December 16, 2019

पराली की समस्या से निपटने के लिए आगे आया आईआईआरडी शिमला

संतोष कुमार सिंह
चंडीगढ़:
पराली की समस्या को लेकर संसद से लेकर सड़क तक चर्चा है। आम जन हैरान हैं, किसान परेशान है, कोई यज्ञ का सुझाव दे रहा है तो कोई मौसम को दोषी बता रहा है। कहीं अन्नदाता निशाने पर हैं तो कहीं ​नीति नियंता। एक तरफ संसद में पराली की समस्या को लेकर चर्चा हो रही है वहीं दूसरी ओर पराली की समस्या और इसके समुचित निस्तारण को लेकर विशेषज्ञों का समूह और संस्थान भी सामने आये हैं। इसी तरह के संस्थानों में एक अग्रणी नाम है एकीकृत ग्रामीण विकास संस्थान (आईआईआरडी) शिमला का। ग्रामीण विकास के क्षेत्र में सक्रियता से काम कर रही आईआईआरडी ने पराली की गंभीर समस्या से निपटने के लिए एक पहल शुरू की गई है। इसके तहत संस्थान द्वारा इस समस्या से प्रभावित हो रहे सभी हितधारी समूह को एक मंच पर लाकर परिचर्चा का आयोजन किया गया। उल्लेखनीय है कि विगत सप्ताह यानी 20 नवंबर को चंडीगढ़ के सेक्टर-18 में टैगोर थियेटर में एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया।

क्या थी विशेषज्ञों की राय
संस्थान द्वारा आयोजित परिचर्चा के दौैरान देश में ​हरित क्रांति के जनक व जाने-माने कृषि विशेषज्ञ व पूर्व राज्यसभा सांसद डॉ एम एस स्वामीनाथन ने पराली की समस्या से निपटने के संबंध में अपने विचार को आॅनलाइव स्ट्रीमिंग के किसानों व कार्यक्रम में उपस्थित अन्य​ विशेषज्ञों के साथ साझा किया। डॉ स्वामीनाथन ने कहा कि पराली की समस्या से निपटने के लिए वैज्ञानिक तरीकों का इस्तेमाल करते हुए इससे टाइल्स, कागज और जरूरत का अन्य सामान बनाया जा सकता है। इसके लिए किसानों को जागरूक करने की आवश्यकता है। यदि किसान इस दिशा में आगे बढ़ते हैं और सरकार व कृषि व ग्रामीण विकास के क्षेत्र में काम कर रहे अन्य संस्थान किसानों को इस दिशा में प्रे​रित करने में कामयाब होते हैं तो पराली का निस्तारण कोई समस्या नहीं रह जायेगा बल्कि यह किसानों के आमदनी का जरिया बनेगा।

आईआईआरडी चेयरमैन प्रो. आरके गुप्ता ने कहा कि आज पर्यावरण को बचाने के लिए गंभीरता से सोचने की जरूरत है ताकि हम आने वाली पीढ़ियों के जीवन को सुरक्षित कर सके।
परिचर्चा को आगे बढ़ाते हुए सीएसआर विजन निदेशक डाक्टर दीपक पांडया ने कहा कि पराली जलाना उससे निजात पाने का आसान तरीका तो है लेकिन इस तरीके से पर्यावरण को नुकसान हो रहा है। उन्होंने कहा कि किसान धरती पुत्र है और राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। ऐसे में किसानों को ही इस समस्या से निपटने के लिए आगे आना होगा। उन्होंने कहा कि किसानों को प्राथमिकता के आधार पर पराली से निपटने के लिए नई तकनीक को अपनाने में आगे आना चाहिए।
वहीं पंजाब विश्वविद्यालय के पर्यावरण विभाग के पूर्व चेयरमैन प्रो.एस अहलुवालिया ने कहा कि पराली की समस्या के लिए किसानों को पूरी तरह से जिम्मेदार ठहराना सही नहीं है। उन्होंने कहा कि किसानों को उचित प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए ताकि वह दूसरी फसलों को उगाने के लिए आगे आए जिसमें पराली जैसी समस्या न रहे। साथ ही किसानों को जागरूक करना होगा कि पराली का वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण किया जा सके।
एनवायरमेंट स्ट्डीज प्रो डाक्टर अरूण अहलुवालिया की राय थी कि गांवों को छोटे शहरों में तब्दील करने में लगे हैं। जबकि आज जरूरत शहरों से पहाड़ों और गांव की ओर जाने की है। डाक्टर अरूण ने आगे कहा कि आज किसानों के लिए ठोस नीति बनाने की जरूरत है। महज बैठक कर चर्चा करने से समस्या का हल नहीं होने वाला।
आईआईएचएमआर की डीन एवं प्रो. डाक्टर अनुराधा एस पलानीचामी ने भी पराली के स्थाई समाधान के बारे में गंभीरता से सोचने और ठोस नीति बनाने की आवष्यकता पर बल दिया ।

आईआईआरडी निभायेगी अहम भूमिका
आईआईआरडी के प्रबंध निदेशक डाक्टर एलसी शर्मा ने अपने वक्तव्य में पर्यावरण जैसे गंभीर समस्या पर कान्क्लेव आयोजित करने के संस्थान के उद्देश्यों को साझा करते हुए कहा विस्तार से अपनी बात रखी। उन्होंने पराली की समस्या से निपटने के संभावित उपायों से जुड़ी अपने प्रजेन्टेशन के जरिये अपनी बात रखी और कहा कि आईआईआरडी की ओर से किसानों की समस्या को सुलझाने के लिए कई प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि इसकी शुरूआत विशेषज्ञों से चर्चा के साथ हो गई औरऔर जल्द ही आईआईआरडी पराली और पर्यावरण से जुड़े अन्य मुद्दों पर व्यापक फलक पर कार्य करने जा रहा है। डॉक्टर शर्मा ने कहा कि पराली एक समस्या है ये तो सभी कहते हैं लेकिन जरूरत इसका समाधान ढूंढने की है और आईआईआरडी इसी दिशा में आगे बढ़ रहा है। इसी कड़ी में इस कार्यक्रम का आयोजन किया गया है।
वहीं आईआईआरडी निदेशक सुशमा शर्मा ने कहा कि पर्यावरण की देखरेख करना किसी एक की जिम्मेदारी नहीं है बल्कि सभी का नैतिक कर्तव्य है। उन्होंने आगाह किया कि सभी को इस बात का ध्यान रखना होगा कि उसके कार्यों से पर्यावरण को इतना नुकसान न पहुंचे जिसकी भरपाई करनी ​मुश्किल हो जाए।
क्या कहते हैं किसान
वहीं पंजाब सरकार के क्राप रेजेड्यू मैनेजमेंट यानी कृषि विभाग के नोडल अधिकारी मनमोहन कालिया ने सरकार की उन योजनाओं की जानकारी दी जो खास तौर पर पराली की समस्या से जूझ रहे किसानों की समस्या का हल निकालने के लिए चलाई जा रही है। इस दौरान किसान क्लब पंचकूला के जिला प्रधान रामगोपाल, किसान सभा कुरूक्षेत्रा के जिला प्रधान गुरूदयाल सिंह ने भी अपने अनुभवों को साझा किया।

संसद भी है पराली को लेकर चिंतित
उल्लेखनीय है कि आईआईआरडी द्वारा जब चंडीगढ़ में पराली की समस्या को लेकर आयोजित कॉन्कलेव के जरिए इस महत्वपूर्ण विषय पर अपनी चिंता साझा की जा रही थी उससे ठीक एक दिन पहले यानी 19 नवंबर को सदन में भी इस विषय को लेकर चर्चा हुई। सदन में पूछे गये एक सवाल का विस्तृत जवाब देते हुए केंद्रीय केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने बताया कि पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के किसानों को मशीन द्वारा खेतों में फसल अवशेष के प्रबंधन के लिए सरकार मशीनरी खरीदने पर आर्थिक सहायता दे रही है, जिससे वायु प्रदूषण की समस्या का समाधान किया जा सके। इन राज्यों में पराली जलाने से दिल्ली और आसपास के इलाके में हर साल प्रदूषण की गंभीर समस्या पैदा होती है। इस साल भी दिल्ली-एनसीआर कई दिनों गैस चैंबर बनी रही और दमघोंटू हवा से लोगों को दो-चार होना पड़ा है। तोमर ने सदन को बताया कि फसल अवशेषों (पराली) के प्रबंधन के लिए सरकार ने 1151.80 करोड़ रुपये की योजना शुरू की है।

उल्लेखनीय है कि आईआईआरडी द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम की शुरूआत संस्थान के चेयरमैन प्रो. आरके गुप्ता ने दीप प्रजवलित कर किया। इस दौरान आईआईआरडी के प्रबंध निदेशक डा. एलसी शर्मा, निदेशक सुषमा शर्मा, फ्लायर ग्रुप के सीईओ आनन्द नायर, रीव क्लीनिक हैड डा. केआर शांडिल, आईएफटीआई के सीईओ रंजन मोहंती, कंपनी सचिव अभिमन्यु कंवर व अन्य गणमान्य व्यक्ति विशेष तौर पर उपस्थित रहे। फ्लायर ग्रुप के सीईओ आनन्द नायर ने सभी अतिथियों को धन्यवाद किया और कार्यक्रम के सफल आयोजन के लिए सभी को बधाई दी साथ ही इस विषय पर विस्तार से अपनी बात रखी।

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