December 16, 2019

मधुपुर मेरा मालगुड़ी है

मंजीत ठाकुर
जेहन में एक धुंधली सी तस्वीर उभरती है-जंगलों से घिरा गांव। वह गांव मधुपुर अभी भी काफी हरा है, पहले तो यहां घने जंगल थे। जंगल भी ऐसा कि सूरज की रोशनी भी छन कर ही आती। महुआ, सखुआ, शीशम, जामुन, कटहल और पीपल बरगद के घने पेड़। पास में बहती नदियां पतरो (पात्रो), अजय, जयंती और कितनी ही जोरिया। जंगल ही जंगल। कहीं-कहीं खेत, कुछ झोपड़ियां, कुछ खपरैल की, कुछ ताड़ के पत्तों से ढंकी, पुआल-माटी के बने मकान। मेरा वह मालगुड़ी अब एक कस्बा है बल्कि अपने कस्बाई खोल से शहरी ढांचे में बदलने के लिए छटपटा रहा है। लेकिन मेरे मधुपुर के लोगों को नहीं पता कि मेट्रोपॉलिस जीवन में जो संकीर्णता और भागमभाग होती है, वह बारबार पुराने दिनों की याद दिलाती है।

आज जंगल इतिहास हो गया और गांव जवान शहर। पर इस शहर के बसने, जंगलों के विनाश और एक नए भविष्य की नई इबारत के पीछे बरतानिया हुकूमत का षडयंत्र है। उन्हें दरअसल मधुपुर नहीं बसाना था। मधुपुर तो महज एक गांव था जैसे आज साप्तर है या फागो या कुर्मीडीह। पर अंग्रेज बहादुर जब सन 1855 और 1857 में संताल लड़ाकों और भारतीय फौजियों के विद्रोह से परेशान हो गए और हताशा फैलने लगी तब रेल ब्रिटिश हुकूमत का नया हथियार बन गई। ईस्ट इंडिया कंपनी की राजधानी कोलकाता से मुगलों की राजधानी दिल्ली तक रेल की पटरियां बिछने लगी। रेल की पटरियों को मधुपुर से गुजरना था, इसलिए वर्ष 1871 में मधुपुर के जंगल कटने लगे। धड़ाधड़ पेड़ काटे और गिराए जाने लगे और कोलकाता-आसनसोल-चित्तरंजन होते ट्रेन की पटरियां मधुपुर में भी बिछाई जाने लगी। अचानक एक गांव हरकत में आ गया। रेलवे कांट्रेक्टर नारायण कुण्डू ने मधुपुर में कैंप कर लिया। बाद में उन्होंने 1885 साल में एक अंग्रेज मि. मोनियर से एक रैयती मौजा ही खरीद लिया। फिर अमडीहा मौजा आदि खरीद कर वे जमींदार की हैसियत पा गए। उन्हीं के नाम पर आज भी मधुपुर में एक मुहल्ला ‘कुण्डू बंग्ला‘ के नाम से विख्यात है। एक बात यह भी है कि कुण्डू को पेट की कोई बीमारी थी, मधुपुर के पानी से उनकी बीमारी जाती रही और बंगाली बाबुओं में यहां बसने का क्रेज हो गया। अन्यथा 1855-1857 के इतिहास में मधुपुर कहीं नजर नहीं आता, जबकि 1857 के सैन्य विद्रोह में पड़ोस के गांव रोहिणी ने अपना नाम स्वर्णाक्षरों से अंकित करा लिया था।

मधुपुर का सौभाग्य है कि महात्मा गांधी मधुपुर पधारे और उन्होंने एक ‘राष्ट्रीय शाला ‘(नेशनल स्कूल), तिलक विद्यालय और नगरपालिका का उद्घाटन किया था। एक ज्ञान और राष्ट्रीयता का अलख जगाने वाले केंद्र और एक शहरी जीवन को सिस्टम देने वाला केंद्र। यह बड़ी बात थी। मैंने पांचवी से सातवीं यानी तीन साल की पढ़ाई उसी स्कूल में की है जिसे आज भी लोग गांधी स्कूल के नाम से जानते हैं। बापू उस दौरान आजादी की लड़ाई के साथ-साथ लोगों में स्वदेशी और खादी अर्थशास्त्र के प्रति भी जागरूकता फैला रहे थे। छात्रों में सूत कताई को लोकप्रिय बनाने के प्रति वे काफी संजीदा थे। बापू आठ अक्टूबर 1934 को पहली बार मधुपुर आए थे। उन्होंने नौ अक्टूबर 1934 को ऐतिहासिक तिलक कला विद्यालय के विषय में पत्र लिखा था। उसमें इस विद्यालय के बारे में जिक्र किया गया है। कहा गया है कि यहां पर राष्ट्रीय शाला का आयोजन किया गया था। वहीं प्रधानाध्यापक ने अभिनंदन पत्र के माध्यम से तत्कालीन शिक्षा व्यवस्था का जिक्र करते हुए विद्यालय की समस्याओं की ओर उनका ध्यान आकृष्ट किया था। कहा गया था कि सूत कताई के कारण विद्यालय में लड़कों की उपस्थिति कम हो रही है। लोगों की तरफ से विद्यालय को कम आर्थिक सहायता मिल रही है। कुछ लोगों ने अपने बच्चों को सिर्फ इसलिए हटा लिया है क्योंकि कार्यशाला में सूत कताई का विषय अनिवार्य कर दिया गया है। इस अभिनंदन पत्र में इन मुश्किलों से बाहर निकलने का मार्ग बापू से पूछा गया था।

बापू का जवाब था कि यदि शिक्षकों को अपने कार्य में श्रद्धा है तो उन्हें निराश नहीं होना चाहिए। सभी संस्थाओं को भले-बुरे दिन देखने पड़ते हैं और यह स्वाभाविक ही है। दृढ़ विश्वास के बल पर भीषण तूफान का भी सामना किया जा सकता है। यदि शिक्षकों को पूर्ण विश्वास है कि वे पाठशाला के जरिए आसपास के लोगों को विकास का संदेश दे रहे हैं तो उन्हें बड़े से बड़ा त्याग करने के लिए तैयार रहना चाहिए। कुछ ही दिनों में अभिभावकों से अनुकूल सहयोग मिलने लगेगा। लेकिन यदि उनके इस कार्य में वहां के लोगों का जल्दी सहयोग नहीं मिले तो उन्हें घबराने की जरूरत नहीं है। पाठशाला में एक भी छात्र रहे तब भी उन्हें उसे चलाते रहना है क्योंकि शुरूआत में लोग नए विचार का विरोध जरूर करते हैं।

आजादी से पहले 1925 से 1942 तक तिलक विद्यालय मधुपुर के स्वतंत्रता सेनानियों की गतिविधियों का प्रमुख केंद्र था। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जब अंग्रेजों ने कुछ प्रमुख सेनानियों को कैद करने की कोशिश की थी तो वे लोग भूमिगत हो गए और गुस्से में अंग्रेजों ने विद्यालय के पुस्तकालय को ही जला दिया। 1936 में डॉ राजेंद्र प्रसाद मधुपुर आए थे। यहां उनको आजादी के दीवानों से मुलाकात करनी थी। इसी स्कूल में राजेंद्र बाबू ने एक रात बिताई थी। पुआल का बिछौना लगा और पाकशाला में भोजन बना। बाद में प्रांतीय चुनावों (1937) के वक्त भी राजेंद्र बाबू मधुपुर आए थे।

गांधी जी ने तिलक विद्यालय से जाकर मधुपुर के कुदरती सौंदर्य और नगरपालिका पर जो कुछ लिखा, वह ‘संपूर्ण गांधी वांङमय‘, खंड- 28 (अगस्त-नवंबर 1925) में सुरक्षित है। उन्होंने कहा था, ‘‘हमलोग मधुपुर गए। वहां मुझे एक छोटे से सुंदर नए टाउन हाल का उद्घाटन करने को कहा गया था। मैंने उसका उद्घाटन करते हुए और नगरपालिका को उसका अपना मकान तैयार हो जाने पर मुबारकबाद देते हुए यह आशा व्यक्त की थी कि वह नगरपालिका मधुपुर को उसकी आबोहवा और उसके आसपास के कुदरती दृश्यों के अनुरूप ही एक सुंदर माहौल देगी। मुंबई व कलकत्ता जैसे बड़े शहरों में सुधार करने में बडी मुश्किलें पेश आती हैं, मगर मधुपुर जैसी छोटी जगहों में नगरपालिका की आमदनी बहुत ही थोड़ी होते हुए भी उन्हें अपनी सीमा में आने वाले क्षेत्र को साफ सुथरा रखने में मुश्किलों का सामना नहीं करना पडेगा।” लेकिन इधर मैंने सुना है कि मधुपुर के इस ऐतिहासिक तिलक विद्यालय में महात्मा गांधी और भारत छोड़ो आंदोलन से जुड़ी कई स्मृतियां उपेक्षा की वजह से नष्ट हो रही हैं।

1925 की तुलना में आज शहर, साधन और सुविधाएं काफी बदल गई है। जनसंख्या के दबाब और शहरीकरण की दिक्कतें भी बढ़ी हैं। नेता बदल गए हैं। आज का आक्रामक नेतृत्व क्या यह जानता भी है कि गांधी ने मधुपुर के बारे में क्या कहा था? नगरपालिका के कर्ताधर्ताओं ने कभी सोचा भी कि हमें महात्मा गांधी के मधुपुर के संदर्भ में कहे गए विचारों को न केवल वर्तमान ‘नगरपर्षद भवन’ में कहीं शिलालेख पर उत्कीर्ण कराना (लिखाना) चाहिए बल्कि उनके विचारों को समझने और अनुकरण करने का भी प्रयास करना चाहिए? उन्हें न तो समझ होगी, न फुरसत होगी। होती तो करा दिए होते।

मधुपुर में जितने चौक-चौराहे हैं, उन्हें मूर्तियों ने घेर लिया है। मधुपुर के बीच के चौक पर गांधी जी की मूर्ति है। इससे थोड़ा दक्षिण आज का जेपी चैक है। पहले आर्य समाज मंदिर की वजह से यह आर्य समाज चैक कहलाता था। यहां सन् 86 में जेपी की मूर्ति लगा दी गई-आवक्ष प्रतिमा। नीचे नारा भी लिखा है, संपूर्ण क्रांति अब नारा है, भावी इतिहास हमारा है। नारा संगमरमर की पट्टिका पर शब्दों में दर्ज है बस। आम जनमानस में चैक अब भी आर्य समाज का ही है। इसके बाद थाना और थाने के आगे एक तिराहा। तिराहे के एक कोने पर लोहिया जी की मूर्ति है। यह भी आवक्ष, संगमरमर की। लोहिया की मूर्ति के नीचे एक और घोषणा, जिंदा कौमें पांच साल तक इंतजार नहीं करती। इस लिहाज से हमारी कौमें कब की मर चुकी है। हर पांच साल बाद अपनी जाति के लोगों को संसद, विधानसभा भेजकर अपने कलेजे पर दुहत्थड़ मार कर अरण्य रोदन करती रहती है। लोहिया की मूर्ति और विचार दोनों उपेक्षित हैं। वैसे, खुद लोहिया ने भी कहा था कि किसी नेता की मूर्ति उसके मरने के सौ साल बाद ही लगानी चाहिए। सौ साल में इतिहास उसकी प्रासंगिकता का मूल्यांकन खुद कर लेगा। बहरहाल, वह तिराहा अब भी थाना मोड़ ही है।

सड़क के साथ मुड़कर दक्षिण की ओर चलते चलें, तो आधा किलोमीटर बाद ग्लास फैक्ट्री मोड़ आता है। झारखंड आंदोलन के दौरान शहीद हुए आंदोलनकारी निर्मल वर्मा के नाम पर इस चौक पर एक पट्टिका लगा दी गई है। बदलते वक्त में ग्लास फैक्ट्री-जिसमें लैंप के शीशे से लेकर जार और मर्तबान बनते थे, ग्लासें बनतीं थी-बंद हो गई। लोग बड़े पैमाने पर बेरोजगार हो गए, लेकिन ग्लास फैक्ट्री से लोगों का मोह भंग नहीं हुआ। निर्मल वर्मा के नाम पर उस तिराहे को कोई नहीं जानता। वह मोड़ अब भी ग्लास फैक्ट्री मोड़ ही है।

पता नहीं कैसे एक चौराहा जहां भगत सिंह की मूर्ति है उसे भगत सिंह चौक कहा जाने लगा है। भगत सिंह बिरसा की तरह ही मधुपुर की अवाम के मन में बसे हैं। आर्य समाज चौक से दाहिनी तरफ सिनेमा हॉल है-सुमेर चित्र मंदिर। लेकिन उससे पहले एक कोने पर बंगालियों की संस्था तरुण समिति ने सुभाष चंद्र बोस की मूर्ति लगा दी है। आदमकद प्रतिमा ललकारती-सी लगती है। लेकिन आज की पीढी के लिए बोस की प्रतिमा पर नजर देना भी वक्त की बरबादी लगने लगा है। उधर, आर्य समाज चौक पर ही एक बहुत बड़ा स्कूल है। उसके बोर्ड पर नजर गई तो अजीब लगा। पहले यानी जब हम छात्र रहे थे तब वह स्कूल एडवर्ड जॉर्ज हाई स्कूल था, अब उसे डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी उच्च विद्यालय कर दिया गया है। काश, नाम बदलने की बजाय सरकार स्कूल में श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नाम पर कोई पुस्तकालय शुरु कर देती।

जिस वक्त हम शहर छोड़ गए उस वक्त की यादों और आज के हालात में ज्यादा फर्क नहीं। विकास और तरक्की के नाम पर कुछ फैशनेबल दुकानों और मोबाईल टॉवरों के अलावा मधुपुर में कुछ नहीं जुड़ा। हरियाली कम हो गई है, पानी का संकट खड़ा होने लगा है। हमेशा ताजा पानी मुहैया कराने वाले कुएं सूख चले हैं। बढ़ते शहर में पेड़ों की जगह मकानों ने ले ली है। सांस्कृतिक रूप से समृद्ध शहर में तनाव फैला है, यह तनाव सांप्रदायिक नहीं है, जीवन-शैली का तनाव है। दुखी होने के लिए इतना काफी है।
(वरिष्ठ पत्रकार, इंडिया टुडे। पुस्तक-ये जो देश है मेरा, प्रकाशित।)< strong>

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