November 15, 2018

गंगोत्री के हरे पहरेदारों की अहमियत पहचानिए

सुरेश भाई, पर्यावरणविद्

  • ‘ऑल वेदर रोड’ के लिए हजारों देवदार की कटाई से ऊपरी हिमालय व गंगा के पर्यावरण को भारी नुकसान होगा।
  • वहां 15 मीटर के स्थान पर सात मीटर चौड़ी सड़क बनाने की मांग की जा रही है, जिस पर दो बसें आसानी से निकल सकती हैं।

‘नमामि गंगे’ योजना के तहत लगभग 30 हजार हेक्टेयर भूमि पर वनों के रोपण का लक्ष्य है, दूसरी तरफ गंगोत्री से हर्षिल के बीच देवदार के हजारों हरे पेड़ों की हजामत किए जाने का प्रस्ताव है। यहां देवदार के जिन पेड़ों को कटाई के लिए चिह्नित किया गया है, उनकी उम्र न तो छंटाई के योग्य है, और न ही वे सूखे हैं। कहा जा रहा है कि ऐसा ‘ऑल वेदर रोड’ यानी हर मौसम में चालू रहने वाली सड़क बनाने के लिए किया जाएगा। सवाल यह है कि क्या ऊपरी हिमालय में सड़क की इतनी चौड़ाई उचित है? क्या ग्लेशियरों के मलबों के ऊपर खड़े पहाड़ों को थामने वाली इस वन संपदा का विनाश शुभ है? कतई नहीं।गौर कीजिए, इस क्षेत्र के 2,300 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में गंगोत्री नेशनल पार्क भी है। गंगा उद्गम का यह क्षेत्र राई, कैल, मुरेंडा, देवदार, खसरू, थुनेर, दालचीनी, बांज, बुरांस आदि शंकुधारी व चौड़ी पत्ती वाली दुर्लभ वन प्रजातियों का घर है। गंगोत्री के दर्शन से पहले देवदार के जंगलों के बीच गुजरने का आनंद ही स्वर्ग की अनुभूति है। इनके बीच में उगने वाली जड़ी-बूटियों और यहां से बहकर आ रही जल धाराएं ही गंगाजल की गुणवत्तापूर्ण निर्मलता बनाए रखती हैं। यहां की वन प्रजातियां एक तरह से रेनफेड फॉरेस्ट (वर्षा वाली प्रजाति) के नाम से भी जानी जाती हैं। इनके कारण हर समय बारिश की संभावना बनी रहती है।

गंगोत्री के आस-पास गोमुख समेत सैकड़ों ग्लेशियर हैं। जब ग्लेशियर टूटते हैं, तब यही वन प्रजातियां उसके दुष्परिणाम से हमें बचाती हैं। देवदार से भरे हमारे जंगल हिमालय और गंगा, दोनों के हरित पहरेदार हैं। ग्लेशियरों का तापमान नियंत्रित रखने में भी इन हरे पहरेदारों की भूमिका बहुत अहम है।जाहिर है, ग्लेशियरों की सुरक्षा के लिए आवश्यक है कि इन हरे पहरेदारों की आवाज को हम सुनें। इनकी इसी महत्ता को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने गंगोत्री क्षेत्र के 4,000 वर्ग किलोमीटर के दायरे को ‘इको सेंसिटिव जोन’ यानी ‘पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र’ घोषित किया था। ऐसा करने का एक लक्ष्य गंगा किनारे हरित क्षेत्र तथा कृषि क्षेत्र को बढ़ाना था। सरकार को याद करना चाहिए कि इसी क्षेत्र में वर्ष 1994-98 के बीच देवदार के हजारों हरे पेड़ काटे गए थे। तब हर्षिल, मुखवा गांव की महिलाओं ने पेड़ों पर रक्षा सूत्र बांधकर इसका विरोध किया था। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रलय ने ‘रक्षा सूत्र आंदोलन’ की मांग पर एक जांच टीम का गठन किया था, जिसकी जांच में बड़ी संख्या में वन कर्मी दोषी पाए गए थे। अब देवदार की कटाई के समाचार सुनकर ‘रक्षा सूत्र आंदोलन’ से जुड़े लोग चिंतित हैं।

चिंता की बात यह है कि यह क्षेत्र पिछले वर्ष लगी भीषण आग से अभी तक पूरी तरह उबर नहीं पाया है। यहां की वनस्पतियां धीरे-धीरे फिर से सांस लेने की कोशिश में हैं। ऐसे में, उनके ऊपर आरी-कुल्हाड़ी से वार बिल्कुल अनुचित है। आखिर हम कैसे इस तथ्य को नजरअंदाज कर सकते हैं कि गंगा को निर्मल और अविरल रखने में वनों की महत्वपूर्ण भागीदारी है? एक बड़ी सच्चई यह भी है कि साल 1991 के भूकंप के बाद यहां की धरती इतनी नाजुक हो चुकी है कि हर साल बाढ़ से जन-धन की हानि हो रही है। वनाग्नि व भूस्खलन से प्रभावित स्थानीय इलाकों में पेड़ों की कटाई से मिट्टी-कटाव की समस्या बढ़ जाती है। इस कारण गंगोत्री क्षेत्र में एक भी पेड़ के कटने का नतीजा बुरा होता है।कहने की आवश्यकता नहीं है कि बाढ़, भूस्खलन, भूकंप की दृष्टि से अति-संवेदनशील ऊपरी हिमालयी क्षेत्रों में देहरादून व हरिद्वार जैसे निचले हिस्सों के मानक के मुताबिक मार्ग को चौड़ा करने की योजना पर्यावरण के लिहाज से घातक सिद्ध होगी। इस चेतावनी को सुनकर कई लोग गंगोत्री के इस इलाके में पहुंच रहे हैं। सभी देववृक्ष को बचाने की गुहार लगा रहे हैं। 30 किलोमीटर में फैले इस वन क्षेत्र को बचाने के लिए 15 मीटर के स्थान पर सात मीटर चौड़ी सड़क बनाने की मांग की जा रही है। इतनी चौड़ी सड़क पर दो चौड़ी बसें आसानी से एक साथ निकल सकती हैं। शासन-प्रशासन को प्रकृति के अनुकूल इस स्वर को सुनना चाहिए, ताकि आवागमन भी बाधित न हो और गंगा के हरे पहरेदारों के जीवन पर भी कोई संकट न आए।(ये लेखक के अपने विचार हैं..हिन्दुस्तान से साभार)

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एक दशक से भी ज्यादा से पत्रकारिता में सकिय। संसद से लेकर दूर दराज के गांवो तक के पत्रकारिता का अनुभव। ग्रामीण समाज व जनसरोकार से जुड़े विषयों पर पत्र पत्रिकाओं में लेखन। अब पंचायत खबर के जरिये आपके बीच।

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