January 19, 2020

गांव मेरी संवेदना का हिस्सा लेकिन समय का यथा​र्थ है नगर

प्रो डाॅ गोपेश्वर सिंह
गांव हमारी भावनात्मक कमजोरी है। गांव हमारी भावनाओं, स्मृतियों में बसा है। चूंकि गांव में हमारा बचपन बीता है, हमारे संस्कार बने हैं, इसलिए हमें अच्छा लगता है गांव। हमारे शारीरिक और मानसिक निर्माण में गांव की बड़ी भूमिका है, इसलिए फुर्सत के क्षणों में वह हमें याद आता है। हम नागरिक जीवन से जब उबते हैं, यहां की भागदौड़, यहां का शोरगुल, यहां का प्रदूषण जब हमें परेशान करता है तब हमें गांव याद आता है। इस तरह से गांव हमारे जीवन में कुछ देर के लिए राहत देने वाली वह स्मृति है जो थोड़ी देर या कुछ दिनों के पिकनिक के सिवा और कुछ नहीं है। मेरा गांव बिहार के गोपालगंज जिला में बड़का गांव का टोला पकडियाड़ है।
हमारा गांव हमारी सुविधा और सपनों की उड़ान के लिए अपर्याप्त था, इसलिए हम वहां से भागे और शहर की ओर गए। शहर में हमें उच्च षिक्षा मिली, देश-दुनिया को देखने की दृष्टि मिली, जीवन को सुखी-संपन्न बनाने का भौतिक आधार यानी नौकरी मिली। यदि हम शहर न आए होते तो हम अपने उन साथियों की तरह होते जो गांव में छूट गए हैं और जिनका मानसिक स्तर बहुत ही पिछड़ा हुआ है। इसलिए गांव मेरी स्मृति का हिस्सा है, उससे मैं भावनात्मक लगाव महसूस करता हूं, लेकिन मेरे जीवन की सच्चाई मुझे गांव लौटने की इजाजत नहीं देती। गांव किसी कारण मुझे लौटना पड़ा तो उसके दो ही कारण होंगे पहला यह कि मैं आर्थिक रूप से इतना मजबूर हो जाऊं कि वहां लौटने के सिवा दूसरा कोई ठिकाना न हो। हांलाकि गांव पर मेरा घर है जो मेरा बनाया हुआ है। वहां रहने की सारी सुविधाएं हैं, लेकिन वह मेरी मजबूरी होगी। गांव लौटने का दूसरा कारण यह हो सकता है कि मैं गांव में कुछ सामाजिक कार्य करने का संकल्प लूं और वहां जाकर रहूं। वह मेरे रचनात्मक कार्यों का जरिया होगा। वह मेरी मजबूरी नहीं होगी। गांव में नयी चेतना जगाने के लिए मैं जाउंगा। इन कारणों के अलावां गांव मेरे लिए सिर्फ नाॅस्टेलजिया है और कभी-कभार मन बहलाव के लिए घूम आने का एक ठिकाना है। हम वहां नहीं हैं जहां से हम चले थे। गांव भी वह नहीं है, जो हमारी स्मृतियों में हैं। गांव बदल चुके हैं।

हमारे जमाने में गांव के किसी एक व्यक्ति की समस्या पूरे गांव की समस्या होती थी। इसका कारण था कि लोग अपना सुख-दुख मिल-बांट कर जीते थे। दुख सबको जोड़ता है। गांव में जब ज्यादा दुख था, लोग ज्यादा जुड़े हुए थे। शादी-विवाह, मरनी-जियनी सबमें एक दूसरे के साथ खड़े होते थे, इससे दुख थोड़ा कम होता है। लेकिन जैसेे-जैसे गांव में समृद्धि आई, पक्की सड़कें आईं, मोटरचालित सवारियां आई, बिजली आई, टीवी व मोबाइल आया, उसने गांव के मिजाज को बदल कर रख दिया। अब जो दिल्ली में दिखता है वह गांव में भी दिखता है। जो फैशन दिल्ली, मुंबई में है, वह थोड़े दिन बाद मेरे गांव में भी है। गांव में अब पहले की तुलना में लोगों के पास अच्छे घर हैं, पहनने को कपड़े हैं और जीवन की दूसरी सुविधाएं भी हैं। इन भौतिक उपलब्धियों ने गांव वालों के आपसी जुड़ाव को कम किया है। अब वह सहयोगी भाव नहीं है। आज से 50 साल पहले गांव बाजार के दबाव में नहीं थे, लोग बाजार अपनी जरूरत की चीजों के लिए जाते थे। वे बाजारोन्मुख नहीं थे। लेकिन आज आधुनिक संचार माध्यमों के कारण और तेज रफ्तार वाहनों के कारण बाजार हमारे गांव के हर घर में घुंस गया है, बल्कि घर-घर आक्रांत है। गांव की जो नयी पीढी़ है वह पुरानी पीढी़ की तरह अपनी सीमित जरूरतों और बने बनाए संस्कार में रहने को तैयार नहीं। उसके सामने बाजार रोज-रोज नकली सपनों के दरवाजे खोल रहा है। उन सपनों को खरीदने में हमारा नगर का समाज तो व्यस्त है ही, हमारे गांव का समाज भी कम व्यस्त नहीं है। वह वैसा ही दिखना और होना चाहता है जैसा मुंबई-दिल्ली का आदमी है।

गांव अब कहने को गांव है। गांव का संस्कार अब वहां नहीं है। अब गांव के बहुत कम लोग होली-चैती के गीत गाते और जानते हैं। गांव की बहुत कम औरतें शादी-विवाह और संस्कार के गीत गाती, जानती हैं। यह सब अब रिकार्डेड गीतों के जरिए हो रहा है। ग्रामीण इलाकों में लोक-नाट्य परंपराएं थीं वे खत्म हो चुकी हैं। लोकगीत का वातावरण समाप्त है। नाटक—नौटंकी की जगह मुंबईया हिंदी फिल्मों की फूहड़ नकल पर आर्केस्ट्रा पार्टियां हैं। लोक का जो अपना रागात्मक परिवेश था, वह सब कुछ आयातित, सांस्कृतिक फूहड़पन में बदल चुका है। इसलिए मेरा गांव आज वह गांव नहीं है जो 1960-65 में मेरी स्मृतियों में दर्ज है। मैं शहर में रहते हुए भी लगातार गांव जाता रहता हूं और धीरे-धीरे वहां आते बदलाव को भी देखता हूं। इस आधार पर मैं कह सकता हूं कि भौतिक रूप से गांव बदले जरूर हैं लेकिन सांस्कृतिक रूप से पिछड़ गए हैं।

शैक्षणिक रूप से तो मेरे गांव की और निराशाजनक स्थिति है। हमारे समय में जो टूटे-फूटे विद्यालय थे, वहां भौतिक सुविधाएं न के बराबर थी लेकिन शिक्षकों में शिक्षा देने का आग्रह शत-प्रतिशत था। मेरे गांव में ब्राह्मण से लेकर दलित तक सभी उसी स्कूल में पढ़ने गए और वहां से शिक्षित होकर निकले। हमारे बचपन में हर घर के दरवाजे पर लालटेन जलती थी। बच्चे पढ़ते थे। पिता, चाचा या दादा निगरानी करते थे। चाहत थी कि उनके बच्चे पढ़ कर आगे निकल जाएं। आज हर दरवाजे पर बिजली जल रही है। लेकिन किसी भी जाति के दरवाजे पर पढ़ते हुए बच्चे नहीं मिलेंगे। पढ़ाई चोरी करके इम्तहान देने और पैरवी से अच्छा रिजल्ट लाने तक सिमट कर रह गयी है। उसका संबंध ज्ञान प्राप्ति से नहीं हैं। मेरी स्मृति में जो विद्यालय या महाविद्यालय हैं, आज की तारीख में वे भौतिक रूप से उन्नत हुए हैं लेकिन शैक्षणिक वातावरण समाप्त हो चुका है। गांव में शैक्षणिक डिग्रीधारियों की संख्या तो बढ़ी है लेकिन सचमुच के शिक्षित लोगों की संख्या घटी है।

गांव में एक सामाजिक परिवर्तन भी देखने में आ रहा है। जातियों के बीच पहले जितना सामाजिक भेदभाव था, वह कम हुआ है। ब्राहमण मोहल्ले और दलित टोले का जो सामाजिक भेद था, वह पूरी तरह टूटा तो नहीं है, लेकिन कम जरूर हुआ है। अब छुआछूत और कच्चे-पक्के भोजन की पाबंदी भी देखने को कम मिलती है। मेरे पिताजी के जमाने में यानी हमारे बचपन में बहुत से मुसलमानों से हमलोगों के पारिवारिक रिश्ते थे। सब एक दूसरे के दुख-सुख में शामिल होते थे, सुख-दुख को अपना मानते थे, सांप्रदायिक भेदभाव उनमें नहीं था। खानपान में छुआछूत का भाव जरूर था। आज यह वातावरण नहीं है। आज हिंदू और मुसलमान में कहीं न कहीं तनाव की स्थिति है। एक दूसरे पर से भरोसा उठने लगा है। यह प्रदूषित राजनीति का गांव पर हमला है।
आज के गांव का जो यथार्थ है, उसका कोई संबंध हमारी स्मृतियों के गांव से नहीं है। आज जो गांव में लोग हैं, वे स्वेच्छा से नहीं बल्कि मजबूरी से हैं। जिसे अवसर मिलता है वह शहर भाग जाता है। जो गांव में रहते हैं और खेती के सिवा उनके पास रोजी-रोजगार का दूसरा साधन नहीं हैं, और खेती घाटे का सौदा हो गई है तो फिर कोई क्यों और कैसे रहे गांव में ? आज गांव में अर्द्धशिक्षित बेरोजगारों की फौज खड़ी है। गांव के ये बेरोजगार नौजवान खेती करना नहीं चाहते या गांव के पारंपरिक धंधे में उन्हें लाभ दिखाई नहीं देता और सरकारी या निजी नौकरी उन्हें मिलती नहीं। इसलिए अब गांवों में होरी जैसे किसान को खोजना मुश्किल है जो अपनी खेती से प्यार करता था और अपनी खेती को ही जीविका समझता था।
गाँव में कुआं..
अब न के बराबर हैं कुएं । यहाँ तस्वीर में जहां हम बैठे हैं, उसमें मेरे दरवाजे पर का कुआं दिख रहा है। अब इसका कोई उपयोग नहीं है। कभी यहां खूब चहल-पहल रहती थी। इसके पास एक बड़ा मजबूत खम्भा गड़ा था जिसमें लट्ठा लगाकर डोल बांधा गया था। डोल से पानी निकाला जाता। नहाना -धोना दिन भर लगा रहता। कुआं को पवित्र माना जाता। जूता-चप्पल पहन कर वहां जाने की मनाही थी। सारे शुभ कार्यों में कुआं की पूजा होती। दीपावली का दीया कुएं पर जरूर रखा जाता। कुएं को ‘नैन माता’ भी कहते थे।
गांव में हमारे दरवाजे के इस कुएं के पहले से और कई कुएं थे। सब कुओं के प्रति यही आदर भाव था। उन कुओं को किसने बनाया था, मुझे नहीं मालूम। मेरा यह कुआं 1960-61 में बना था। तब मैं क़रीब 5 साल का था। मेरे पिता-चाचा, मां, चाचियां सब बहुत खुश थे। हम बच्चे भी। कुआं खुदवाना धरम-काज के अलावा आपकी औकात का भी प्रतीक होता ।खैर, यह कुआँ जब खुदा तो ईंट- सीमेंट, जमोट आदि की व्यवस्था भले हमारे घर से हुई लेकिन लगभग महीना भर कुआँ खोदने- बनाने का काम गांव-जवार के लोगों ने सेवा -भाव से किया। कुआं बनाना धरम-काज जो था। खुदाई और निर्माण में जो मिहनत लगी, वह वर्णनातीत है। कुआं बनाने वाले गांव -जवार के लोगों को हमारे घर से एक मुठ्ठी चना और गुड़ देकर पानी पिलाया जाता। यह काम हम बच्चे करते। सो, मैं कहता हूं कि इस कुएं को बनाने में हमारी भी भूमिका है।

हमारे घर में पहले चापा कल आया। फिर वाटर टैंक लगा।अब इस कुएं का हमारे लिए कोई उपयोग नहीं है, फिर भी हम इसे तोड़कर ज़मीन को सपाट नहीं करना चाहते। जब कि यह कुआं ठीक घर के सामने है। एक बार मेरे चाचा एक लड़का इसमें गिर चुका है। जिसे मैंने कुएं में कूदकर यानी अपनी जान जोख़िम में डालकर बचाया। इसे मिट्टी से भरने की बात आई तो हमारे उसी चाचा ने मना कर दिया-जिस कुएं को अपने हाथों बनाया उसमें मिट्टी डाल दूं! अब मेरा भी यही हाल है! यह कुआं क्या है हम कह नहीं सकते! कह वही सकता है जिसने कुआं बनाया हो! बोतल बंद पानी पीने वाली पीढ़ी को कुएं की महिमा नहीं मालूम!
मेरे दरवाजे वाले कुएं का जो हाल है उससे ज्यादे उपेक्षित हाल गांव के अन्य कुओं का है । फिर भी वे हैं। अब इन कुओं की शुभ अवसरों पर पूजा भर होती है। बस !
नयी पीढ़ी के शहरी लोग कुओं को बचाये रखने की जो हमारी ज़िद है, उस पर हंसेंगे। लेकिन मेरी तरह मेरे गांव के लोग इन कुओं को अभी भी बचाए रखना चाहते हैं-भले इनका कोई उपयोग न हो।
सिर्फ उपयोगी चीजों को ही सब कुछ मानने की सीख हमारे बाप-दादा ने हमें नहीं दी है ! सो, हम क्या करें !

गांधी की कल्पना का गांव स्वावलंबी था
गांधी ने जिस गांव की कल्पना की थी वह स्वावलंबी गांव था, जो अपनी अधिकांश जरूरतें स्वयं पूरी करने की क्षमता रखता था और जो प्रकृति के साथ जीने की ओर उन्मुख था, लेकिन हमारी पूरी विकास नीति चूंकी नगरोन्मुख है इसलिए गांव लगातार पिछड़ते गए और हमारा सारा जोर नगरों के विकास पर रहा, नगरीय सुविधाओं के विकास पर रहा। आज अगर गांव को जीने लायक बनाना है तो हमें अपनी विकास नीति बदलनी होगी। बड़े उद्योग-धंधों की जगह छोटे और कुटीर उद्योग धंधों का विकास करना होगा और अतिशय उत्पादन और अतिशय भोग वाली बाजारवादी नीति का परित्याग करना होगा। आज गांव मेरे लिए भावुकता है। वह मेरी संवेदना का हिस्सा है, लेकिन समय का यथार्थ नगर ही है। आदमी का काम भावुकता से नहीं चलता। उसे जीवन की सच्चाईयों से दो चार होना पड़ता है।
(जाने माने साहित्यकार व दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर)

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