July 14, 2020

मनरेगा को पुनर्जीवित किए जाने के साथ ही व्यापक सुधार की है दरकार

प्रो डॉ अश्विनी कुमार

‘कांग्रेस सरकार की विफलता का तथाकथित जीवित स्मारक’ बताया जाने वाला प्रतीक कोरोना संक्रमण के दौरान हुए राष्ट्रीय लॉक डाउन से प्रभावित लाखों प्रवासियों की दुर्दशा को कम करने और इससे प्रभावित ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नया आयाम देने के लिहाज से एक बार फिर अपने उदात्त स्वरूप में बिना किसी भेदभाव आगे का रास्ता प्रतीत हो रहा है। कोरोना महामारी ने केंद्र सरकार को यूपीए युग के अधिकार आधारित विकासात्मक मॉडल के प्रति राजनीतिक और वैचारिक शत्रुता पर पुनर्विचार करने को प्रेरित किया है। यह भी कह सकते हैं भले ही इसे नये स्वरूप में पेश करें या री-ब्रांडिंग कर आगे बढ़ाएं लेकिन मनमोहन-युग की कल्याणकारी योजनाएं इस कोरोना काल में चुनौतियों से निपटने के लिए सार्थक प्रतीत हो रही हैं।

वर्ष 2020-21 के लिए अतिरिक्त 40,000 करोड़ की घोषणा के साथ केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के लिए कुल बजटीय आवंटन को बढ़ाकर एक लाख हजार करोड़ से अधिक कर दिया है, जो कि वर्ष 2006 में काम के अधिकार के रूप में शुरू किए गये इस एतिहासिक योजना मनरेगा के शुरूआत से लेकर अबतक की सबसे उच्चतम बजटीय आवंटन है।  सरकार की नई घोषणा से जिसमें यह दावा किया गया कि इससे लगभग 300 करोड़ दिवस का रोजगार सृजन किया जा सकेगा, सरकार द्वारा अब तक इस योजना की आलोचना के बावजूद नरेगा के लिए यह रिकॉर्ड बजटीय आवंटन से जाने अनजाने इस बात की स्वीकारोक्ति होती है कि यदि सक्रिय राजनीतिक प्रतिबद्धता के साथ इस योजना को लागू किया जाए तो ग्रामीण भारत की दशा और दिशा में परिवर्तन कारी बदलाव लाने के लिहाज से नरेगा योजना में अपार क्षमता निहित है।

हालांकि दुनिया में सबसे बड़े कल्याणकारी कार्यक्रम के रूप में प्रतिष्ठित, नरेगा योजना का शुरूआत के बाद से ही एक घोर वैचारिक विरोध का सामना करना पड़ा है। एक ओर प्रगतिवादी और वाम-झुकाव वाले सामाजिक कार्यकर्ता नरेगा को ग्रामीण भारत में ‘मौन क्रांति’ का अग्रदूत बताते हैं, जबकी नव-उदारवादी अर्थशास्त्री और शहर में रहने वाला प्रभावशाली तबका इसे ‘महंगी ग्रेवी ट्रेन’, ‘मनी डोजर’ और ‘हवा हवाई प्रावधानों के जरिए गरीबी में कमी’ के रूप में प्रदर्शित करते रहे हैं।’ यहां तक की खुद को पाक साफ और न्यायसंगत बताने और दिखाने का प्रयास करने वाला कॉर्पोरेट भारत ने भी नरेगा को राष्ट्रीय श्रम बाजार को बर्बाद करने का दोषी बताते हुए भारत के विकास की कहानी को बाधित करने लिए उत्तरदायी बताया। लेकिन सुधा नारायण जैसे विकास गतिविधियों को रेखांकित करने वाले अर्थशास्त्रियों ने डेटा का विश्लेषण इन निराधार आलोचनाओं का खंडन करते हुए कहा गया है कि कि नरेगा का वार्षिक बजटीय आवंटन कभी भी जीडीपी के 0.4 से अधिक नहीं रहा है और इसने कुल 563300 करोड़ रु के कुल खर्च के जरिए लगभग 3000 करोड़ लोगों के लिए एक दिन के काम का सृजन किया है। इसके शुरूआत से लेकर जनवरी 2020 तक के आंकड़ों पर गौर करें तो प्रति व्यक्ति एक दिन के काम के लिए 189.5 रु खर्च किए गए। इस तरह से देखें तो मामूली बजटीय खर्च की बदौलत जिस तरह का चुनावी फायदा प्रत्येक दल को हुआ है, इस लिहाज से नरेगा वास्तव में पार्टी लाइन से इतर सभी राजनीतिक दलों के क्षेत्रीय राजनेताओं के लिए चुनावी फायदे के लिहाज से काफी सहायक सिद्ध हुआ है।

कोई आश्चर्य नहीं, स्वच्छ भारत, जन धन योजना, स्मार्ट सिटी और मेक-इन इंडिया जैसे लोक लुभावन और व्यापक प्रचार के साथ शुरू किए गये केंद्रीय विकास कार्यक्रमों के व्यापक तौर पर लाभप्रद सिद्ध न हो पाने से हताश होने के बाद, केंद्र सरकार ने अब तथाकथित ‘आधा अधूरा समाजवाद’ के प्रतीक के रूप में  स्थापित करने का प्रयास किया गया हो। सरकार के इस तरह के कदम से यह संभव है कि ‘ हिंदुत्व की राजनीति से जुड़े मतदाताओं को थोड़ा आश्चर्य हुआ हो, लेकिन मोदी सरकार हाल ही में कल्याण कारी सेवाओं के विस्तार के लिहाज से सर्वाधिक सक्रिय धर्मनिरपेक्ष यानी बिना किसी भेदभाव के सेवा प्रदान करते हुए दिखने की चेष्टा की है। हालांकि नरेगा योजना के प्रति लुंजपुंज और विभेदकारी रवैया रखने के लिए केंद्र सरकार की अक्सर आलोचना की जाती रही है, लेकिन बावजूद इसके ग्रामीण गरीबों के हाथों में अधिक पैसा पहुंचाने से जुड़े कल्याणकारी कार्यक्रमों के प्रति प्रतिबद्धता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। और सरकार के सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों में इस सर्वसमावेशी धर्मनिरपेक्ष रवैये का पता 2016 से नरेगा के प्रदर्शन के त्वरित रुझान विश्लेषण के जरिए भी किया, समझा जा सकता है।

उदाहरण के लिए, वर्ष 2014-15 में मनरेगा के लिए 34,000 करोड़ रुपये का बजटीय आवंटन किया गया था जो कि 2018-19 में 61,084 करोड़ रुपये हो गया है। विशेषज्ञों की राय है कि 2014-15 के अलावा, आगामी सभी वर्षों में, वास्तविक व्यय अनुमोदित बजटीय आवंटन से अधिक है। इसी प्रकार वित्त वर्ष 2016—17 में जहां 235.6458 मानव दिवस का सृजन हुआ वहीं वित्तिय वर्ष 2019—20 में आंकड़ा बढ़कर 265.36 करोड़ मानव दिवस हो गया। और यह बताने के लिए पर्याप्त सबूत हैं कि नरेगा योजना में महिलाओं, दलितों और आदिवासियों को प्रभावी तरीके से जोड़े जाने या जुड़े होने का सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। नरेगा योजना में शामिल कुल कार्यबल में आज महिलाओं की हिस्सेदारी 50 फीसदी से ज्यादा है। यही कारण है कि राज्य सरकारों के दबाव में नरेगा को वापस लेने या प्रतिबंधित करने के केंद्र सरकार के प्रयास को बल नहीं मिल पाया है या विफल साबित हुआ है।
इन आंकड़ों के पड़ताल से यह भी पता चलता है ​कि भुगतान की मियाद 90 दिनों से ज्यादा होने के आंकड़ों में कमी आई है। वित्त वर्ष 2016—17 में जहां इसकी संख्या 54267907 थी वहीं वित्तिय वर्ष 2019—20 में इसकी संख्या घटकर 2978909 हो गई। यह भी पता चलता है कि प्रखंड स्तर पर इलेक्ट्रॉनिक फ़ंड ट्रांसफ़र ऑर्डर (एफटीओ) के माध्यम से भुगतान तेज़ी से हुआ है, बावजूद इसके कि श्रमिकों को मजदूरी का वास्तविक हस्तांतरण विशेष रूप से केंद्र सरकार के स्तर पर उन्हें देरी का सामना करना पड़ा है। ग्रामीण विकास मंत्रालय को ग्रामीण भारत में लैवरेजिंग जैम ट्रिनिटी- (जन धन-आधार-मोबाइल) आधारित-असीमित कैश ट्रांसफ़र की व्यवस्था से आगे जाते हुए अस्वीकृत भुगतान, डायवर्टेड भुगतान और अवरुद्ध भुगतान जैसे आयाम जोड़कर वेतन भुगतान की समस्याओं को हल करना होगा जैसे। उदाहरण के लिए 2019-20 में 1,600 करोड़ रुपये के वेतन भुगतान को अस्वीकार कर दिया गया।

यह बात सही है कि नरेगा के क्रियान्वयन में राज्यों में और विभिन्न जिलों में असमानता रही है विशेष रूप से कल्याणकारी योजनाओं का हाशिये पर बैठे लोगों तक पहुंचाने में कई तरह की खामियां और असमानता बनी हुई है। और जमीनी स्तर पर कई तरह के घोटाले और भ्रष्टाचार की बातें सामने आती रही हैं।।हालांकि, हाल के दिनों में किए गए अध्ययनों से यह भी पता चलता है कि धन और संसाधनों के दुरुपयोग को रोकने के लिए किए गये उपायों मसलन नागरिक-केंद्रित सामाजिक ऑडिट की मदद से और देश के अधिकांश अधिकांश जिलों मे आईसीटी से परिपूर्ण पारदर्शिता प्रक्रियाओं को लागू कर मनरेगा में भ्रष्टाचार के रोकथाम की दिशा में कदम उठाए गए हैं।
हालाँकि, जिले में ग्रामीण विकास से जुड़ी नौकरशाही ‘वर्क-राशनिंग’ की संस्कृति को बनाए रखते हुए और इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए बड़े पैमाने पर नरेगा के बढ़ते हुए मांंग को कमतर करने का प्रयास करती है, लेकिन नरेगा को अन्य विकास कार्यक्रमों के साथ जोड़े जाने के परिणामस्वरूप जिला और उप-जिला स्तर पर फैली हुई नौकरशाही और राजनीतिक अभिजात्य वर्ग द्वारा जमीनी स्तर पर कल्याणकारी कार्यक्रम पहुंचाने में सुविधा शुल्क लिए जाने में कमी आई है। जमीनी स्तर पर किए विश्वसनीय अध्ययन व अवलोकन से ये स्पष्ट रूप से पता चलता है कि नरेगा न केवल बना हुआ है, बल्कि इसने धीरे-धीरे भारत के राज्यों और जिलों में सार्वजनिक और सार्वभौमिक रूप से बिना किसी भेदभाव के चलाए जाए रहे कल्याण कारी कार्यक्रम के लिए प्रशासनिक और नागरिक संरचना की बुनियाद बनाने में कामयाबी पाई है।

प्रवासी श्रमिकों की दुर्दशा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर कोरोना महामारी के दीर्घकालिक प्रभाव को देखते हुए, सार्वभौमिक बुनियादी आय गारंटी योजना के रूप में नरेगा को नये सिरे से पुर्नमूल्यांकन किये जाने का यह उचित समय है। वर्कफेयर वेलफेयर और डायरेक्ट-कैश ट्रांसफर के जरिए भारत में भूमिहीन श्रमिकों, लघु-सीमांत किसानों और मौसमी प्रवासियों की आर्थिक कठिनाई को कम करने की क्षमता है और इसमें बहुत अधिक खर्च भी नहीं आएगा। विकासपरक गतिविधियों से जुड़े प्रमुख अर्थशास्त्री प्रणब बद्र्धन का सुझाव है कि पांच व्यक्ति के परिवार में प्रति वर्ष 16000 रुपये की मामूली राशि दिया जा सकता है। इस बात के पर्याप्त प्रमाण हैं कि सार्वभौमिक बुनियादी आमदनी का एक छोटा सा हिस्सा भी ग्रामीण भारत में गरीबों खासकर महिलाओं और बच्चों की आजीविका और स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने में काफी मददगार होता है। एक मासिक बुनियादी आमदनी का सहयोग के साथ कानूनी रूप से 100 दिनों के ग्रामीण रोजगार गारंटी वाला नरेगा ग्रामीण भारत में किसानों के लिए आमदनी को सुनिश्चत करने और उसकी आवश्यकता को पूरा करने में सहायक होगा।

नरेगा और सार्वभौमिक बुनियादी आमदनी का यह कॉम्बो विशेष रूप से ग्रामीण भारत में बुजुर्गों, विधवाओं और विकलांगों की दुर्दशा को दूर करने में मदद करेगा। दूसरे शब्दों में, ग्रामीण श्रमिकों की मौजूदा अधिकारों को कम किए बिना, नरेगा की अनुसूची एक में श्रेणी IV के तहत कार्यों की परिभाषा का मामूली फेरबदल एससी / एसटी समुदायों, भूमि सुधार लाभार्थियों और छोटे और सीमांत किसानों को कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग या किरायेदार खेती या अपनी ज़मीन पर (एक साथ या व्यक्तिगत भूमि पर) खेती करने व उससे लाभ प्राप्त करने में सहायक साबित होगा।  यह स्वयं सहायता समूहों या ग्राम सहकारी समितियों के माध्यम से नरेगा मजदूरी चाहने वालों को ग्राम सभाओं द्वारा मजबूत संस्थागत सामाजिक आडिट के जरिए लाभ दिया जा सकता है। इसके जरिए न सिर्फ खेती को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि प्रतिकूल सामाजिक परिस्थितियों में दैनिक मजदूरी पर काम करने वालों के साथ ही महिला किसानों सहित लाखों काश्तकारों को भी इससे फायदा होगा।

यह कट्टरपंथी और चुनौतीपूर्ण लगता है लेकिन यदि एक बार ऐसा हो जाता है, एक अधिक धर्मनिरपेक्ष और सार्वभौमिक नरेगा ग्रामीण गरीबों की अब तक उपयोग में नहीं लाई गयी उद्यमशीलता की ताकत को नया आयाम दे सकती है, सामुदायिक स्तर पर एक दूसरे से जुड़ने की ताकत की बदौलत इसे संस्थागत रूप दिया जा सकता है, और इसके जरिए हमारे गांवों में संस्थागत बाजार के विकास को अधिक एकरूपता लाने की दिशा में प्रेरित करने के साथ ही आमदनी बढ़ाने वाले कल्याणकारी कार्यक्रमों का प्रभाव काफी व्यापक हो सकता है। यह नहीं भूलना चाहिए कि जब 2009 में बैंकों / डाकघरों के माध्यम से मजदूरी भुगतान अनिवार्य किया गया था तो इसको लेकर काफी शोर मचाया गया, विरोध के स्वर भी उठे। लेकिन इसका परिणाम यह हुआ कि अब आलोचकों ने भी स्वीकार किया है कि इससे गांवों में वित्तीय समावेशन की संरचना का विकास हुआ है, विशेष तौर पर उन महिलाओं कामगारों को जो घर के भीतर मजदूरी कर रही है। निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि हमें इस तथ्य को स्वीकार करना चाहिए कि एमजी-नरेगा को सार्वभौमिक बुनियादी आय सुधारों से जोड़ना प्रवासी मजदूरों के संकट को कम करने और भारत को अधिक न्यायसंगत, स्वस्थ और सुरक्षित गणराज्य बनाने के लिए तत्काल आवश्यक है।
(अश्विनी कुमार टाटा इंस्टीट्यूट आॅफ सोशल साईंस (मुंबई) में डेवलपमेंट स्टडीज में प्रोफेसर है व पूर्व में ग्रामीण विकास मंत्रालय के तहत केंद्रीय रोजगार गारंटी परिषद के सदस्य रहे हैं। टाईम्स आफ इंडिया में प्रकाशित लेख का अनुवाद साभार)

About The Author

Related posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *