November 14, 2019

महिलाओं के लिए बहुत कुछ करना जरूरीः राधा भट्ट

गांधी जगत की वरिष्ठ नेत्री राधा भट्ट किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। उनका हर पल एक अहिंसक समाज के निर्माण खासकर स्त्रियों को सशक्त करने में गुजरता है। भट्ट गांधीवादी संस्थाओं के सर्वोच्च संगठन ‘सर्व सेवा संघ’ की अध्यक्ष रहीं। इसके अलावा वे नई दिल्ली स्थित गांधी शांति प्रतिष्ठान’ की भी अध्यक्ष भी रहीं हैं। गांधीवादी चिंतक के रूप में विख्यात राधा भट्ट ने देश के विभिन्न आंदोलनों का नेतृत्व किया है और अनेक देशों में भी व्याख्यान देने के लिए जाती रही हैं। उत्तराखण्ड में कौसानी स्थित लक्ष्मी आश्रम में रहते हुए उन्होंने जहां हजारों लड़कियों को शिक्षित कर उन्हें आत्म निर्भर होने में मदद की है, वहीं उनमें गांधीवादी चिंतनधारा का विकास भी किया। उन्हें महात्मा गांधी की 150वीं जयंती से संबंधित राष्ट्रपति की अध्यक्षता में गठित समिति की सदस्य मनोनित किया गया है। राधा भट्ट ने कई किताबें लिखी हैं, जो गांधीवादी आंदोलन को गति देने में सहायक रही हैं। पेश है राधा भट्ट से पंचायत खबर के सलाहकार संपादक प्रसून लतांत की यह विशेष बातचीत:

अपने देश में सत्तर सालों में महिलाओं के विकास को किस तरह देखती हैं?
राधा भट्टः महिलाओं का विकास हुआ है। हरेक क्षेत्र में महिलाएं आगे बढ़ी हैं। उन सब क्षेत्रों में भी महिलाओं ने अपने पैर जमाए हैं, जहां कल तक केवल पुरुषों का ही वर्चस्व था। महिलाएं सरकारी योजनाओं और कानूनों का लाभ उठा रही हैं। वे विद्वान भी बन रही हैं, अपनी पहचान बनाने में भी कामयाब हुई हैं लेकिन इन सब के साथ उनकी गरिमा भी घट रही हैं क्योंकि ज्यादातर महिलाएं भौतिकवादी विकास में ही संलग्न हैं, इस कारण उनके जीवन में जिस गरिमा का दर्शन होना चाहिए वह नहीं हो रहा है। इस दिशा में विचार करने की जरूरत है। काम करने की जरूरत है।


इस बार संसद में ज्यादा संख्या में महिलाएं चुनकर आई हैं। उनसे कैसी उम्मीद करती हैं?
राधा भट्टः यह तो अच्छी बात है। चुनी गई महिलाओं से उम्मीद तो की ही जा सकती है कि वे देश की महिलाओं के पक्ष में बेहतर पहल करेंगी। राजनीति में सक्रिय ज्यादातर महिलाएं पुरुषों की तरह ही व्यवहार करने लगती हैं। उन्हें महिलाओं के गुणों को ही विकसित करने का प्रयास करना होगा तभी वे महिलाओं के हित में उपयुक्त योजनाओं और कानून बनाने में कामयाब हो सकेंगी।
पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं की कैसी भूमिका है?
राधा भट्टः महिलाओं की भागीदारी पंचायती राज संस्थाओं में बढ़ी है। इससे उनमें जागृति आई है लेकिन महिलाओं में और भी कई तरह के जागृति अभियान चलाने की जरूरत है, क्योंकि पुरानी परंपराएं हावी हैं, महिलाओं को उनसे जूझना पड़ रहा है। पंचायती राज की नई व्यवस्था से यह बात तो हुई है कि अब महिलाएं सवाल पूछने लगी हैं। पंचायत और ब्लॉकों के साथ एसपी—डीसी के सरकारी कार्यालयों में बेधड़क पहुंचने लगी हैं। महिलाओं का डर खत्म हो गया है। पंचायतों के चुनावी प्रक्रियाओं से गुजर रही हैं। हार और जीत के अनुभवों को सीधे महसूस कर रही हैं। अब तक जहां घरों में महिलाएं निर्णय लेने की स्थिति में नहीं थीं पर वे अब सार्वजनिक निर्णय ले पा रही हैं और उन्हें लागू कर बहुत—सी जगहों पर मिसाल कायम कर रही हैं। इसके बावजूद महिलाओं में जागृति फैलाने और उन्हें सशक्त करने के लिए बुनियादी प्रयास करने की जरूरत है।

महिलाओं के लिए गांधी, विनोबा और जयप्रकाश नारायण के योगदान के बारे में बताएं?
राधा भट्टः महात्मा गांधी के विचारों के मुताबिक स्त्रियां आजाद हुईं हैं। उन्हें अधिकार मिले पर अभी भी उनके लिए बहुत कुछ करना जरूरी है। गांधीजी कहते हैं “स्त्रियों के अधिकार के संबंध में मैं कोई समझौता करने को तैयार नहीं हूं। मेरी राय में स्त्रियों पर कोई भी ऐसी कानूनी पाबंदी नहीं लगाई जानी चाहिए जो पुरुषों पर लागू न होती हो। मैं लड़के और लड़कियों के साथ पूर्ण समानता के बर्ताव का पक्षपाती हूं। स्त्रियों में जैसे—जैसे शिक्षा का प्रसार होगा वैसे—वैसे वे अपनी शक्ति को समझने लगेंगी, जैसा कि उन्हें करना चाहिए और तब वे अपने प्रति बरती जाने वाली विषमता का स्वाभाविक रूप से विरोध करेंगी।’’ विषमता आज भी बहुत है। महिलाओं के बीच जागृति अभियान आज भी जरूरी है।
विनोबा गांधी जी के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी रहे इसलिए वे महिलाओं को आध्यात्मिक होने की जरूरत बताते थे। उन्होंने स्त्रियों की आध्यात्मिक शक्ति को जगाने और उसका सार्वजनिक जीवन को बेहतर बनाने के लिए पवनार में ब्रह्म विघा मंदिर की स्थापना की। विनोबा ने स्त्रियों की सात शक्तियों को जगाने के लिए प्रचूर लेखन किया। जयप्रकाशन नारायण ने स्त्रियों की आजादी देने और उनको सम्मान देने के लिए स्वयं आदर्श प्रस्तुत किया। बाद में उनके सर्वोदय अभियानों सहित उनके आंदोलनों में महिलाओं की बराबर की भागीदारी रही। इन तीनों महान पुरुषों ने भारतीय समाज की महिलाओं में जागृति लाने के लिए अनेक अनथक प्रयास किए।
पुरुष—स्त्रियों में समानता लाने की दृष्टि से मौजूदा शिक्षा व्यवस्था कितनी उपयुक्त है?
राधा भट्टः आज अच्छी भली पढ़ी लिखी महिलाएं पुरुषों से एक सीढ़ी नीचे समझती है। समझती क्या उन्हें हर कदम पर अहसास कराया जाता है कि वे पुरुषों से पीछे हैं। सारी परंपराएं भी उन्हें समानता नहीं देती हैं। आम लोगों में भी यही धारणा है कि स्त्रियां कितनी भी तरक्की कर लें लेकिन वह पुरुषों के बराबर नहीं हो सकती है। धीरे—धीरे यह धारणा टूट भी रही हैं और जहां तक शिक्षा व्यवस्था की बात है तो मौजूदा शिक्षा प्रणाली में वह तत्व है ही नहीं, जिससे यह भेदभाव बचपन से ही खत्म हो सके। कहीं—कहीं महिलाएं पुरुषों से आगे निकल गई हैं लेकिन वे अपवाद हैं। सामूहिक रूप से समानता के लिए अनेक मोर्चों पर काम करने की जरूरत है।

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