड आया है।
अरे यह क्या! शादी गांव से।

हे भगवान! भैया भाभी भी न। बम्बई में रहकर भी गंवई ही रह गए। कहां आज कल थीम शादी और कहाँ हमारे भैया भाभी। सीमा को कैसा लगेगा। फोन लगाती हूं। फोन सीमा ने ही उठाया।
प्रणाम बुआ,कार्ड मिला? चहकती आवाज थी। हां ,सीमा। अभी बस कार्ड ही पढ़ रही थी। पर शादी गांव से क्यों। कहीं भैया फिर जिद पर तो नहीं अड़ गए। एक ही बार में पूछ बैठी।
अरे नही बुआ, इस बार मेरी जिद चली। मैं चाहती हूं कि मेरी शादी गांव से ही हो। लोग अपनी शादी यादगार बनाना चाहते हैं। बस मैं भी अपने तरीके से इसे यादगार बनाना चाह रही हूं। नवम्बर में शादी थी इसलिए गर्मी की चिंता नही वरना गांव में तो बिजली बस मुंह दिखाई करने आती है।

सहरसा स्टेशन पर ही भैया मिल गए। मुझे लेने आये थे। सीमा भी साथ थी। पक्की सड़क देखकर बहुत अचरज हो रहा था। रास्ते में गाय बैल अब नही दिख रहे थे। मिथिलांचल की पहचान माने जाने वाले फूस के घर भी अब कम ही थे। सड़क के दोनों ओर पक्के मकान ही दिख रहे थे। हां सर्वशिक्षा अभियान के तहत स्कूलों में नवजीवन आ गया था। किशोर लड़के-लड़कियां साइकिल से स्कूल जाते बहुत अच्छे लग रहे थे।
बुआ वह देखो देवन मन्दिर। यह भव्य मंदिर! हां बुआ। पुराना मंदिर बाढ़ में बह गया। अब यह नया मंदिर बना है। आस पास ढेरो फल फूल प्रसाद की दुकानें लोगों की आजीविका के साधन बन चुके हैं।
सीमा ने ढेरों जानकारी इकठ्ठी कर रखी थी।
घर आ गया। पहले बस हमारा घर ही पक्के का था। पर अब आसपास भी सभी मकान पक्के के ही थे। देखकर बहुत अच्छा लगा। तब तक लाजो बुआ, मीरा बुआ, बड़की चाची, मंझली चाची, दादी बुआ कितनी महिलाएं बाहर आने लगी।
हे कनिया! पैन आनु, ननद के पैर पखारु। आय बेटी के जनकपुर मोन पड़ल। मंझली चाची ने बहु को हमारे पैर धोने के आदेश दिया। और कनिया दौड़ पड़ी लोटे में जल लेकर। मंझली चाची ने बहु को हमारे पैर धोने का आदेश दिया और चाची झट से कांसे से लोटे में पानी भर लाई।

नैहर के शीतल जल पड़ते थकान छू मंतर हो गयी। सबके पैर छूते, भाभियों के गले मिलते मन जैसे तृप्त हुआ जा रहा था। तब तक खाना लग गया। अरवा चावल का भात, कढ़ी, कई तरह की मौसमी सब्जी, तिलौरी न जाने क्या क्या।
कई साल बाद सब एक थाल में खाने बैठे। मैं सीमा, बड़की भाभी, मंझली कनिया, नवकी कनिया, और सीमा का भाई मनीष। न जाने कैसी क्षुधा जागी थी खूब खाये हम सब और फिर भी मन न भरा।
बसन्तपुर वाली बर्तन धोने आयी थी।जैसे ही पैर छूने को बढ़ी पीछे हट गई। हम बेटी से गोर नैं लगवायब, सच तो यह था कि जातीय झिझक थी उनमें, पर हमें भैया ने सबके पांव छूना सिखाया था।
शाम को हल्दी की रस्म थी। आंगन औरतों से भर गया।

लाल चाची नहीं दिख रही थी। बड़ी होने के नाते रस्म की शुरुआत वही करती। उनके गीतों का कोई जोड़ भी नहीं था। देखा सीमा हाथ पकड़े लाल चाची को लेकर आंगन में आई।
ओह!चाचा नही रहे। वैधव्य के कारण शुभ काम में नहीं आ रही थी। सादे कपडे में लाल चाची को देखकर मन भर आया। शादी के बाद कई साल तक वह लाल साड़ी ही पहनती थी। इसलिए सब उन्हें लाल चाची ही कहने लगे। उनके गीत से आंगन गुलजार हो गया।

सीमा की खुशी के आगे कौन कुछ कहे। फिर तो हल्दी होली-सी हुड़दंग हो गयी। सबने एक दूसरे को दौड़ा—दौड़ा कर हल्दी लगाया। मंझली भाभी ने कहा कल आने दो ननदोई को, आज की कसर कल निकालूंगी। उनकी हल्दी में मुहकटवा ओल मिलाकर लगाउंगी, फिर तो सब और मजे लेने लगे। काम की व्यस्तता से पति अगले दिन पहुंचे।
शादी की चहल पहल और गांव का लाड़ दुलार, सब मोबाइल में समेट कर रख रही थी। एक बात अखर रही थी। गांव में महिलाएं और बुजुर्ग ही दिख रहे थे। काफी लोग नहीं दिखे। पूछने पर पता चला, अब कौन खेती बारी करना चाहता है। सब शहर की नौकरी के पीछे भाग रहे हैं। लंबा घर दुआर छोड़ कर एक कोठरी में मकान में रहेंगे पर शहर में रहेंगे। धीरे धीरे परिवार बच्चे भी उधर ले जाते हैं।
शुरू में तो साल-दू साल पर आते हैं फिर उधर ही बस जाते हैं। हालांकि गांव भी अब गांव नही रहा। हर घर मे केबल की छतरी बता रहा है यहां के रहन सहन में बहुत परिवर्तन हुआ है। सबकी कमाई का बड़ा हिस्सा मोबाइल फोन लील जाता है। शादी ब्याह कैसे बीता पता ही नही चला। मटकोर की गाली, कभी द्वारचार की धूमधाम, जैसे ही लाल चाची ने समदाउन गाना शुरू किया-
बड़ रे जतन से हम सीता बेटी पोसलों
से हो बेटी ले ले जाये राजा रघुवंशी।
ओह पत्ता पत्ता रो पड़ा।

बाराती इतनी अच्छी व्यवस्था देखकर हतप्रभ थे। सीमा विदा होकर चली गयी। अब हमें भी अपना सामान समेटना था।
कल त तू सब चैल जैभी, सब गोटे जाके गोसाई दर्शन कर ले। तभी किसी ने कहा सब गोटे चलू नदी नहाये। मन मांगी मुराद पूरी हो गयी। कोसी की धारा में हमने खूब नहाया, बल्कि तैराकी भी करने लगे।
कभी हम लोग गमछे में मछली मार कर ले जाते थे यहां से। घर आई तो ताजा मछली बनकर तैयार थी। फिर वही सब एक थाल में बैठकर खाये।

अभी से मन बैठा जा रहा था। कल ये सब छूट जाएगा। वही मशीन वाली जिंदगी।
भूंजा वाली एक मोटरी बांधकर ताजे भुने मकई लाई थी। बौआ ई सन्देश त अहाँ के नहिये मिलत। उसे याद था मैं मकई के भूंजा कितना प्रेम से खाती थीं। सुबह अंधेरे ही निकलना था। सब लोग उठ गए थे। न जाने कितने सन्देश गाड़ी में रखे जा रहे थे। बेटी को दिया जाने वाला खोइचा जीरा दूब तैयार था।
सबसे गले मिलकर रोती जा रही थी। गाड़ी चल पड़ी।
खेत, ब्रम्ह बाबा थान ,कोसी कछार, देवन मन्दिर सब छूटने लगे।
मेरा घर आंगन मिट्टी सब मेरे लिए समदाउन गा रहे थे।

(मोहनपुर नवहट्टा, सहरसा बिहार की निवासी हैं, वर्तमान में घाना अफ्रीका में रहती हैं और स्वतंत्र लेखिका हैं।)

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