April 04, 2020

‘कान्ना’ द्वारा बसाये गये गांव कानौंदा की रही है ऐतिहासिक पहचान

कपूर सिंह छिकारा
हरियाणा में वर्षा की पहली बूंद को हरि कहा जाता है। इस ‘हरि’ से ही हरियाणा प्रान्त का नामकरण हुआ है। विभिन्न प्रकार की वर्षा को अलग-अलग नाम से पुकारा जाता हैं जैसे-मीह, भड़, दोगड़ा, क्यारी भर, दैशारी, मेधपुष्प, बरखा आदि। एक-एक बूंद का संचयन किया जाता था। प्राचीन वर्षा जल संचयन की प्रणाली जोहड़, जोहड़ी, तालाब, पोखर, डाबर, झील, गड्डा, नहर, वाया जिनको गांव वाले जेष्ठ के महीने तक मरम्मत कर लेते थे और मेड़ की मरम्मत कर दुरूस्त कर लेते थे। यह जल पूरे वर्ष धरती पर आद्र बनाए रखता था।
कई महीने की तपती धरती पर जैसे ही वर्षा की पहली बूंद ‘हरि’ का आगमन होता, पूरे वातावरण में एक नई उर्जा का संचार होता। खेतों में हल चलते और बैलों को इशारे पर चलाने वाली टिटकारियां, आ-आ, बर-बर पुचकारियों से पूरा माहौल गुंजायमान हो जाता। यह खेतों में फसलों की हरियाली और खुशहाली के आगमन का संकेत होता। खेती का काम गेहूं की कटाई व निकायी तक बदस्तूर चलता था। सावन की पहली बूंद के साथ पशुधन का बियान शुरू हो जाता और दूध दही की नदियां बहनी शुरू हो जाती। नव यौवना मेघ-मल्हार गाती, नव विवाहितों के लिए उनकी शादी की पहली हरियाली-तीज खास त्योहार होती थी। देसी रिवाज है कि नव विवाहिता अपनी पहली तीज अपने पीहर में मनाती हैं और तीज मनाने की सामग्री रस्सी-पाटड़ी, मिठाई इत्यादि उसकी सुसराल से नवविवाहिता का ससुर लेकर जाता है जिसे सिंघारा कहा जाता है। यह पहला और आखिरी अवसर होता है जब ससुराल की तरफ से विवाहिता के पीहर में उपहार आता है। सावन के झूले पड़ते, हरियाली तीज के साथ विभिन्न त्योहारों का आगमन हो जाता है। त्याहारों को पूरा हर्ष उल्लास के साथ मनाया जाता।

लोक गायन और स्वांग होते जो कई कई दिनों तक चलते। लोक गायन अपनी रागिनियों द्वारा चरित्र को जीवन्त कर देते तो स्वांग (सांग) करने वाले कलाकार धार्मिक व प्रादेशिक विषयों की प्रस्तुति से चरित्र में जान डाल देते जैसे यह आज अभी की घटना है। हम बच्चों के मन पर यह बड़ी छाप छोड़ देते थे। नायकों में मुख्य रूप से आला उदल, राजा हरिश्चन्द्र, नलन्ती, रूप-वसंत व अन्य थे। जिनमें करूणा, दया, माया, क्रोध, प्रतिशोध, प्यार सब था। हरियाणा में कई नामी लोकगायक हुए हैं जिनमे लक्की चन्द, बाले नाई, जार मेहर सिंह, पंडित मान्गे राम, जैमनी हरियाणवी, कवल हरियाणवी प्रसिद्ध हैं।

इसी हरियाणा के झज्जर जिले के बहादुरगढ़ तहसील में मेरा गांव कानौंदा है जिसे चन्द्रवंशी जाट ‘कान्ना’ ने बसाया था। इसमें 36 कौमें जीवन यापन करती थी। छिल्लर, छिकारा, चीभा, चिकारा-चारां गोत्रों में खून का रिश्ता है। आजादी से पहले तत्कालीन संयुक्त पंजाब के जिला रोहतक के कानौंदा गांव में गांधी जी के आह्वान पर सबसे पहले कांग्रेस कमेटी का गठन हुआ और इस गांव के सेनानियों ने जिले के अन्य गांवों में आंदोलन खड़ा करने में अग्रणी भूमिका निभाई थी। यह इलाका विभिन्न क्षेत्रों में आगे रहे हैं।

दिल्ली सल्तनत पर गयासुद्दीन बलवन सत्तारूढ़ था और उसने हिन्दुओं पर अत्याचार किया। जिसका प्रतिकार करते हुए कानौंदा गांव के छिल्लर-छिकारा खाप ने उसके आदेशों को मानने से इनकार कर दिया। इसपर सुलतान व छिल्लर-छिकारा खाप में युद्ध हुआ जिसमें खाप की भले हार हुई, लेकिन खाप के जवानों ने दिल्ली सल्तनत की चूलें हिला दी। हार के बाद भी सुलतान खाप से कर वसूल नहीं कर पाया और यह सिलसिला अंग्रेजी हुकुमत आने तक जारी रहा। झज्जर नवाब की कभी हिम्मत नहीं पड़ी कि कनौदा आकर कर वसूल कर ले। इसपर एक कहावत मशहूर हुई कि जब झज्जर नवाब के घोड़े परनाला गांव से कानौंदा की तरफ बढ़ने से इंकार कर देते हैं।
खेती-किसानी व पशु पालन पर आधारित गांव की 36 बिरादरी का आपस में रोटी-बेटी का सम्बन्ध था। किसान गांव की रीढ़ थे और सहकारिता पर जीवन चलता था। हर कौम अपने-अपने काम में दक्ष थी। जैसे लुहार, कुम्हार, सुनार, ठठेरा, नाई, तेली, भड़मूजा, जुलाहा वगैरह सभी बिरादरी अपने गांव को ‘राम’ का दर्जा देती थी और गाय को राम कहा जाता था। सभी गांववासियों का आपस में दादा, चाचा, ताउ, भाई, बहन, बुआ, मौसी आदि रिश्तेदारी थी। समाज माला की तरह गुथा था। गांव की बेटी सब की बेटी होने की वजह से सम्मानित व सशक्त थी। जमीन -जायदाद की मालिक स्त्री थी। ऐसी व्यवस्था भी थी कि किसी व्यक्ति की पत्नी का निधन हो जाने पर अगर वह व्यक्ति दूसरी शादी करता तो दोनों पत्नियों के बीच हक बंटता। जिसे ‘चून्डा‘ हक कहा जाता था।

इस इलाके की मुख्य फसलें ज्वार, बाजरा, मकई, धान, कपास, सरसो, गन्ना, गेहूं, ग्वार, जौ, चना, तम्बाकू, पटसन थी। गांव की संस्कृति में सहकारिता थी। गांव के मर्द खेत-खलिहान का सारा काम निपटा कर बैठकों में हुक्के पर बैठते तो आधी-आधी रात तक बैठकों का दौर चलता जिसमें फसल बुआई, कटाई निकाई, मौसम व अन्य सांसारिक मुद्दे चर्चा में रहते। कोई व्यक्ति अगर कई दिन बैठक में नहीं पहुंचता तो मोहल्ले का जो भी बैठक में रहता, वह अनुपस्थित व्यक्ति के बारे में जानकारी लेने जाता। पड़ोस के घर में चूल्हा नहीं जलता तो भी खैर-खबर ली जाती। अगर किसी के पास एक बैल है तो दूसरा बैल कोई पड़ोसी देता जिसको ‘डगवारा’ कहा जाता। किसी के पास खेती को कोई औजार कम पड़ता तो पड़ोस से ले लिया जाता। किसी की फसल कटाई, निकाई में देर हो जाती तो मोहल्ले वाले सब मिलकर उस काम को निपटाते थे। बहादुरगढ़ के पास बालौर गांव के तत्कालीन प्रधान मंत्री नरसिंह राव ने ही स्कूलों में मध्याह्न भोजन वितरित करने की शुरूआत की थी।

बारात में जाने की तैयारी कई महीने पहले शुरू हो जाती। कपड़े-लते की तंगी थी जिसके पास नए कपड़े नहीं होते, वह किसी से मांग कर पहन लेता। लेने-देने का मामला महीनों पहले तय कर लिया जाता था। बारात में वाहनों के तौर पर बैल गाड़ियों का प्रयोग होता। बारात अर्थ (रथ) बहल , बैल तांगा व बैलगाड़ी में जाती थी । इस बात की होड़ होती कि कौन बाराती पहले पहुंचता है। बैलों को हिस्ट पुष्ट रखने के लिए उनको घी की नाल दी जाती, गाड़ियों को ‘उघा’ जाता (तेल, पानी, तकनीकी रूप से दुरस्त) था। जिस गांव में बारात जाती थी, लड़की वाले बारात की अगुवाई अपने गांव की (मिलनी) सीमा पर करते थे। बारात के स्वागत में नाई, मोची, लुहार कुम्हार हर समुदाय का व्यक्ति अपनी सेवा लेकर आगे खड़ा मिलता। बारात आने के बाद बाराती व घराती चाय-पानी के बाद खेल के मैदान की तरफ रूख करते। कुरसी, मुगदर, रस्साकशी व अन्य खेलों से दोनों पक्ष अपनी ताकत की जोर आजमाइश करते थे। बारात तीन दिन रूकती। इस बीच हंसी-ठठोैली, गायन सब चलता था। शादी का रिश्ता चार गोत्र छोड़कर (नानी, दादी, मां, पिता) किया जाता था।
इस अवसर पर सामाजिक समरसता का एक बहुत अच्छा उदाहरण भी मिलता है कि जिस गांव से बारात आयी है, उस गांव की किसी कौम की लड़की अगर उस गांव में ब्याही है तो सारे बाराती उसके घर जाते थे और अपनी तरफ से कुछ उपहार देते थे। लड़की भी अपने सब भाईयों का स्वादिष्ट व्यंजन खिलाकर स्वागत करती थी। यह परम्परा आज भी जारी है।
कानौंदा ने कई राष्ट्रीय व अन्तराष्ट्रीय खिलाड़ी दिए हैं। जिनमें हॉकी खिलाड़ी भारत छिकारा प्रमुख है। स्वतन्त्रता सेनानी उजाला सिंह छिकारा के नाम पर दिल्ली के एक मार्ग का नाम है। लार्ड मैकाले ने कहा कि मैंने पूरे भारत का भ्रमण किया। मैने पाया कि भारतीय गांव में रहते हैं जिसमें कई जातियां वास करती हैं लेकिन लोग आपस में रिश्ता (दादा, ताउ, चाचा, भाई, बहन बुआ मौसी) बना कर रहते हैं। इनके आपस में कोई भेदभाव नहीं है। मैंने देखा कि घर पर ताला नहीं लगाया जाता, कोई चोर नहीं देखा, झूठ-फरेब नहीं देखी, हर कोई अपने काम में निपुण है। उसकी शिक्षा के लिए कोई किताब नहीं मिली। यह शिक्षा पिता से पुत्र को मिलती है। हम अंग्रेज कोर्ट पैंट पहने हैं। कांटे से खाना खाते हैं, हम सभ्य तो हैं लेकिन सुसंस्कृत नहीं हैं। भारत के गांव सुसंस्कृत हैं। यह सब देखा मैंने अपने अध्ययन व शोध में। एक बात पकड़ी है कि अगर भारतीय गांव को बदलना है तो पहले इन्हें कोर्ट पेन्ट पहनाया जाए। यह सम्भव है तब जब भारत के राजाओं को पहले यह वेशभूषा पहनाई जाए और उन्हें इंगलैंड बुलाकर इग्लिश पढ़ाई जाए तो आम भारतीय भी आसानी से कोट पैंट पहन लेगा क्योंकि वह राजा को भगवान का दर्जा देता है। और यहीं से शुरू हुआ गांव का पतन का सिलसिला।

अंग्रेजों ने सबसे पहले हमारे कुटीर उद्योग उजाड़े, बड़े-बड़े वस्त्र उद्योग व अन्य उद्योग लगाए। फिर किसान को उजाड़ा, अपनी जरूरत की खेती जबरदस्ती करवाई। ट्रैक्टर व बस, ट्रक लाकर बैलगाड़ी, घोड़ागाड़ी को उजाड़ा। पानी को राजस्व के तराजू पर तौलकर जल-संस्कृति को उजाड़ा। पहले हर गांव की अपनी जल-संस्कृति होती थी। वैसे किसी सभ्यता को फलने-फूलने के लिए पहली जरूरत जल की होती है। इस कारण भारत में जल को देवता का दर्जा प्राप्त था। इसतरह हमारी पूरी संस्कृति को उजाड़ बना दिया। आजादी के सात दशक बाद भी जितनी भी सरकार आई, गांव उनके लिए वोट बैंक ही रहा हैं। गांव के लिए जितनी भी योजनाएं बनी, अधूरे मन से बनी और गांव तक पहुंचते-पहुंचते भ्रष्टाचार की भेट चढ़ गई। यह बात एक पूर्व प्रधानमंत्री ने स्वीकार की है लेकिन आजतक इसका निदान नहीं हो पाया है।
आज मैं अपने देश में ही प्रवासी हूं। देश के 7 लाख गांवों की कहानी भी मेरे गांव कानौंदा जैसी है। मेरे गांव की आबादी लगभग 10 हजार है और इससे ज्यादा लोग गांव से उजड़कर शहरी दड़बे में अपना जीवन यापन करने को मजबूर हैं। मेरे गांव से बहादुरगढ़ शहर की दूरी मात्र 7 किलोमीटर है। लेकिन मेरे गांव का आधा हिस्सा रोजगार की तलाश में और जन सुविधाओं के अभाव में, बहादुरगढ़ में बस गया है। गांव के घरों पर ताले लगे है या मकान बिक गए हैं। लोग अपने ही देश में विस्थापित जीवन बीता रहे हैं।

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