July 14, 2020

कोरोनाकालीन संकट के बीच रामभरोसे चल रहा है जीवन, सबसे ज्यादा प्रभावित हैं बच्चे

संतोष कुमार सिंह

  • राइट टू एजुकेशन (आरटीई) फोरम द्वारा 6 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के अधिकारों की अनदेखी एवं मौजूदा दौर की चुनौतियों पर आयोजित वेबिनार में वक्ताओं की राय

नयी दिल्ली: कोविड—19 महामारी के दौरान सरकार ने लॉक डाउन की घोषणा की। स्वाभाविक रूप से सरकार ने जब ऐसा किया होगा तो दृष्टि इस बात पर होगी कि हमें अपने लोगों का जीवन बचाना है। उन्हें महामारी के चपेट में आने से बचाना है। लेकिन जैसा कि हर आपदा के दौरान होता रहा है चाहे प्राकृतिक आपदा हो या मानव निर्मित आपदा अक्सर हमारे नौनिहाल नीति निर्धारकों के रडार से बाहर ही होते हैं। क्योंकि वोट तो उन्हें देना नहीं है तो फिर उनकी परवाह कौन करे। आम तौर पर घरों में भी माता पिता ये कहते हुए आपको मिल जाएंगे अभी तो बच्चा है लेकिन हम ऐसा कहते हुए ये भूल जाते हैं कि इसी बच्चे को कल बड़ा भी होना है और बड़ा होकर तभी वह खुशहाल नागरिक के रूप में देश की तरक्की में योगदान दे सकता है जब वर्तमान खुशहाल हो। खैर सब चलता है की धारणा रखने वाले इस देश में इस देश में जब लॉकडाउन घोषणा की गई उस वक्त से लेकर अब तक न जाने कितने लोगों को राहत देने की बात की गई होगी। लेकिन इन सरकारी घोषणाओं और कल्याणी योजनाओं से हमारे नौनिहाल लगभग बाहर ही रहे। विशेष रूप से वे बच्चे जो 0 से 6 साल की उम्र में आते है। टीकाकरण का पुख्ता प्रबंध नहीं। पोषाहार प्रदान करने वाले आंगनवाड़ी सेवाएँ लगभग पूरी तरह बन्द है। हालांकि सरकार का दावा है कि सरकार इन बच्चों के लिए घर में आहार भेज रही है। ऐसे में कोरोना काल में बच्चों का पालन पोषण कैसे हो रहा है इसके मॉनिटिरिंग की व्यवस्था भी राम भरोसे ही चल रही है। इसके अभाव सबसे ज्यादा यदि कोई प्रभावित हुआ है तो हाशिये पर रहने वाला समाज। उनका जीवन ही सु​र​क्षित नहीं तो मॉनिटरिंग की परवाह कौन करे। नतीजा साफ है प्रत्येक दिन 1000-1500 बच्चों की मृत्यु हो रही हैं।

 

हालांकि इसकी चिंता किसी को नहीं है लेकिन स्थिति बेहद ही चिंताजनक है। लाखों लाख लोग सड़क पर हैं और जिसमें उनके बच्चे भी शामिल हैं। जहां तक शिक्षा का सवाल है स्कूल कब खुलेगा पता नहीं आॅन लाईन क्लास के नाम पर अतिरिक्त बोझ अलग से बावजूद इसके कि सामान्य दिनों में नेटवर्क की उपलब्धता नहीं होती। लेकिन खानापूर्ती तो करनी ही है क्योंकि सब चलता है? ऑनलाइन शिक्षा के इस दौर में नेटवर्क, मोबाइल चार्ज, डाटा पैक से लेकर मोबाइल सेट की अनुपलब्धता जैसी बुनियादी समस्याओं ने व्यापक आबादी को शिक्षा के दायरे से बाहर कर दिया है। कई मंचों पर आॅनलाईन शिक्षा को क्लास रूम शिक्षा का विकल्प बता मुंगेरी लाल के हसीन ख्वाब सजाये जा रहे हैं यह जानते हुए भी ऑनलाइन प्लेट्फॉर्म्स तकनीकी तौर पर चाहे जितने भी उन्नत हों, वे नियमित स्कूली शिक्षा के विकल्प कतई नहीं हो सकते। साफ है बच्चों को अनदेखी करके न तो कोई समाज आगे बढ़ा है और न ही हम और हमारा समाज आगे बढ़ सकता है।

इन्हीं सब सवालों के इर्द गिर्द राइट टू एजुकेशन फोरम द्वारा “कोविड-19 संकट: 6 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के अधिकार व चुनौतियां” विषय पर वेबीनार का आयोजन हुआ।

इस वेब-संवाद में अम्बेडकर विश्वविद्यालय में प्रो॰ (एमेरिटस) विनीता कौल, इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविदायलाय (इग्नू) की प्रो रेखा शर्मा सेन, शिक्षा विशेषज्ञ (अर्ली चाइल्डहुड एंड केयर) यूनिसेफ सुनीषा आहूजा ने संबोधित किया। एलायंस फॉर राइट टू ईसीडी की संयोजक एवं 6 साल से कम उम्र के बच्चों की शिक्षा–स्वास्थ्य–पोषण पर एक समग्र दृष्टि के साथ बतौर विशेषज्ञ लंबे समय से कार्यरत, सुमित्रा मिश्रा ने अपनी बात विस्तार से रखी।
क्या कहा विशेषज्ञों ने

अपने संबोधन में यूनिसेफ की प्रतिनिधि एवं बाल्यावस्था के दौरान शिक्षा एवं देखभाल की विशेषज्ञ सुनीषा आहूजा ने कोविड से उपजे वैश्विक संकट का जिक्र करते हुए कहा कि आज की मुश्किल घड़ी में हम 6 वर्ष से कम उम्र के उन नौनिहालों के अधिकारों पर बात कर रहे हैं जो हमारे देश का भविष्य हैं। कोविड – 19 के बारे में जानकारी देने तथा सतर्कता बरतने के लिए यूनिसेफ और सरकार के बातचीत के बाद एक कार्ययोजना बनाई गई। ये सहमति बनी कि आंगनवाड़ी तथा आशा कार्यकर्ता घरों तक पहुँच में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

 

आहूजा ने चिंता जताते हुए कहा, “अभी आंगनवाड़ी सेवाएँ लगभग पूरी तरह बन्द हैं। ग्रोथ मॉनिटरिंग नही होने के कारण कुपोषित और अतिकुपोषित बच्चे प्रभावित हो रहे हैं। रोजाना 1000-1500 बच्चों की मृत्यु हो रही हैं, जोकि बेहद चिंता का विषय है। आंगनबाड़ी केन्द्रों का संचालन कब से शुरू होगा कहा नहीं जा सकता। लेकिन पहले टीकाकरण, ग्रोथ मोनिटरिंग का काम शुरू किया जाये, उसके बाद ही सीखने-सिखाने की प्रक्रिया को शुरू करना उचित होगा।”
उल्लेखनीय है कि अभी हाल ही में यूनिसेफ द्वारा ‘पैरेंटिंग मैटर्स: एक्जामिनिंग पैरेंटिंग एप्रोचेज एंड प्रैक्टिसेज’ नामक एक अध्ययन कराया गया है जिसके आलोक में भारत में यूनिसेफ की प्रतिनिधि डॉ. यास्मीन अली हक ने कहा है कि, “इबोला संकट के हमारे अनुभव बताते हैं कि छोटे बच्चों के साथ हिंसा, दुर्व्यवहार और उपेक्षा होने की संभावना अधिक होती है क्योंकि परिवार जिंदगी से संघर्ष करने में व्यस्त रहते हैं, जिसका उन पर आजीवन प्रभाव पड़ सकता है। बच्चों के दोनों तरह के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को प्रोत्साहित करने के लिए सकारात्मक पेरेंटिंग अभ्यासों पर जागरूकता अब पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है।”
प्रो विनीता कौल ने कहा, “आज ऑनलाइन शिक्षा की बात ज़ोर-शोर से हो रही है हैरत ये है कि अत्यंत छोटे बच्चों को भी ऑनलाइन शिक्षा की वकालत की जा रही है जबकि इस ऑनलाइन शिक्षा ने अभिभावकों को काफी दबाव में ला दिया है। नेटवर्क, मोबाइल चार्ज, डाटा पैक से लेकर मोबाइल सेट की अनुपलब्धता जैसी बुनियादी समस्याओं ने व्यापक आबादी को शिक्षा के इस प्लैटफ़ार्म से बाहर कर दिया है।“

उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि ऑनलाइन शिक्षा की बात मान भी ली जाये, तो क्या सिर्फ शिक्षा से बच्चों का सामाजिक, शारीरिक, मानसिक विकास सम्भव होगा? घरों में बढ़ते घरेलू हिंसा के मामले भी बच्चों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है, इसलिए घर में भी सामाजिक-संवेदनशील वातावरण बनाए रखने की जरूरत है।

इग्नू विश्वविद्यालय की प्रो॰ रेखा शर्मा सेन ने कहा, “ऑनलाइन शिक्षा और दूरस्थ शिक्षा के फर्क को समझने की जरूरत है। उन्होने कहा कि ऑनलाइन प्लेट्फॉर्म्स तकनीकी तौर पर चाहे जितने भी उन्नत हों, वे नियमित स्कूली शिक्षा के विकल्प कतई नहीं हो सकते। एकतरफा संवाद ज्ञान साझा करने के मूल उद्देश्यों, सृजन और सीखने –सिखाने की प्रक्रिया को ही बाधित कर देता है। और 6 साल से छोटे बच्चों के लिए तो ये पूरी प्रक्रिया बेहद तकलीफदेह और उबाऊ हो जाएगी जो उनके शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर डालेगा।“

सुमित्रा मिश्रा, संयोजक, अलाइन्स फॉर राइट टू ईसीडी ने कहा कि मार्च में घोषित लॉकडाउन से लेकर अब तक सरकार के द्वारा बहुत सारी घोषणाएँ तो की गई, लेकिन इस उम्र के बच्चों को केंद्र में रखकर कुछ भी नहीं किया गया। ऐसे बच्चों को अनदेखी करके हम और हमारा समाज आगे नहीं बढ़ सकता है। उन्होंने निराशा जाहिर करते हुए कहा कि मीलों माँ–बाप के साथ पैदल चलते बच्चे, सूटकेस पर सोते हुए बच्चे, रास्ते में बच्चे का जन्म लेना, मृत मां के आंचल खीचते बच्चे जैसे दारुण दृश्य वाली घटनाएं भला कैसे किसी भी सभ्य समाज की पहचान हो सकती है। हमें सरकार की जवाबदेही और सामाजिक जिम्मेदारियों पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।”

वेबिनार की शुरुआत में राइट टू एजुकेशन फोरम के राष्ट्रीय संयोजक अम्बरीश राय ने कहा कि आज हम 6 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के शिक्षा और अधिकार पर बाते करेंगें। इस उम्र तक बच्चों के मस्तिष्क का 75 प्रतिशत विकास हो जाता है। इसलिए बच्चों की दृष्टि से प्रारम्भिक बाल्यावस्था देख-रेख एवम शिक्षा महत्वपूर्ण हो जाती है। नई शिक्षा नीति के मसौदे में भी इसे महत्वपूर्ण रूप से जगह दी गई है। लेकिन वह अंतिम रूप में किस तरह सामने आएगा ये देखना बाकी है। आज कोविड-19 के दौर में इस उम्र के बच्चों के सर्वांगीण विकास पर ध्यान देने की आवश्यकता है।
गौरतलब है कि इस वेब संवाद में सामाजिक कार्यकर्ताओं, शिक्षाविदों, शिक्षकों वेब–संवाद में हिस्सा लिया।

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