August 17, 2018

अनमोल विरासत है कुरसेला का सर्वोदय आश्रम

कुमार कृष्णन

सलाहकार संपादक, पंचायत खबर

-गांधी के रचनात्मक कार्यों को आगे बढ़ाकर जिंदा रखने के लिए कर रहे संघर्ष

बिहार के कटिहार जिले के कुरसेला का सर्वोदय आश्रम गांधी की स्मृतियों से जुड़ा अनमोल विरासत है। इस विरासत को लोग यहाँ गांधी के रचनात्मक कार्यों को आगे बढ़ाकर जिंदा रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। आज जब चंपारण सत्याग्रह का शताब्दी वर्ष मनाया जा रहा है और इस आश्रम की स्थापना के 70 वर्ष हो रहे हैं तो ऐसे में गांधी के रचनात्मक कार्यो को आगे बढ़ाकर ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि दी जा सकती है। यहाँ चल रहे रचनात्मक कार्यों से प्रेरित होकर देश भर से जुटे गांधीवादियों ने इस कार्य में अपना सहयोग देने का भरोसा दिलाया है।

सन् 1934 में बिहार में आए प्रलयंकारी भूकम्प के पीड़ितों के सहायतार्थ महात्मा गाँधी 11 मार्च 1934 को बिहार आये। इस बिहार यात्रा के अन्तिम दिन 10 अप्रैल 1934 को रूपसी (असम) जाने के क्रम में वे टिकापट्टी (पूर्णिया) होते हुए कुर्सेला पधारे थे, उस दौर में कुर्सेला भी पूर्णिया जिले का भाग था। महात्मा गाँधी ने विद्यालयी छात्रों के विशेष अनुरोध पर उन्हें सम्बोधित किया था। 1942 के आंदोलन में भी यह क्षेत्र काफ ी अग्रणी रहा। 13 अगस्त 1942 के देवीपुर गोलीकांड में लालजी मंडल, धतुरी मोदी, रमयु यादव, जागेश्वर यादव सहित कई शहीद हुए।

30 जनवरी 1948 को महात्मा गाँधी की शहादत के बाद बिहार के अग्रणी सर्वोदयी नेता बैद्यनाथ प्रसाद चौधरी के नेतृत्व में स्थानीय कार्यकर्त्ताओं ने बापू के पार्थिव अंश को 12 फरवरी 1948 गंगा-कोसी के संगम में विसर्जित किया था। बैद्यनाथ चौधरी इस जिले फ लका के बरेटा में ख्याति प्राप्त स्वतंत्रता सेनानी थे, जो महात्मा  गाँधी के आह्वान पर 1920 में आजादी की लड़ाई में शरीक हुए। अप्रैल 1952 में सेवापुरी उत्तरप्रदेश में हुए चौथे सर्वोदय समाज सम्मेलन में बिहार के जिन अग्रणी समाजसेवकों का कुछ अग्रणी समाज सेवकों का इरादा विनोबाजी को बिहार लाने का था, उनमें बैद्यनाथ चौधरी एक थे।

इस आश्रम की स्थापना सन् 1948 में सौराष्ट्र के गाँधीवादी कार्यकर्ता भगवन्न स्वामी द्वारा की गई तथा आश्रम के लिए 9.15 एकड़ जमीन स्थानीय ग्रामीण बौकु साह एवं गोविन्द साह ने उपलब्ध करायी। इस जमीन पर आश्रम के साथ-साथ सर्वोदय महाविद्यालय, तथा एक स्कूल है। आश्रम की गतिविधियों को संत विनोबा भावे, लोकनायक जयप्रकाश नारायण, डॉ. जाकिर हुसैन, डॉ.राजेन्द्रप्रसाद, दादा धर्माधिकारी, कामराज नाडार, यू.एन ढ़ेवर, कर्पुरी ठाकुर, एमएल जोशी जैसे लोगों ने नजदीक से देखा और सराहा। बाद में इस आश्रम को केन्द्रीय गाँधी स्मारक निधि, दिल्ली द्वारा ”गाँधीघर” के रूप में नामित किया गया था तथा बीस हजार रूपये की आर्थिक सहायता भी उपलब्ध करायी गई थी। बाद में, आश्रम स्थानीय सहयोग से ही संचालित होने लगा। यहाँ ग्राम सफाई, रात्रि पाठशाला और चरखा जैसे कार्यक्रम संचालित होते थे, लेकिन कालान्तर में सब के सब बंद होते चले गए। बाद में जब 1995 में आम सभा के माध्यम से  नरेश यादव की अध्यक्षता में 21 सदस्यीय कमेटी बनी तो गाँधी के रचनात्मक कार्यो को बढ़ावा देने का प्रयास तेज हुआ। राज्यसभा सदस्य रहते हुए तो उन्होंने अपने विकास निधि से चाहरदिवारी, मंडप जैसे कई काम करवाए। लेकिन उन्हें इस काम में दूसरे राज्यसभा सदस्यों से सहयोग लेने में परेशानी ही परेशानी का सामना करना पड़ा।

आश्रम के अध्यक्ष पूर्व राज्यसभा सदस्य नरेश यादव बताते हैं कि यह वर्ष आश्रम की स्थापना का 70 वां वर्ष है।  पाँच सालों के लिए गांधी के सपनों का भारत बनाने की दिशा में एक्शन प्लान बनाकर लागू भी करना है। गाँधी स्मृति एवं दर्शन समिति, नई दिल्ली ने इसे गाँधी व्याख्या केंद्र के रूप में चयन कर एक परिसर का निर्माण कराया है। इसमें गाँधी की प्रतिमा के साथ-साथ गाँधी की स्मृतियों जुड़ी प्रदर्शनी भी है। वहीं बिहार सरकार के पर्यटन विभाग ने इस आश्रम को गाँधी सर्किट से जोड़ते हुए पर्यटन केन्द्र के रूप में विकसित करने योजना 2.42 करोड़ रुपये की लागत से तैयार की है। इसके तहत बहुद्देशीय प्रशाल के साथ-साथ ओपेन एयर थियेटर और हॉटीकल्चर के विस्तार की योजना है।

इस आश्रम से जुड़े रूपेश कुमार बताते हैं कि गाँधी के रचनात्मक कार्यों में साम्प्रदायिक एकता, अस्पृश्यता उन्मूलन, ग्रामीण उद्योग, स्त्री उद्धार, प्रौढ़ शिक्षा, सेहत, शारीरिक शिक्षा, राष्ट्र भाषा, किसान, मजदूर, आदिवासी और कुष्ठ रोगी से संबंधित कार्य हैं। इन सारी चीजों के केन्द्र में गाँव थे। अब यह प्रयास किया जा रहा है कि इस क्षेत्र को गाँधी के मॉडल का क्षेत्र बनाया जाए। गाँधी विचार को तो प्रयोग के आधार ही परखा जा सकता है। इसकी पहल आरंभ हो गयी है। स्वास्थ मेला और कृषि मेला आयोजित कर लोगों को जागरूक किया जा रहा है।

हरिजन सेवक संघ, नई दिल्ली के अध्यक्ष शंकर सान्याल बताते हैं कि ‘हरिजन सेवक’ में एक स्थान पर उन्होंने लिखा है कि हर एक गाँव का प्रथम कार्य यह होगा कि वह अपनी जरूरत का तमाम अनाज और कपड़े के लिये कपास खुद पैदा करे। उसके पास इतनी सुरक्षित जमीन होनी चाहिये जिसमें पशु चर सकें और गाँव के बड़ों तथा बच्चों के मन-बहलाव के साधन और खेल-कूद के मैदान वगैरह का बंदोबस्त हो सकें, उन्होंने कहा था कि हर गाँव को पूर्ण रूप से एक आत्मनिर्भर इकाई होना चाहिये। गाँधी का यही जीवन-दर्शन व जीवन-मूल्य मनुष्यता की हिमायती हो जाती है। इस लिहाज से जैविक खेती, कचरा प्रबंधन के जो प्रयास किए जा रहे हैं वह महत्वपूर्ण है। आनेवाले दिनों में यह मॉडल बनेगा। राजघाट समाधि समिति, नई दिल्ली के सचिव डॉ. रजनीश कुमार बताते हैं कि गाँधी के नाम पर रस्म अदायगी से सुंदर है कि कुछ काम हो और यहाँ होता दिखता है। कटिहार के जिलापदाधिकारी मिथलेश मिश्र बताते हैं कि इस प्रखंड को खुले में शौच से मुक्त किया गया है। इस आश्रम के द्वारा लोगों में सुबह श्रमदान की प्रवृत्ति विकसित का जा रही है। स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि सामूहिकता रचनात्मक कार्यों में विकसित की जाए तो आनेवाले दिनों में यह क्षेत्र गाँधी के मॉडल पर खरा दिखेगा।

1934 में बिहार में आए प्रलयकारी भूकम्प के पीड़ितों के सहायतार्थ महात्मा गांधी 11 मार्च 1934 को बिहार आए थेा। इस बिहार यात्रा के अन्तिम दिन 10 अप्रैल 1934 को रूपसी (असम) जाने के क्रम में वे टिकापट्टी (पूर्णिया) होते हुए कुर्सेला पधारे थे. उस समय कुर्सेला भी पूर्णिया जिले का भाग था. महात्मा गांधी ने विद्यालयी छात्रों के विशेष अनुरोध पर उन्हें सम्बोधित किया थाा। 1942 के आंदोलन में भी यह क्षेत्र काफी अग्रणी रहा. 13 अगस्त 1942 के देवीपुर गोलीकांड में लालजी मंडल, धतुरी मोदी, रमयु यादव, जागेश्वर यादव सहित कई शहीद हुएा। 30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी की शहादत के बाद बिहार के अग्रणी सर्वोदयी नेता बैद्यनाथ प्रसाद चौधरी के नेतृत्व में स्थानीय कार्यकर्त्ताओं ने बापू के पार्थिव अंश को 12 फरवरी 1948 को गंगा-कोसी के संगम में विसर्जित किया थाा।

 बैधनाथ चौधरी इस जिले फलका के बरेटा में ख्याति प्राप्त स्वतंत्रता सेनानी थे, जो महात्मा गांधी के आह्वान पर 1920 में आजादी की लड़ाई में शामिल हुएा। अप्रैल 1952 में सेवापुरी उत्तर प्रदेश में हुए चौथे सर्वोदय समाज सम्मेलन के लिए विनोबा जी बिहार के जिन अग्रणी समाजसेवकों को लाए थे, वैद्यनाथ चौधरी उनमें से एक थेा। कुर्सेला के इस आश्रम की स्थापना 1948 में सौराष्ट्र के गांधीवादी कार्यकर्त्ता भगवन्न स्वामी द्वारा की गईा। आश्रम के लिए स्थानीय ग्रामीण बौकु साह एवं गोविन्द साह ने 9.15 एकड़ जमीन उपलब्ध कराई थीा।

इस जमीन पर आश्रम के साथ-साथ सर्वोदय महाविद्यालय तथा एक स्कूल भी हैा। आश्रम की गतिविधियों को संत विनोबा भावे, लोकनायक जयप्रकाश नारायण, डॉ जाकिर हुसैन, डॉ राजेन्द्र प्रसाद, दादा धर्माधिकारी, कामराज नाडार, यूएन ढ़ेवर, कर्पुरी ठाकुर, एमएल जोशी जैसे लोगों ने नजदीक से देखा और सराहाा। बाद में इस आश्रम को केंद्रीय गांधी स्मारक निधि, दिल्ली द्वारा गांधीघर के रूप में नामित किया गया तथा बीस हजार रुपए की आर्थिक सहायता भी उपलब्ध कराई गई थीा। बाद में यह आश्रम स्थानीय सहयोग से ही संचालित होने लगाा। यहां ग्राम सफाई, रात्रि पाठशाला और चरखा जैसे कार्यक्रम संचालित होते थे, लेकिन कालान्तर में सब के सब बंद होते चले गएा।

1995 में आम सभा के माध्यम से जब नरेश यादव की अध्यक्षता में 21 सदस्यीय कमेटी बनी, तो गांधी के रचनात्मक कार्यों को बढ़ावा देने का प्रयास तेज हुआा। राज्यसभा सदस्य रहते हुए नरेश यादव ने अपनी विकास निधि से यहां चाहरदिवारी और मंडप निर्माण जैसे कई काम करवाएा। आश्रम के अध्यक्ष नरेश यादव  बताते हैं कि यह आश्रम की स्थापना का 70वां वर्ष है. इस अवस पर पर हम गांधी के सपनों का भारत बनाने की दिशा में पांच साल का एक्शन प्लान बनाकर लागू कर रहे हैं। गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति नई दिल्ली ने गांधी व्याख्या केंद्र के रूप में इसका चयन कर एक परिसर का निर्माण कराया है, जिसमें गांधी की प्रतिमा के साथ-साथ गांधी की स्मृतियों से जुड़ी प्रदशर्नी भी हैा। (चौथी दुनिया से साभार)

 

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एक दशक से भी ज्यादा से पत्रकारिता में सकिय। संसद से लेकर दूर दराज के गांवो तक के पत्रकारिता का अनुभव। ग्रामीण समाज व जनसरोकार से जुड़े विषयों पर पत्र पत्रिकाओं में लेखन। अब पंचायत खबर के जरिये आपके बीच।

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