July 14, 2020

कोरोना का संकट : आत्मनिर्भर गांव

डॉ चन्द्रशेखर प्राण

विगत 17 मई 2020 को तीसरी सरकार अभियान द्वारा ‘कोरोना का संकट और आत्मनिर्भर गांव’ विषयक वेबिनार का आयोजन मीट ऐप के माध्यम से किया गया। इस चर्चा में देश के विभिन्न क्षेत्रों से 40 से अधिक प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इन प्रतिनिधियों में जहां एक और ग्रामीण क्षेत्रों में सक्रिय सामाजिक संगठनों, पंचायती राज संस्थाओं के प्रमुख शामिल हुए वहीं दूसरी ओर बतौर संदर्भ व्यक्ति प्रमुख शिक्षाविद, प्रशासनिक अधिकारी, पत्रकार तथा उद्यमी भी शामिल रहे।
वेबिनार का उद्देश्य वर्तमान समय में कोरोना संकट से जूझ रहे गांव की वर्तमान वस्तु स्थिति तथा उसके तात्कालिक एवं दूरगामी समाधानों पर चर्चा करना था। रोजगार की तलाश में गांव से शहर गए कामगारों का बड़े पैमाने पर गाँव वापसी से जो तात्कालिक संकट पैदा हुआ है तथा भविष्य में उससे गाँव के पुनर्निर्माण का जो अवसर मिलने जा रहा है, उन दोनों पक्षों पर प्रतिनिधियों के बीच खुलकर विचार-विमर्श हुआ।


दिल्ली, महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों के शहरों से अपने गांव लौट रहे कामगार मजदूर, फुटकर व्यवसाई तथा प्राइवेट सेक्टर में काम करने वाले कर्मचारी जिन्हें “प्रवासी मजदूर” की संज्ञा दी गई है उनमें से एक बड़ी संख्या पूर्वी उत्तर प्रदेश एवं बिहार राज्य से है। इस क्षेत्र के प्रत्येक गांव में औसतन 40 से 50 कामगारों की वापसी हुई है। पिछले कुछ दिनों से संबंधित राज्यों में कोरोनावायरस की तेजी से बढ़ती हुई संख्या में इनका हिस्सा सर्वाधिक है। वास्तव में जिन शहरों में यह रह रहे थे वहां संक्रमण का प्रभाव तो अधिक था ही लेकिन जिस तरीके से यह आए हैं या लाए गए हैं उसमें भी उनके संक्रमित होने की काफी गुंजाइश थी। अब परिणाम सामने है।
इनके आगमन के साथ संबंधित क्षेत्र के गांव के जीवन में आशंका भय और दुख की स्थिति काफी चिंताजनक है। यह सही है कि यह अपने गांव आ रहे हैं लेकिन जैसा कि देखा जा रहा है इस महामारी ने परिवार के बीच में भी भय और दुराव की स्थिति पैदा कर दी है। गांव की बात तो अलग ही है।


गांव जो भारत के सामुदायिक समाज का सबसे बड़ा उदाहरण रहा है वह समाज की विसंगतियों से इस कदर प्रभावित हुआ है कि उसके संबंधों में दरार तो आई ही है कहीं-कहीं तो चौड़ी और गहरी खाई भी बन गई है। ऐसे में बड़ी उम्मीदों के साथ शहर से भाग कर आए कामगारों को अपने गांव में पराएपन और विरोधी स्वर कुछ ज्यादा सुनाई पड़ रहे हैं। लेकिन सद्भाव और भाईचारे के स्वर भी हैं। जिसके उदाहरण भी बराबर मिल रहे हैं। समय ने सामाजिक संबंधों पर राख की मोटी परत जरूर चढ़ा दी है लेकिन अभी उसके अंदर की तपन मौजूद है जिसका एहसास इस संकट की घड़ी में रह-रहकर सामने आ रहा है।
राज्य सरकारों ने गांव लौट रहे लोगों के लिए एक निश्चित अवधि तक क्वारंटाइन रहने का निर्देश दिया है और स्थानीय स्तर पर इसकी जिम्मेवारी ग्राम पंचायतों को सौंपी है। ग्राम पंचायतों की स्थिति अधिकांश जगहों पर संतोषजनक नहीं है। इसके कई कारण है जिसमें ग्राम पंचायतों की क्षमता और सामर्थ्य की दृष्टि से कमजोर होना एक बड़ा कारण है। सच्चाई तो यह है कि अधिकांश ग्राम पंचायतें अकेले प्रधान व मुखिया (ग्राम पंचायत अध्यक्ष) के सहारे टिकी है और वह भी उसे वे अपने हित-अहित के नजरिए से ज्यादा चलाते रहे हैं। कुछ गिने-चुने अध्यक्ष यदि उसे गांव के हित में चलाना भी चाहते हैं तो लोगों का अरुचि, उदासीनता, अविश्वास तथा साधनों का अभाव व सरकारी तंत्र की उपेक्षा के चलते वह भी कुछ ठीक से नहीं कर पा रहे हैं। दूसरी तरफ आने वाले ग्रामीणों में जो कमजोर वर्ग के हैं वह तो क्वारंटाइन सेंटर मैं रुकने को तैयार हो जाते हैं लेकिन जो सक्षम वर्ग के हैं वह उसके नियमों को ना मानकर अपने घरों में ही रहना पसंद कर रहे हैं। अब तो राज्य सरकारें भी इसे ही प्रोत्साहित कर रही हैं। वैसे स्वयं चलकर आए हुए लोग तो चोरी-छिपे अपने घरों में पहुंच ही जा रहे हैं। ऐसे में संक्रमण उनके परिवार से पड़ोस तक बड़ी तेजी से भी फैल रहा है।


गांव में संक्रमण के साथ-साथ संघर्ष भी बढ़ रहा है। पुराने विवाद और दुश्मनी फिर से तरोताजा हो रही है। यह संघर्ष हिंसक होता जा रहा है। पिछले हफ्ते इलाहाबाद में मुंबई से गांव आए तीन भाइयों का जमीन विवाद के कारण एक साथ हत्या इसका एक उदाहरण है। बहुत सारे जिलों में इस तरह की घटनाओं की ओर गांव तेजी से बढ़ रहा है। बेरोजगारी और भविष्य की अनिश्चितता ने ऐसे संघर्षों को बढ़ाने में मदद की है।
इतने सारे झंझावातो से जूझ रहे गांव को आत्मनिर्भर और स्वावलंबी बनाने के जो सपने बुने जा रहे हैं उसके सामने कई तरह के सवाल खड़े हो गए हैं। क्योंकि यह आत्मनिर्भरता व्यक्ति सापेक्ष ना होकर समाज सापेक्ष है और यह तभी संभव है जब उस समाज (गांव समाज) में परस्पर सद्भाव और सहयोग हो। गांव की आत्मनिर्भरता सिर्फ साधनों की उपलब्धता या प्राप्ति पर नहीं टिकेगी उसके लिए संबंधों की मजबूत भावनात्मक डोर और गहरा व ठोस संवेदनात्मक धरातल भी चाहिए तभी उसमें जीवंतता होगी अन्यथा वह जड़वत होगा। इसी नाते वेबिनार में शामिल प्रतिनिधियों ने गॉव वापस आ रहे कामगारों के प्रति प्यार और सहयोग की भावना के साथ उनकी परेशानी और पीड़ा के प्रति संवेदनशील व्यवहार पर विशेष जोर दिया। इसके लिए अपेक्षित सुविधाओं के अभाव के बावजूद स्थानीय स्तर पर समुदाय को ही संवेदनशील बनकर उनके अनुकूल भौतिक एवं भावनात्मक परिस्थितियाँ तैयार करनी होगी।


वास्तव में गांव के स्कूल अथवा किसी सार्वजनिक स्थान पर जो कोरनटाइन सेंटर बनाए गए हैं उनमें कुछ को छोड़कर ज्यादा तर मे अपेक्षित सुविधाओं का अभाव देखने को तो मिल ही रहा है साथ ही वहां की दिनचर्या भी उबाऊ और नीरस है। जबकि वहां पर रह रहा व्यक्ति मानसिक पीड़ा, सामाजिक उपेक्षा और शारीरिक कष्ट इन सब से गुजर रहा है। ऐसे में अगर इन सेंटरों पर न्यूनतम सुविधा के साथ-साथ उसके भावनात्मक एवं मानसिक तोष के लिए भी अनुकूल उपाय किए जाएं तो यह नीरसता और उबाऊपन मिट सकता है और उनके लिए सेंटर सुकून का स्थान बन सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों की लोक संस्कृति में गीत गायन और नाटकों की एक लंबी एवं समृधि सांस्कृतिक विरासत है। साथ ही खेल कूद और व्यायाम तो उनकी दिनचर्या के हिस्से ही रहे हैं और आज के इलेक्ट्रॉनिक युग में तो और भी बहुत सारे साधन विकसित हो चुके हैं। स्थानीय परिस्थिति और आवश्यकता के अनुसार इन सब को जोड़कर सेंटर के माहौल को बहुत ही रूचि पूर्ण और आनंददायी बनाया जा सकता है।
शहर से दूर गांव में स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच का अभाव और अव्यवस्था जगजाहिर है। ऐसे में स्थानीय स्तर पर इसके बचाव के तरीकों की पहचान तथा उनकी उपलब्धता सुनिश्चित करनी होगी। गांव के लोगों की प्रतिरोधक क्षमता के बेहतर होने के उदाहरण पहले से ही रहे हैं और इस समय भी वह दिखाई पड़ रहा है। यदि इसे स्थानीय जड़ी बूटियों तथा खान-पान के परंपरागत पौष्टिक तरीकों की उपलब्धता और स्वीकृति बन सके तो गांव में इस महामारी से काफी निजात पाया जा सकता है। बाकी इससे बचाव के राष्ट्रीय स्तर से जो तरीके बताए गए हैं – दो गज की दूरी, साबुन से हाथ धोना और चेहरा ढक कर रखना, इसके प्रति जागरूकता और समझ के प्रयास तो करने ही होंगे।
जहां तक रही राहत की बात तो केंद्र एवं राज्य सरकार के स्तर से जो प्रयास चल रहा है यदि वह सही रूप में गांव तक पहुंच जाए और उसका समुचित वितरण हो जाए तो वह पर्याप्त है। लेकिन इसमें भी काफी अनियमितता व धांधली देखने को मिल रही है। कुछ तंत्र के स्तर पर है तो कुछ स्थानीय स्तर पर।
इसके लिए जिला प्रशासन व स्थानीय शासन अर्थात पंचायत को एक प्रभावी भूमिका निभानी होगी। पंचायत के माध्यम से गांव में बनाई गई निगरानी समितियां ज्यादातर जगहों पर ठीक से काम नहीं कर पा रही हैं, इन्हें भी प्रभावी बनाना होगा।


24 अप्रैल को राष्ट्रीय पंचायत दिवस के अवसर पर “आत्मनिर्भरता” को प्रधानमंत्री ने कोरोना महामारी का सबसे बड़ा सन्देश बताते हुए इसकी शुरुआत गांव से किये जाने पर जोर दिया ।
आत्मनिर्भरता का आशय क्या है, इसे समझाना बहुत जरुरी है। यदि इसे सरलता से समझें तो इसका सीधा अर्थ अपने ऊपर निर्भर होना है। लेकिन किस चीज के लिए? यह समझाना ज्यादा महत्वपूर्ण है।
मनुष्य जीवन के दो आयाम हैं। पहला जीवन का होना अर्थात उसका अस्तित्व। दूसरा जीवन का विकास अर्थात ज्ञान ,कला ,प्राद्योगिकी आदि के साथ साधनों की उपलब्धता और सम्पर्क का विस्तार जैसी चीजें।
इसमें पहली चीज ऐसी है कि जब वह होगी तभी दूसरी होगी। इसी नाते आत्मनिर्भरता मूलत: पहले के अर्थ में अधिक प्रासंगिक है अर्थात स्वयं के होने के लिए हैं। यह अस्तित्व से जुड़ी है। अगर इसके लिए हम किसी और पर आश्रित हों तो सोचिये हम कहां खड़े हैं और कब तक खड़े रहेंगे?
हमारे जीवन या अस्तित्व की शर्त क्या है ? वह किस पर टिका होता है ?
मोटे तौर पर हवा, पानी और भोजन। लेकिन एक कदम और आगे बढ़े अर्थात सामाजिक अस्तित्व के लिए तो कपड़ा व मकान भी अनिवार्य हो जाता है।
इस प्रकार ये पांच चीजें हमारे व्यक्तिगत व सामाजिक जीवन की ऐसी आवश्यकता है जिसके अभाव में वह सम्भव ही नहीं है। मोटे रुप में यह मनुष्य की मूलभूत भौतिक आवश्यकता है और यह आवश्यकता मुख्य रूप से इन्हीं पांच भौतिक तत्वों से बने शरीर की आवश्यकता है। शरीर है तभी हमारा अस्तित्व है व दुनिया में हमारा होना सिद्ध होता है।
इस नाते मोटे तौर पर इन पांचों चीजों के लिए स्वयं पर निर्भर होना ही आत्मनिर्भरता है। इसके आगे की आवश्यकता विकास के लिए है ,जिसके लिए सामान्यत: दूसरे की सहायता आवश्यक हो जाती है।
जिन पांच चीजों -हवा, पानी, रोटी, कपड़ा और मकान, की चर्चा ऊपर की गई वे मूलत: धरती पर सभी प्राणियों के लिए प्रकृति के रुप में ईश्वर का वरदान है। जो सब के लिय सहज उपलब्ध है। इसमें से हवा तथा पानी को उसके प्राकृतिक रुप में ही उपयोग किया जाता रहा है, लेकिन मनुष्य रोटी, कपड़ा और मकान की जरुरत को पूरा करने के लिए सभ्यता और सुविधा के नाम पर अपने तरीके से प्रसंस्कृत करके उसे उपयोग में लाने लगा है।
प्रकृति ने हवा तथा पानी का विपुल भंडार बिना किसी रोक टोक के दे रखा है। शताब्दियों से हम उसका उपयोग करते आ रहे हैं। वैसे तो वह भविष्य के लिए भी संरक्षित है, लेकिन पिछ्ले कुछ दशकों से जिस तरह से उसका दोहन,दुरुपयोग तथा दूषण हो रहा है उससे वह भी संकट के दायरे में है।
मनुष्य को मुख्य रुप से अपनी रोटी (स्वस्थ जीवन के लिए पोषक तत्व), मकान (गर्मी, बरसात तथा ठंड से बचत व सुरक्षा का आधार) और कपड़ा (सामूहिक जीवन के लिए जरुरी उपकरण) की चिंता करनी होती है।जब इसे वह अपनी सामर्थ्य से जुटा लेता है तो वह आत्मनिर्भर होता है। अपने जीवन व अस्तित्व के लिए किसी और के भरोसे या दया पर निर्भर नहीं होता। वैसे तो व्यक्तिगत स्तर पर इन तीनों की न्यूनतम सामान्य व्यवस्था वह स्वयं कर ही लेता रहा लेकिन अपने स्वभाव व आवश्यकता के कारण सहज रुप से निर्मित समाज के सामुदायिक जीवन हेतु विकसित परिवार और पड़ोस के सदस्यों के परस्पर सहयोग से इसकी पूर्ति करने लगा। इसी सामुदायिक इकाई को गांव की संज्ञा मिली। यह परस्पर सहयोग इसी अर्थ में गांव की आत्मनिर्भरता का मूल कारक तत्व व आधार बनता है।


प्रधानमंत्री ने अपने सम्बोधन में चार स्तरों (गाँव, जिला, राज्य व राष्ट्र) की आत्मनिर्भरता की बात की है। महात्मा गांधी और जय प्रकाश नारायण ने इसके पाँच स्तर बताये थे। इन चारों के अतिरिक्त गाँव और जिले के बीच में कुछ गॉवों के समूह को भी एक स्तर माना था, जिसे क्षेत्र या ब्लॉक की संज्ञा दी गई है। वास्तव में आत्मनिर्भरता के लिए यही पाँच क्षेत्र होने भी चाहिए। ये ज्यादा व्यावहारिक व सुविधाजनक है।
उदाहरण के तौर पर गाँव प्राथमिकता के आधार पर अपनी ऊपर वर्णित जरूरतों की पूर्ति अपने गाँव के स्तर पर ही करने की कोशिश करें उसमें से जो संभव न हो पा रहा हो उसके लिए कुछ गाँव मिलकर अपनी सुविधा और संपर्क के अनुसार आसपास के गांवों के समूह बनाकर उसकी पूर्ति करें। यदि इससे भी कुछ चीजें छूट जाती है तब जिला स्तर पर या उससे ऊपर जाने की जरूरत पड़ती है। यहाँ यह महत्वपूर्ण है कि अस्तित्व (व्यक्ति और गाँव और दोनों के) के लिए आवश्यक साधनों की उपलब्धता गाँव में ही हो इसका प्रयास किया जाना चाहिए। गाँव से बाहर उन्हीं चीजों के लिए सहयोग या आश्रय लिया जाय जो किसी भी दशा में गाँव के स्तर पर फिलहाल संभव नहीं है। फिलहाल शब्द का प्रयोग इसलिए है कि गाँव देर सवेर अपनी क्षमता को बढ़ा कर इस वस्तुस्थिति को बदल भी सकता है।


इसी प्रकार क्षेत्र या ब्लॉक के स्तर की आवश्यकता व क्षमता का भी आंकलन करके उसकी आत्मनिर्भरता की रेखा निर्धारित करनी होगी। संभव है ज्यादातर भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति इसी स्तर तक या जिला तक पूरी हो जाय, उससे ऊपर अर्थात प्रदेश या देश के स्तर पर जाने की आवश्यकता ही न पड़े, यदि पड़े भी तो बहुत कम। गाँव की आत्मनिर्भरता का यही स्वरूप सबसे बेहतर होगा। लेकिन यहाँ यह स्पष्ट होना जरूरी है कि प्रदेश तथा देश की आवश्यकतायें इससे अलग तरह की होगी, वहां सिर्फ जीवन यापन की मूलभूत भौतिक आवश्यकतायें ही नहीं होगी बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, संचार, सुरक्षा (आंतरिक व वाह्य दोनों), प्रौद्योगिकी जैसी जरूरतों की प्राप्ति इस स्तर पर प्राथमिकता का विषय होगी।
इस प्रकार इन पांचों स्तर की आत्मनिर्भरता के बीच में रूपगत भिन्नता होगी लेकिन मूल्यगत नहीं। मूल्यगत भाव यही होगा कि सभी स्तर अपनी अपनी प्राथमिक आवश्यकताओं के लिए स्वयं के स्तर पर ही अधिकतम साधन पैदा करने का उपक्रम करें जो संभव हो पा रहा हो उसे क्रमशः अगले स्तरों के सहयोग से जुटाने का प्रयास करें। गाँव से लेकर देश स्तर की आत्मनिर्भरता का यही अर्थ व स्वरूप हो सकता है।


आत्मनिर्भरता का यह स्वरूप और भाव सिर्फ साधनों की दृष्टि से ही नहीं बल्कि शासन और न्याय की दृष्टि से होना चाहिए। क्योंकि जीवन चाहे वह व्यक्ति का हो या किसी समाज अथवा देश का, वह समग्रता में होता है खंडों में नहीं। इसी नाते आत्मनिर्भरता को भी समग्रता में भी देखना होगा। इसी अर्थ में राजनैतिक सत्ता और आर्थिक व्यवस्था दोनों के विकेन्द्रीकरण की बात की जाती रही है। जिसे महात्मा गांधी से लेकर आज तक के सभी राष्ट्रनायकों में एक स्वर से सुना जा सकता है। यह अलग बात है कि कौन कितना ईमानदारी के साथ इसे व्यवहारित कर रहा था या करेगा।


आत्मनिर्भरता को ही दूसरे शब्दों में स्वावलंबन के रूप में उद्घृत किया जाता है। यह स्वावलंबन बिना स्वराज्य के, प्राप्त नहीं किया जा सकता। यदि देश को स्वराज्य अर्थात आजादी (अपने बारे में विचार करने की, निर्णय लेने की और करने की) न मिलती तों स्वावलंबी होने का सपना ही बेमानी था। इसी प्रकार प्रदेश, जिला और गाँव को भी अपनी आवश्यकता और सीमा में जब स्वराज्य मिलेगा तभी उसके स्वावलंबी अथवा आत्मनिर्भर होने का मार्ग खुलेगा।
आजादी के समय महात्मा गांधी के सपनों के अनुसार देश को स्वराज्य और स्वावलंबन की दृष्टि से आगे ले जाने के लिए संविधान का एक वैकल्पिक गांधीवादी ड्राफ्ट श्रीमन नारायण अग्रवाल द्वारा तैयार किया गया था। जिसमें सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक व्यवस्था का जो प्रारूप दिया गया था वह इसी दिशा में था। यह अलग बात है कि उसके अनुसार संविधान को तैयार नहीं किया जा सका और आज भी यदि दृढ़ संकल्प और ईमानदारी के भारतीय राष्ट्र और उसके गांवों की आत्मनिर्भर बनाना चाहते हैं तों हमें एक बार पुनः गाँव समाज के पुनर्जागरण और राज्यसत्ता की पुनर्रचना पर विचार करना होगा। इसी से गांवों में पुनर्निर्माण का रास्ता खुलेगा जो गाँव के साथ साथ भारतीय राष्ट्र के सभी स्तरों को सही अर्थों में आत्मनिर्भर बनायेगा।

(यथावत से साभार)

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