July 14, 2020

कोरोना के दौरान बाल अधिकारों का हो रहा है हनन, सकारात्मक पैरेंटिंग की है दरकार: यूनिसेफ

संतोष कुमार सिंह

नयी दिल्ली: कोविड—19 महामारी के दौरान वैसे तो समाज के सभी वर्गों पर व्यापक प्रभाव पड़ा है लेकिन सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं बच्चे। बच्चे समझ नहीं पा रहे हैं कि उनका दोष क्या है? क्यों उन्हें स्कूल जाने से रोका जा रहा है? क्यों उन्हें बाहर खेलने जा रहा है। जिस उम्र में ​वे निर्बाध रूप से मित्रों से मिलते जुलते थे, धमाचौकड़ी मचाते थे, उछलते कूदते थे, पार्क जाने की आजादी थी आखिर ऐसा क्या हुआ कि न तो वो बाहर जा पा रहे हैं, न खेल पा रहे हैं और चेहरे पर मास्क चढ़ा दिया गया है। उनके इन सवालों का जवाब न माता-पिता के पास है, न स्कूल के पास, न सरकार के पास। यही कारण है कि बच्चों पर इन बातों का मनौवैज्ञानिक असर हुआ है। वैसे में जब दुनिया कोविड-19 महामारी से आसन्न चुनौतियों का सामना कर रही है, इस कठिन घड़ी में बाल अधिकार के लिए काम करने वाली संस्था यूनिसेफ ने ‘पैरेंटिंग मैटर्स: एक्जामिनिंग पैरेंटिंग एप्रोचेज एंड प्रैक्टिसेज’ नामक एक अध्ययन के जरिए कहा है कि पांच राज्यों में कराये गये एक नये अध्ययन में भारतीय परिवारों में अनुशासन सिखाने के प्रयास के तहत कम से कम 30 प्रकार के शारीरिक एवं मौखिक उत्पीड़न की घटनाएं होती है। इतना ही नहीं इस दौरान यह भी पाया गया कि लड़कियों और लड़कों की परवरिश भी बहुत कम उम्र से ही अलग-अलग स्तर पर भेदभाव किया जाता है तथा घरेलू कामकाज का बोझ एवं रोजमर्रा की बंदिशें पिता बेटियों पर लगाते हैं। उल्लेखनीय है कि यह अध्यययन मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और ओडिशा के दो-दो जिलों, राजस्थान के तीन और महाराष्ट्र के चार जिलों में किया गया।


यह अध्ययन ऐसे वक्त में कराया गया है ​जब एक जून को वैश्विक माता-पिता दिवस मनाया गया। ऐसे में वैश्विक स्तर पर बाल अधिकार व बच्चों के बेहतरी के लिए काम करने वाली संस्था यूनीसेफ ने माता—पिता से आग्रह किया है वे प्रारंभिक अवस्था में बच्चों के पर​वरिश पर विशेष ध्यान दें। साथ ही सरकारों को भी इस दिशा में काम करने की अपेक्षा रखी कि सरकार व समाज की तरफ से प्रारंभिक बाल्यावस्था विकास कार्यक्रमों निवेश को प्राथमिकता दिये जाने की जरूरत है। साथ ही साथ यह सुझाव भी दिया गया कि इसके जरिए वैसे बाल मृत्यु जिन्हें रोका जा सकता है, बच्चों के खिलाफ होने वाले हिंसा को रोकने के लिहाज से व निरोध्य बाल मृत्यु व लंबी अवधि में आर्थिक सुधार और उत्पादकता बढ़ाने के लिहाज से महत्वपूर्ण है।
क्या है स्थिति
आमतौर पर यह देखा गया है कि संकट के समय छोटे बच्चों के उपयोग में आने वाली और उनके ​बे​हतर परवरिश से जुड़ी हुई ज्यादातर सेवाओं को अक्सर प्राथमिकता नहीं दी जाती है। परिणाम स्वरूप हम पाते हैं कि इस तरह से हम उनकी जरूरतों की अनदेखी करते हैं जिसका प्रभाव बच्चों पर व्यापक होता है। इस महामारी के काल में इस बात की संभावना है कि संसाधनों के अभाव में बच्चों से जुड़ी सुविधाओं और सेवाओं को आवश्यक न मानते हुए उनमें कटौती हो। जबकी होना यह चाहिए कि सरकारों के साथ-साथ, परिवारों और समुदायों को भी बच्चों के लिए पोषण और सुरक्षात्मक वातावरण के निर्माण में अपनी भूमिका और महत्व को व्यापक तौर पर समझे जाने की जरूरत है।


क्या कहता है यूनिसेफ
इन बातों के मद्देनजर यूनिसेफ की अगुआई में एक अध्ययन कराया गया जिसका विषय वस्तु है “पेरेंटिंग मैटर्स” के प्रमुख परिणाम : पेरेंटिंग दृष्टिकोण और अभ्यास की जांच, ज्ञान का आकलन, पेरेंटिंग पर माता-पिता, परिवार और बच्चों से जुड़े संस्थाओं का व्यवहार तथा और उनके द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया पर एक रिपोर्ट जारी किए गए। इस रिपोर्ट को देखें तो साफ जाहिर होता है कि कुछ बातों पर तत्काल कार्रवाई किये जाने की आवश्यकता है, विशेष रूप बच्चों को जिस तरह की हिंसा का सामना करना पड़ रहा है।
बच्चों के लिए शारीरिक और मौखिक दुर्व्यवहार के कम से कम 30 विभिन्न रूपों को चिन्हित किया गया है। इस अध्ययन में घरों में बच्चों के खिलाफ हिंसा के विभिन्न रूपों को बताया गया है। इसमें शारीरिक हिंसा, मौखिक दुर्व्यवहर तथा भावनात्मक दुर्व्यवहार भी शामिल है।
विभिन्न रूपों में होने वाली हिंसा का किया गया जिक्र
इस अध्ययन में परिवारों में बच्चों के विरूद्ध हिंसा के विभिन्न रूपों का जिक्र किया गया है. शारीरिक हिंसा में जलाना, चिकोटी काटना, थप्पड़ मारना, छड़ी, बेल्ट, छड़ आदि से पीटना शामिल है जबकि मौखिक हिंसा के तहत दोषारोपण, आलोचना करना, चिल्लाना, भद्दी भाषा का इस्तेमाल करना आदि आते हैं. इसके अलावा बच्चे माता-पिता में से एक के द्वारा दूसरे के प्रति, भाई-बहनों या परिवार के बाहर शारीरिक हिंसा देखते हैं. उन्हें बाहर जाने से रोकना, भोजन नहीं देना, भेदभाव करना, मन में भय पैदा करना जैसे भावनात्मक उत्पीड़न से भी गुजरना पड़ता है.

30 प्रकार के शारीरिक और मौखिक उत्पीड़न की घटनाएं

यूनिसेफ द्वारा कराए गये अध्ययन में कहा गया है, ‘‘अनुशासन का पाठ पढ़ाने के प्रयास के तहत कम से कम 30 प्रकार के शारीरिक एवं मौखिक उत्पीड़न सामने आये परिवारों में, स्कूलों में तथा सामुदायिक स्तर पर बच्चों, लड़के और लड़कियां दोनों को ही अनुशासन सिखाने के लिए दंडित करना व्यापक रूप से स्वीकार्य चलन है।’’
अध्ययन के अनुसार लड़कियों और लड़कों की परवरिश भी बहुत कम उम्र से ही अलग-अलग तरीके से की जाती है तथा घरेलू कामकाज का बोझ एवं रोजमर्रा की बंदिशें पिता बेटियों पर लगाते हैं। रिपोर्ट बताती है कि , ‘‘बच्चों की मुख्यतौर पर देखभाल करने वाली मां होती हैं जबकि पिता इन चीजों में कम शामिल होते हैं। पुरुष बस बच्चों को बाहर ले जाते हैं, मां ही उन्हें कहानियां और लोरियां/गाने सुनाकर घर के अंदर बच्चों में प्रेरणा भरती हैं।’’

क्या कहते हैं विशेषज्ञ

भारत में यूनिसेफ की प्रतिनिधि डॉ. यास्मीन अली हक ने कहा, “इबोला संकट के हमारे अनुभव बताते हैं कि छोटे बच्चों के साथ हिंसा, दुर्व्यवहार और उपेक्षा होने की संभावना अधिक होती है क्योंकि परिवार जिंदगी से संघर्ष करने में व्यस्त रहते हैं, जिसका उन पर आजीवन प्रभाव पड़ सकता है। बच्चों के दोनों तरह के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को प्रोत्साहित करने के लिए सकारात्मक पेरेंटिंग अभ्यासों पर जागरूकता अब पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है।”

चाइल्ड हेल्पलाइन पर प्राप्त शिकायतों के अनुसार अप्रैल में दो सप्ताह के लॉकडाउन के दौरान, परेशान बच्चों के द्वारा की गई कॉलों की संख्या में 50 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। लॉकडाउन में आवाजाही पर प्रतिबंध लगने और प्रीस्कूल तथा स्कूलों को बंद करने से अपने बच्चों की देखभाल और शिक्षा के लिए माता-पिता पर तत्काल दबाव बना है।
जब कोई बच्चा या वयस्क बिना शारीरिक या भावनात्मक शोषण, उपेक्षा, हिंसा के संपर्क में आता है, या आर्थिक तंगी का बोझ महसूस करता है, तो यह उनके तनाव की स्थिति में प्रतिक्रिया को सक्रिय करता है। लंबे समय तक तनाव व्यक्ति के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर स्थायी प्रभाव डाल सकता है – यहां तक की जीवन भर के लिए। शोध से यह पता चलता है​ कि जीवन में सही समय पर देखभाल का अभाव वयस्कों के साथ जवाबदेही पूर्ण रिश्ते को तनावग्रस्त और विशाक्त बनाते हैं। हमें इसके प्रभावों को रोक सकते हैं या इसे बेहतर कर सकते हैं। इसके लिए जरूरी है कि माता-पिता को तनाव और मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों से निपटने के साथ-साथ पाज़िटिव पेरेंटिंग की आवश्यकता है।
कोवीड -19 के तहत, आवश्यक सेवाओं के रूप में बाल संरक्षण सेवाओं को नामित करने की तत्काल आवश्यकता है। प्रतिक्रिया में मानसिक स्वास्थ्य और मनोसामाजिक सहायता और वैकल्पिक देखभाल व्यवस्था सहित महत्वपूर्ण स्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण और बाल संरक्षण सेवाओं का प्रावधान शामिल होना चाहिए। सबसे कमजोर बच्चों को, जिनमें प्रवासी और अनाथ बच्चे भी शामिल हैं, सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ये सेवाएँ सभी के लिए उपलब्ध होनी चाहिए। यूनिसेफ कहता है​ कि अपने बच्चे के विकास में सहायता करने के लिए देखभाल करने में माता के साथ पिता की भी उल्लेखनीय भूमिका है ऐसे में उनको भी इस दिशा में गुणवत्तापूर्ण भागीदारी करनी चाहिए।


अध्ययन में यह सुझाव भी दिया गया है कि महाराष्ट्र, ओडिशा, छत्तीसगढ़, असम, राजस्थान और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य अभिनव पेरेंटिंग कार्यक्रमों को लागू करने में अग्रणी हैं, जिन्हें अन्य राज्य अपना सकते हैं। यूनीसेफ के सहयोग से माता-पिता, विशेष रूप से पिता, को उनके घरों में और आसपास आसानी से उपलब्ध सामग्री का उपयोग करने के लिए जानकारी और कौशल प्रदान किया जा रहा है। कहानी सुनाने, गाने और बच्चों के साथ खेलने के माध्यम से माता-पिता का बेहतर और अधिक जुड़ाव हुआ है – बच्चे के मस्तिष्क के विकास के लिए यह सभी महत्वपूर्ण हैं। यह आंगनवाड़ी और आशा कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण के माध्यम से किया जा रहा है, इसलिए वे अपने मौजूदा प्लेटफार्मों का उपयोग माता-पिता के जुड़ाव के लिए प्रभावी रूप से कर सकते हैं जैसे कि मासिक माता-पिता की बैठकों और घर पर मुलाकात के माध्यम से। राज्यों ने ईट, प्ले और लव के महत्व को ध्यान में रख कर सभी माता-पिता और देखभालकर्ताओं को शामिल करने के लिए सामुदायिक कार्यक्रमों का आयोजन किया है, जैसे कि महाराष्ट्र में पलक (देखभालकर्ता) मेला।
यूनिसेफ अन्य सहयोगी संस्थाओं के साथ मिलकर, संस्था के वेबसाइट पर बच्चों के साथ प्रभावी ढंग से जुड़ने के लिए माता-पिता के लिए कई टूल / संसाधन / सलाह जारी कर रहा है और इस दिशा में लगातार सक्रिय है।

 

About The Author

Related posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *