April 04, 2020

जखनी गांव के देश का पहला जलग्राम बनने की कथा

उमाशंकर पांडे
अक्सर कहा जाता है कि ‘हिम्मते मरदा, मददे खुदा’। लेकिन एक मर्द ही क्यों पूरा का पूरा गांव, और न​ सिर्फ मर्द बल्कि स्त्री पुरूष जब  अपने गांव की तकदीर बदलने में लग जायें तो सिर्फ खुदा ही क्यों, पूरी कायनात उसके सामने नतमस्तक होती है और गांव वालों की खुद के परिश्रम को देखते हुए सिलसिला शुरू होता है बदलाव का। और इस जमीनी बदलाव को संबल देने के मदद को आगे आती है देश प्रदेश की सरकारें। यहां तक खुद हैं देश के माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने खेत के ऊपर मेड बनाकर परंपरागत तरीके से जल संरक्षण की बात कही है और इसे लेकर देश के प्रधानों, सरपंचों को जल संरक्षण के लिए लिखते हैं यह गांव उस प्रक्रिया की प्रयोग भूमी है। जी हां, यह गांव है जखनी।

पूरा बुंदेलखंड भले ही सूखे की चपेट में हो, बूंद-बूंद पानी के लिए लोग संघर्ष कर रहे हों लेकिन इसी बुंदेलखंड के बांदा ज़िले का एक गांव ऐसा भी है जहां कुंए और तालाब पानी से लबालब भरे हैं, खेतों में धान-गेहूं और सब्ज़ियों की जमकर खेती हो रही है और हैंड पैंपों में हर समय पानी आता है। जल ग्राम जखनी जहां के किसान नौजवान जल संरक्षण के लिए परंपरागत तरीके से समूह के आधार पर इस विधि का इस्तेमाल पिछले 18 सालों से कर रहे हैं।
ऐसा नहीं है कि इस गांव में प्रकृति ने कुछ अतिरिक्त ‘कृपा’ की है या फिर कोई दैवीय चमत्कार हुआ है बल्कि ये सब यहां के लोगों की सोच, मेहनत और उनकी आपसी एकता का प्रतिफल है। क़रीब पंद्रह साल पहले यहां की स्थिति भी वैसी ही थी जैसी कि बांदा और पूरे बुंदेलखंड के दूसरे गांवों की, लेकिन कुछ ग्रामीणों की सोच ने सब कुछ बदलकर रख दिया।


नीति आयोग के दस्तावेज में मिला जखनी को स्थान
नीति आयोग भारत सरकार ने भारत की वॉटर मैनेजमेंट इंडेक्स 2019 जारी किया जिस गांव जखनी के परंपरागत जल संरक्षण के सामूहिक प्रयास को देश के सामने मॉडल माना है वह गांव सूखे बुंदेलखंड के बांदा जनपद के अंतर्गत आता है। केंद्रीय जल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत, नीति आयोग के उपाध्यक्ष डॉ राजीव कुमार, नीति आयोग के मुख्य कार्यपालन अधिकारी अमिताभ कांत, ग्रामीण विकास सचिव डॉक्टर अमरजीत सिन्हा, मा. जल सचिव यूपी सिंह नीति आयोग के जल सलाहकार अविनाश मिश्रा भी मौजूद थे। जिस बुंदेलखंड की चर्चा पलायन, भुखमरी, गरीबी, अशिक्षा, जल संकट जैसी विभिन्न समस्याओं के लिए साल भर होती रहे पीने का पानी मालगाड़ी द्वारा दिल्ली से बुंदेलखंड लाया जाए। उसी बुंदेलखंड के जनपद बांदा के ग्राम जखनी के जल संरक्षण से 15 वर्ष के सामूहिक परंपरागत प्रयास ने देश के सामने गांव में पानी और पलायन रोककर देश के सामने उदाहरण प्रस्तुत किया है। जल संरक्षण के इस सामूहिक प्रयास में ना तो सरकार से कोई अनुदान लिया गया और ना ही नई मशीन तकनीक का इस्तेमाल किया गया स्वयं गांव के किसानों नौजवानों बेरोजगारों ने फावड़ा उठाया, समय दिया, श्रमदान किया, मेड़ बंदी की, गांव में जल रोका, गांव के पानी को जगाया, गांव को पानीदार बनाया। अपने गांव को देश का पहला जल ग्राम बनाया देश के 1050 जल ग्रामों को जन्म देने की प्रेरणा दी। जखनी गांव के किसानों के इस परंपरागत जल संरक्षण विधि को समझने के लिए इजराइल सरकार की जल विशेषज्ञ, टीम वर्ल्ड वाटर रिसोर्स ग्रुप 2030 कृषि प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय बांदा, केंद्रीय भूजल बोर्ड उत्तर प्रदेश, जल संसाधन विभाग के वरिष्ठ अधिकारी जखनी के जल संरक्षण के सामूहिक प्रयास पानी और पलायन रोकने के तरीकों पर कई वर्षों से चर्चा कर रहे हैं शोध कर रहे हैं अनुकरण कर रहे हैं जखनी मॉडल को देश में लागू कर रहे हैं। भले ही गांव के इन किसानों के पास औपचारिक रूप से कोई डिग्री ना हो शिक्षा ना हो लेकिन उनका यह सूखे बुंदेलखंड में जल संरक्षण का तरीका खेत के ऊपर मेड मेड के ऊपर पेड़ किसी विश्वविद्यालय के अनुसंधानकर्ता से अधिक शिक्षित होने का प्रमाण है।

प्रधानमंत्री की सोच को अमलीजामा पहनाता गांव
देश के माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस कथन को अक्षर से पालन करता है जो उन्होंने 2014 में कहा था जल संरक्षण को लेकर खेत का पानी खेत में, गांव का पानी गांव में, इसलिए प्रधानमंत्री के राष्ट्रीय सोच के साथ इस गांव के किसान खड़े हुए। पूर्व प्रधानमंत्री माननीय अटल बिहारी वाजपेई जी ने कहा था, तीसरा विश्व युद्ध पानी के लिए होगा यदि हम नहीं चाहते तो, जखनी गांव के किसान नौजवान अपनी तरफ से कोशिश की तीसरा विश्व युद्ध पानी के लिए ना हो हम अटल जी के वचन को निभा रहे हैं अपने गांव में ही सही तीसरा युद्ध नहीं होगा जो कार्य हजारों करोडो रुपए खर्च करके जल संरक्षण के क्षेत्र में उदाहरण नहीं बन सका वहीं पर जखनी के किसानों ने पानी और पलायन पर जो कार्य बगैर पैसे के किया है वह इस नाते परंपरागत अनुसंधानकर्ता है सही मायने में वे सामाजिक परंपरा की उच्च शिक्षा प्राप्त है। भारत के जिस राज्य में जल संकट है सामूहिक समाधान की अवधारणा को लेकर जो भी समाधान चाहते हैं जखनी के किसानों जलगांव जखनी के कार्यकर्ताओं से संपर्क कर रहे हैं, सामूहिक प्रयास का परिणाम है कि बुंदेलखंड के बांदा, हमीरपुर, महोबा, जालौन, छतरपुर, चित्रकूट, टीकमगढ़ की हजारों एकड़ जमीन में किसानों ने अपने पैसे अपने श्रम से जल संरक्षण के लिए जखनी से प्रेरणा लेकर मेड बंदी कराई है कोई भी व्यक्ति कभी भी देख सकता है। यह छोटे से गांव जखनी से निकली मेड़बंदी की मशाल 15 वर्ष में देश के कई जिलों प्रदेशों में बगैर किसी प्रचार प्रसार के पहुंच गई। माननीय प्रधानमंत्री जी ने 9 जून को देश के प्रधानों को लिखे अपने पत्र में मेड़बंदी के माध्यम से जल संरक्षण का संदेश दिया जून 2019 में भारत के जल शक्ति सचिव जल शक्ति मंत्रालय गठन के 4 दिन बाद जल संरक्षण के भागीरथ प्रयास को देखने के लिए 6 जुलाई को जखनी आए। परंपरागत पानी, किसानी, पलायन के सामूहिक प्रयास को देखकर उन्होंने यह तक कह दिया कि यह गांव भारत सरकार के जल शक्ति मंत्रालय के लिए जल तीर्थ जखनी के जल संरक्षण का प्रयोग का परिणाम मॉडल को पूरे देश में लागू किया जाएगा।


जखनी मॉडल के जनक
देखिये वैसे तो गांव वाले मुझे जखनी मॉडल का संयोजक मानते हैं लेकिन मैं इसका श्रेय पूरे गांव को देता हूं। मैं तो सिर्फ माध्यम रहा। और हमें यह करने की प्रेरणा सं आचार्य विनोबा भावे की भूदान की संघर्ष से मिली, तो पूर्व राष्ट्रपति एपीजे कलाम से विचार मिला, परंपरागत जल वैज्ञानिक अनुपम मिश्र से मार्गदर्शन मिला, पद्म विभूषण दीदी निर्मला देशपांडे से स्वालंबन की सीख मिली, गांधी के ग्राम स्वराज्य का आधार मिला, डॉ अविनाश मिश्रा ने तकनीक दी नीतिगत संघर्ष, गांव के 72 वर्षीय अली मोहम्मद से लेकर नौजवान निर्भय सिंह, अशोक अवस्थी, राजा भैया वर्मा, सुरक्षा पांडे, पुष्पा देवी, प्रेमचंद वर्मा, शांति कुशवाहा, मामून, रशीद, रामबली सिंह, संता राजपूत, ने प्रथम पंक्ति में आकर फावड़ा उठाया स्वयं स्वलंबन किया जल संरक्षण के लिए मेड़बंदी यज्ञ शुरू किया। फिर कारवां चल पड़ा गांव के सैकड़ों लोगों ने फावड़ा उठाया, बांस की डलिया उठाई, जखनी की मेड़बंदी की जखनी गांव को देश का प्रथम जल ग्राम मात्र 15 साल में बना दिया। सरकार के सामने सामूहिकता की भावना के साथ की भावना के साथ जखनी में कुल 30 कुआं 6 तालाब 2 नाले परंपरागत हैं। सभी में जून माह में जलस्तर इस स्तर का होता है कि सरकारी, गैर सरकारी अधिकारी जल पर काम करने वाले उदाहरण के तौर पर गांव देखने आते हैं।
लौट आये गांव के नौजवान
आखिर यह जल आया कहां से इतनी ऊपर इस गांव में पानी और किसानी के परंपरागत सामूहिक संरक्षण से गांव के नौजवान जो 20 वर्ष पहले गांव छोड़कर रोजगार के लिए देश के महानगरों में पलायन कर गए थे। गांव खाली हो गया था, वीरान हो गया था, जल देवता के आगमन के कारण 165 नौजवान वापस गांव आकर परंपरागत पानी और किसानी के संरक्षण में रोजगार कर रहे हैं। उत्साह पूर्वक संलग्न है अपने मां-बाप, भाई, बहनों परिवार के साथ स्वयं अन्नदाता मालिक बनकर कार्य करने लगे नौकर नहीं गांव का कोई नौजवान खेती करता है। कोई सब्जी उगाता है, कोई पशुपालक है, कोई दूध उत्पादक है, कोई मत्स्य पालक है, कोई फल विक्रेता है, यह सब जल संरक्षण का परिणाम है। जल देवता की दोस्ती का फल है गांव के नौजवान खुद रोजगार कर रहे हैं उतनी ही खेती में जिसमें कभी पेट पालना मुश्किल था।
एक कार्यशाला ने बदल दी जिंदगी
आज आदर्श किसान बनकर आसपास के गांव के बेरोजगार नौजवानों को रोजगार दे रहे हैं यही तो क्षमता की भावना है।
1- जखनी से निकली जल ग्राम की मशाल से देश में सरकार ने गठित किए 1050 जल ग्राम – तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे कलाम 25 अप्रैल 2005 को विज्ञान भवन में सैकड़ों स्वैच्छिक प्रतिनिधियों को को संबोधित करते हुए कहा था कि भारत के गांव में जल संकट अधिक है। हमें गांव को जल ग्राम के रूप में विकसित करना होगा। परंपरागत जल वैज्ञानिक अनुपम मिश्र, पद्म विभूषण निर्मला देशपांडे, प्रसिद्ध समाजसेवी मोहन धारिया, अन्ना हजारे, जैसे प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता मौजूद थे। तत्कालीन केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी भी थे कलाम जी के सुझाव का संदेश का पालन संकल्प उस समय राष्ट्रीय कार्यशाला में मौजूद होने के कारण 3 दिन तक चली कार्यशाला में यह बात मेरे दिमाग बैठ गया।


अनुपम मिश्र की उपस्थिती में लिया संकल्प
अंतिम दिन अनुपम मिश्र जिन्होंने आज भी खरे हैं तालाब जैसा जमीनी जल ग्रंथ लिखा है की सहमति और परामर्श से जखनी को जल ग्राम बनाने की सहमति मंच पर दे दी की सूखे बुंदेलखंड के जखनी गांव को देश का प्रथम जल ग्राम बगैर किसी सरकारी सहायता के परंपरागत तरीके से बनाएंगे भले ही इसके लिए हमें 50 वर्ष क्यों ना लगे साधना में लग्न में निष्ठा हो तो साधन आ ही जाते हैं। 15 साल संघर्ष किया मेहनत की कष्ट सहा एक और जहां नकारात्मक लोगों के ताने सहे, अपमान सहा, वहीं दूसरी ओर अपनी धुन में अपने गांव को जल ग्राम बनाने के लिए जल संरक्षण की दिशा में काम करते रहे ना अपमान से डरे, न सम्मान लिया। दिल्ली की सरकारों के साथ पत्र व्यवहार किया योजना बताएं कई बार नहीं सुना गया लेकिन जनहित के प्रयास करती रही है। कोई ना कोई आपकी बात सुनेगा परिणाम से भारत के
मोदी के कार्यकाल में सरकार में मिली मान्यता
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की सरकार आई तत्कालीन केंद्रीय जल मंत्री, जल मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों को जलगांव का सुझाव 2014 से 2016 तक समझाने के बाद मीटिंग हुई फाइलें दौड़ी अंततः सरकार को जल क्रांति अभियान के अंतर्गत जल ग्राम जखनी मॉडल को तथाकथित जल सेवियो एनजीओ के नाम पर बड़ा धन देने वाले एसी वाले समाजसेवियों के विरोध के बावजूद मान्यता मिली और संपूर्ण भारत के प्रत्येक जिले में 2 जल ग्राम चुने गए वर्तमान में 1050 जल ग्राम जल क्रांति अभियान के अंतर्गत जल मंत्रालय की वेबसाइट पर उपलब्ध है। जखनी से निकली छोटी सी मसाल देश में जल ग्राम को जन्म देती है थे धैर्य हो संकल्प लगन हो तो संघर्ष की भावना हो असंभव को भी संभव किया जा सकता है।


2- जखनी गांव के साथ आसपास के गांव के किसानों ने जखनी से प्रेरणा लेकर जल संरक्षण के लिए अपने संसाधन से हजारों बीघे जमीन में कर डाली मेड बंदी-
जखनी गांव में मेड़बंदी से जल संरक्षण व खेती के फायदे देख आस-पास के गांव घुरौडा के किसानों ने परंपरागत तरीके से अपने श्रम अपने संसाधन अपने पैसे से 500 बीघे जमीन में तथा साहेबा गांव के किसानों ने 400 बीघा जमीन में, जमरेही गांव के किसानों ने 800 बीघे में तथा बंसडाखुर्दबुजुर्ग के किसानों ने 400 सौ बीघे जमीन में मेड़बंदी 5 वर्ष पहले शुरू कर दी सर्वप्रथम आज गांव के कुओं तालाबों का जलस्तर जखनी की तरह ऊपर आ रहा है। गांव पलायन रोकने में कामयाब रहे इन गांव में भी बासमती धान, सब्जियां, दूध उत्पादन हो रहा है जखनी से 5 गांव किसान पहले प्रेरणा लिए अब 50 गांव के सैकड़ों किसानों ने हजारों बीघा जमीन में अपने संसाधन से मेड़बंदी कर दी है और उसके परिणाम भी देखे जा सकते हैं।

3-गांव से पलायन कर वापस आए नौजवानों के कुछ सफल उदाहरण-
संसाधन विहीन पानी पलायन नौजवानों से कभी उजड़े गांव में जल संरक्षण से पाया सूखे बुंदेलखंड के जखनी गांव में शांति कुशवाहा, गुलाब राजपूत, श्याम लाल मीडे, लाल राजपूत, जैसे नौजवान सब्जी उत्पादन करके आदर्श किसान हैं। तो राममिलन अवस्थी, निर्भय सिंह, रामकिशोर, राजा भैया वर्मा, औरंगजेब दुग्ध उत्पादक पशुपालक किसान जाने जाते हैं। वहीं पर साहिल रसीद, लाला मंसूरी, रहमान खा, बाबू सिंह ने अपने अपने निजी गहरे तालाबों में जल संरक्षण कर मछली पालन के किसान जाने जाते हैं। साथ ही पुष्पा वर्मा, प्रेमचंद जैसे नौजवान बकरी पालन के लिए जाने जाते हैं। राजा भैया, हरिराम कुशवाहा, जैसे नौजवान गांधी का चरखा लेकर आज भी सूत काटते हैं। गांधी विचारों को जखनी गांव में जिंदा कर रहे हैं आदर्श किसान के रूप में मामून रशीद ने 500 कुंतल बासमती धान उत्पादन अपने खेत में किया तो रामसेवक प्रजापति ने 400 क्विंटल, अशोक अवस्थी ने 200 क्विंटल, निर्भय सिंह ने 300 कुंटल, अली मोहम्मद ने 100 क्विंटल सुरक्षा पांडे ने 100 कुंतल, रामबली 100कुंटल बासमती धान पैदा किया तो उमाशंकर पांडे, चंद्रकांत, राममिलन, रज्जू खा जैसे नौजवानों ने सैकड़ों क्विंटल गेहूं पैदा किया ऐसे अनगिनत किसान हैं। पानी और किसानी के संरक्षण के लिए संकल्पित है और वह भी बगैर किसी सरकारी सहायता के गेहूं, चना, तिलहन, दलहन, पैदा करना यहां के किसानों की आम बात है। यहां तक कि चार बीघे के छोटे से किसान के पास भी नगद धनराशि पर ट्रैक्टर खरीदा है जिला मुख्यालय बांदा की सब्जी मंडी में जखनी के किसानों की उगाई गई परवल, भिंडी, बैगन, तरोई, प्याज, टमाटर, मिर्च की सर्वाधिक मांग है। यह उनकी शुद्धता का परिणाम है गल्ला मंडियों में जखनी कि किसानों के बासमती धान का विशेष सम्मान के साथ पहचान होती है जखनी गांव के किसानों नौजवानों ने शुरुआती दिनों में 10 किसानों ने बड़ी मुश्किल से 116 कुंटल धान पैदा किया था। बासमती इसके फायदे देखकर अपनी मेहनत मेड़बंदी के कारण रुके जल की वजह से जखनी गांव के किसानों ने गत वर्ष 21000 कुंटल बासमती धान इस सूखे बुंदेलखंड में पैदा किया, 13000 कुंटल गेहूं उत्पादित किया इन आदर्श नौजवान किसान जो कभी खुद पलायन कर गए थे जल के जागरण से अपने गांव की खेती में अपने आसपास गांव की बेरोजगार मजदूरों जरूरतमंद 1700 मजदूरों को खेती के कार्य में रोजगार दिया जिसमें खेत की जुताई, बुवाई, धान की रोपाई, मनाई, कटाई, मेड़बंदी जैसे खेती से जुड़े अनेकों काम अपने पड़ोसी गांव के साथियों को जोड़ कर दिया खेती के गुड नौजवान साथियों को सिखाएं।
4-स्वरोजगार एवं आत्मनिर्भरता के लिए गठित किए 7 महिला समूह।
5- कृषि विश्वविद्यालय बांदा और आरबीआई जखनी गांव को गोद लेकर कर रहे हैं किसानों का सहयोग
6- गांव में कुल 421 किसान हैं गांव का कुल रकबा 2472 बीघा का है, जिसमें 61 वृहद किसान, 265 लघु किसान, 43 पट्टा धारक कृषक है, गांव की कुल जनसंख्या 2562 है।

7-जात पात छुआछूत की भावना से ऊपर हिंदू मुस्लिम एकता का प्रतीक है जखनी गांव – जल संरक्षण के साथ बहुमुखी विकास से समृद्ध हो रहे जखनी गांव हिंदू मुस्लिम एकता का प्रतीक है गांव में तुर्क बाबा की मजार है जहां गाय और भैंस के बच्चा होने के बाद शुरुआती घी जिसे कोई नहीं खाता उसका मलीदा बनाकर मजार में चढ़ाई जाता है। गांव का हर परिवार व्यक्ति इस परंपरा का अनुकरण करते हैं सदियों से गांव में नरसिंह भगवान का मंदिर है वह चबूतरा बना है जो बुंदेलखंड में एकमात्र कहीं नहीं है इसी स्थान पर हिंदू मुस्लिम की पंचायतें होती हैं। जखनी में अनुसूचित जाति के रतु बाबा का प्राचीन मंदिर है रतु बाबा धोबी परिवार से आते हैं गांव में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य सभी जातियों के लोग सदियों से ग्राम देवता के रूप में रतु बाबा की पूजा करते हैं सभी शुभ अवसरों पर।
8-जल से बदला जखनी का कल इस छोटे से गांव में खुल गए कई शिक्षा के मंदिर –
जल ग्राम के रूप में मशहूर होने के बाद जखनी गांव का स्वरूप भी बदल गया 20 वर्ष पहले जखनी गांव में काफी अशिक्षा थी वहीं जब जल के लिए काम शुरू हुआ और गांव की ख्याति बड़ी तब वरिष्ठ अधिकारियों की जखनी तक भागदौड़ शुरू हुई परिणाम स्वरूप इस छोटे से गांव में शिक्षा के लिए प्राइमरी स्कूल, जूनियर हाई स्कूल, राजकीय हाई स्कूल, इंटर कॉलेज संचालित है। ग्रामवासी डिग्री कॉलेज तथा तकनीकी प्रशिक्षण के लिए प्रयासरत हैं आसपास के कई गांव के बच्चे जखनी शिक्षा लेने के लिए आते हैं जल संरक्षण की यह बड़ी उपलब्धि है।
9-देश में मनरेगा मजदूरों की मजदूरी का भुगतान खाते में जखनी ग्राम पंचायत से शुरू हुआ – जखनी गांव देश का पहला गांव है जिसने भारत सरकार की रोजगार परख महत्त्वकांछी योजना मनरेगा की मजदूरी का भुगतान मजदूरों के खाते में वर्ष 2004-05 में शुरू किया था। प्रयोग के तौर पर जखनी ग्राम पंचायत के मजदूरों का खाता राष्ट्रीय कृत इलाहाबाद बैंक की शाखा महुआ में सामूहिक रूप से इस उद्देश्य के साथ खुलवाया गया था कि मजदूरों को उनके काम का उचित मूल्य मिल सके बिचौलिया, दलाल गरीबों का शोषण ना करें और यह संदेश पूरे देश में गया मजदूरों को मजदूरी के भुगतान की व्यवस्था बैंक खाते से शुरू हुई जिसका प्रयोग जखनी से शुरू हुआ।


10- भारत की सबसे पुरानी जल संरक्षण की परंपरा विधि है मेड बंदी- जल ग्राम समिति जखनी के संयोजक उमाशंकर पांडे मानते हैं सरकार सब कुछ दे सकती है गांव मे जहाज रेल रोड फैक्ट्री लेकिन पानी नहीं दे सकती पानी सरकार का नहीं समाज का होता है पानी का प्रबंध परंपरागत तरीकों से ग्राम वासियों को खुद करना होगा। भारत में जब से मनुष्य को भोजन की आवश्यकता पड़ी होगी हमारे भारत के पुरखों ने भोजन का आविष्कार किया होगा। किस स्थान पर भोजन पैदा किया जाए, उगाया जाए, जमीन खोजी होगी, खेत बनाया होगा अन्न पैदा करने के लिए खेत में पानी की जरूरत पड़ी होगी खेत की पहचान रखी गई होगी, खेत का निर्माण तय हुआ होगा, तब से मेड़बंदी जैसी जल संरक्षण की विधि का अविष्कार हुआ होगा। यह हमारे पुरखों की इसमें किसानों का खेती का खलिहान का जन्म हुआ ने जल संरक्षण परंपरागत प्रमाणित सर्वामन्य मेड़बंदी विधि का आविष्कार किया है जिसमें किसी प्रकार की कोई तकनीक शिक्षा नवीन वैज्ञानिक ज्ञान की आवश्यकता नहीं है। जलभराव अभाव के कारण होने वाले नुकसान से बचाता है धूम के कटाव के कारण मृदा के पोषक तत्व खेत से बह जाते हैं मेड़बंदी के कारण मृदा कटाव रुक जाता है जिस से पोषक तत्व खेत को परंपरा गत जैविक ऊर्जा प्राप्त होती है। मेड़बंदी से एक और जहां भूमि को खराब होने से बचाता है वही पशुओं को मेड़बंदी से शुद्ध चारा भोजन प्राप्त होता है। मेड़बंदी, हदबंदी, नाकाबंदी, चकबंदी, घेराबंदी नाम अलग-अलग हो सकते हैं धान की फसल तो केवल मेड़बंदी द्वारा रोके गए जल से ही होती है। जल ग्राम समिति के सदस्य अशोक अवस्थी बताते हैं कि हमारे पूर्वज जल रोकने के लिए खेत के ऊपर में ऊपर फलदार, छायादार, औषध के पेड़ लगाते थे। जिसकी छाया खेत बोई फसल में कम पड़े हमने भी अपने खेत में मेरे के ऊपर बेल सहजन, सागौन, करौंदा, नीबू, आंवला, अमरूद के पेड़ लगाए हैं। यह पेड़ इमारती लकड़ी फल के साथ अतिरिक्त आय भी देते हैं पर्यावरण भी शुद्ध रखते हैं। जल ग्राम समिति के सदस्य अली मोहम्मद बताते हैं कि मेड के ऊपर हमारे पूर्वज, अरहर, मूंग, उर्द, अलसी, सरसोंजैसी फसलें पैदा करते थे। जिन्हें पानी कम चाहिए जमीनी सतह से ऊपर हो हम भी मेड पर उपज ले रहे हैं। जल ग्राम समिति के सदस्य राजा भैया इस बारे में बताते हैं कि मेड़बंदी से ऊसर भूमि को उपजाऊ बनाया जा सकता है जितना अधिक खेत में पानी रुकेगा इतनी अच्छी फसल पैदा होगी। जल ग्राम समिति के सदस्य निर्भय सिंह बताते हैं कि जहां-जहां देश में जल संकट है उसका एकमात्र उपाय है वर्षा जल को खेत के ऊपर मेड और मेड के ऊपर पेड़ लगाकर रोका जाए।


सामूहिक परंपरा जल संरक्षण से प्रभावित हुए देश के वरिष्ठ प्रबुद्ध जन

जल ग्राम जखनी के जल संरक्षण के अलग प्रयोग समझने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री मा.अटल बिहारी बाजपेई जी, तत्कालीन उपराष्ट्रपति मा भैरों सिंह शेखावत, भारत रत्न नानाजी देशमुख, प्रसिद्ध समाजसेवी मोहन धारिया, मध्य प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल मा.राम नरेश यादव, उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल मा.राम नईक, तत्कालीन राजस्थान के राज्यपाल मा मदन लाल खुराना, तत्कालीन दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित, ने जल संकट से निपटने के लिए जल ग्राम जखनी के मॉडल को सराहा जख्नी के संयोजक को बुलाकर इस विधि को समझा सूखे से निपटने के लिए कारगर बताया। जल शक्ति मंत्रालय के सचिव यूपी सिंह, उत्तर प्रदेश पुलिस के महानिदेशक तकनीक जल गुरु श्री महेंद्र मोदी, उत्तर प्रदेश पुलिस के अपर पुलिस महानिदेशक श्री विजय कुमार, मध्य प्रदेश पुलिस के ग्वालियर रेंज के आईजी श्री राजा बाबू सिंह, कृषि प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय बांदा के कुलपति यूएस गौतम, जल वैज्ञानिक परंपरागत अनुपम मिश्र जखनी के जल संरक्षण के कार्यों को देखने के लिए जखनी आए। चित्रकूट धाम मंडल कमिश्नर तत्कालीन कमिश्नर एल वेकटेश्वर लू, तत्कालीन जिलाधिकारी योगेश कुमार तथा वर्तमान जिलाधिकारी बांदा श्री हीरालाल जी ने जनपद बांदा की 471 ग्राम पंचायतों को जखनी मॉडल पर जल संरक्षण का संदेश दिया है। बांदा जनपद के समस्त अधिकारियों ने जखनी गांव के जल संरक्षण का अवलोकन किया भ्रमण किया। केंद्रीय भूजल बोर्ड के निदेशक जल संरक्षण कार्य करने वाले शोध छात्रों का आना जाना लगा रहता है।

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