June 06, 2020

ये बेटी बेटे से बढ़कर… जज्बे के आगे नतमस्तक हुआ गांव

आलोक रंजन
दरभंगा: पहलवानी तो छोरे करे हैं, तो म्हारी छोरिया छोरों से कम हैं के..दंगल फिल्म में आमीर खान का वह प्रसिद्ध डॉयलाग पता नहीं आपने कितनी बार सुनी होगी, लेकिन अभी कोरोना काल में ऐसे ही दंगल गर्ल की कहानी फिर सामने आई है। जी हां भले ही इस बेटी ने पिता के सपने को पूरा करने के लिए दंगल न जीता हो लेकिन इस बेटी ने अपने बीमार पिता को मातृभूमि तक पहुंचाने के लिए वो जतन किया है जो किसी दंगल जीतने और अंतरर्राष्ट्रीय मेडल जीतने से कम है क्या? तो कहानी उसी हरियाणा से शुरू होती है जहां की दो बहने गीता, बबीता ने दंगल जीत कर अपने पिता का सीना चौड़ा कर दिया था। दरभंगा जिले में सिंहवाड़ा प्रखंड के सिरहुल्ली गांव की 13 साल की बेटी ज्योति ने अपने पिता के लिए वो कर दिखाया, जिसकी उम्मीद किसी को अपने बेटों से भी नहीं होती।

क्या है मामला
ज्योति के पिता गुरुग्राम में किराए पर ई-रिक्शा चलाने का काम करते हैं लेकिन कुछ महीने पहले उनका एक्सिडेंट हो गया था। इसी बीच कोरोना संकट के बीच लॉकडाउन की घोषणा हो गयी। ऐसे में ज्योति के पिता का काम ठप हो गया, ऊपर से ई-रिक्शा के मालिक का पैसों को लगातार दबाब बन रहा था। स्वाभाविक था घर में परेशानी थी, पिता के पास न पेट भरने को पैसे थे, न ही रिक्शा के मालिक को देने के। ऐसे में ज्योति ने फैसला किया कि यहां भूखे मरने से अच्छा है कि वो किसी तरह अपने गांव पहुंच जाए। लॉकडाउन में यातायात के साधन नहीं होने की वजह से ज्योति ने दरभंगा तक की लंबी दूरी का सफर अपनी साइकिल से ही पूरी करने की ठानी। हालांकि ज्योति के पिता इसके लिए तैयार नहीं थे। हालाकि अंतत बेटी की जिद और गरीबी की मजबूरी के कारण पिता को बेटी के निर्णय पर सहमति जतानी पड़ी। इसके बाद दोनों कठिन परिस्थितियों का मुकाबला करते हए सात दिन में अपने गांव पहुच गये। इस दौरान बेटी ज्योति कुमारी ने अपने जख्मी पिता को साइकिल पर बिठाकर तकरीबन 1300 किमी की दूरी तय कर उन्हें सकुशल घर पहुंचाया।


आसान नहीं था सफर
ज्योति अपने पिता मोहन पासवान को साइकिल पर बिठा कर हरियाणा के गुरुग्राम से अपने घर दरभंगा के लिए निकली। इस दौरान रास्ते में कई तरह की परेशानियां हुईं लेकिन हर बाधा को ज्योति बिना हिम्मत हारे पार करती गई। कई बार ज्योति को खाना भी नहीं मिला। रास्ते में कहीं किसी ने पानी पिलाया तो कहीं किसी ने खाना खिलाया। लेकिन ज्योति ने हिम्मत नहीं हारी। वो एक दिन में 100 से 150 किलोमीटर अपने पिता को पीछे बिठा कर साइकिल चलाती थी। जब कहीं ज्यादा थकान होती तो सड़क किनारे बैठ कर ही थोड़ा आराम कर लेती थी।

ट्रक वाले मांगे 6 हजार, चुकाना था मुश्किल
ज्योति ने बताया कि ऐसे में उसके पास साइकिल के सिवा आने के लिए और कुछ नहीं था। हालांकि बिहार आने के लिए उसके पापा ने एक ट्रक वाले से बात की थी। उसने दोनों लोगों को घर पहुंचाने के लिए 6 हजार रुपए मांगे। ज्योति ने बताया कि पापा के पास 6 हजार रुपए भी नहीं थे। इसलिए उसने साइकिल से घर आने का फैसला लिया। पापा ने भी साथ दिया। साइकिल से गुरुग्राम से दरंभगा की लंबी यात्रा बहुत कठिन थी। बावजूद इसके हमारे पास कोई दूसरा चारा नहीं था।

10 मई को गुरुग्राम से चलना शुरू किया
ज्योति ने बताया कि उसने पापा को साइकिल पर बैठा कर 10 मई को गुरुग्राम से चलना शुरू किया और इस शनिवार 16 की शाम में घर पहुंची। इस दौरान उसे बहुत सारी समस्याओं का सामना करना पड़ा तो कुछ लोगों ने मदद भी की। ईश्वर की कृपा है कि हमलोग घर तक पहुंच गए। वहीं गांव पहुंचने पर लोगों ने इस बच्ची के हौसले की प्रशंसा की। लोगों ने दोनों पिता व बेटी को गांव स्थित एक पुस्तकालय में रखा, जहां दोनों का मेडिकल चेकअप होगा उसके बाद 14 दिन के लिए दोनों को क्वारंटीन में रखा जाएगा।

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