November 15, 2018

गंगा की अविरलता से ही निर्मलता का सपना साकार होगा:नीतीश कुमार

कन्नौज से वाराणसी तक गंगा के गंदगी पर बात होती है, लेकिन गंगा की अविरलता पर ध्यान नहीं जाता। अब समय आ गया कि अविरल धारा पर बात की जाये: जयराम रमेश
संतोष कुमार सिंह
नयी दिल्ली:बिहार के एक बड़े हिस्से में गंगा बहती है लेकिन गंगा में गाद की समस्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। जलधारा जगह—जगह टूटी हुई है। बाढ़ के दिनों में गंगा का पानी भयंकर तबाही मचाती है। क्योंकि नदी में गाद भरने से जलधारण क्षमता कम हुई है, और गंगा नदी में थोड़ा पानी आने पर भी बाढ़ की स्थिति हो जाती है। गांव के गांव कटाव का शिकार हो रहे हैं। बाढ़ उतरने पर जगह—जगह बालू जमा दिखाई देता है। ऐसा इसलिए हो रहा है कि गंगा के रास्ते में तमाम तरह की बाधाएं खड़ी कर दी गईं है। कहीं बांध बना दिए गये हैं तो कहीं गंदा पानी गंगा में डाला जा रहा है। फरक्का में गंगा को बांधा गया है। वहां से निकलने वाली गाद यानी सिल्ट से गंगा का बहाव प्रभावित है।

बिहार में गंगा के गाद की समस्या को लेकर राजधानी के ​इंडिया इं​टरनेशनल सेंटर में दो दिवसिय राष्ट्रीय संगोष्टि का आयोजन किया गया। संगोष्टि का उद्घाटन करते हुए बिहार के मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि इस राष्ट्रीय संगोष्टि का आयोजन इसलिए किया गया है कि देश खुलेमन से बिहार में गाद की समस्या पर विचार करे। गंगा निर्मल बनी रह सकती है जब उसकी अविरलता को बनाये रखा जाए। पटना में भी इस विषय पर परिचर्चा का आयोजन किया गया था। वहां भी काफी अच्छे सुझाव आये थे। यहां विशेषज्ञों को चाहिए कि वे उन बातों को भी ध्यान में रखें,और आगे की रणनीति सुझाएं। सरकार उस दिशा में आगे बढ़ेगी। नीतीश ने कहा कि बिहार सरकार राज्य खजाने से आपदा पीड़ितों की मदद करती रही है,क्योंकि खजाने पर सबसे पहले उनका अधिकार है। कटाव के कारन गांव के गांव नदी में समा जा रहे हैं। राज्य के खजाने को अपने कटाव पीड़ितों को बचाने में भारी नुकसान हो रहा है। लेकिन इस समस्या का स्थाई समाधान होना चाहिए। फरक्का में बांध रहे न रहे यह बड़ा सवाल नहीं है। महत्वपूर्ण सवाल है कि उस बांध से जो नुकसान हो रहा है उसका आकलन हो। यह आकलन हो कि बांध फायदेमंद है या गंगा की अविरलता। गंगा में गाद रहते गंगा अविरल नहीं हो सकती। इसलिए गाद को रास्ता देना ही होगा और गंगा अविरल बहेगी तो गाद खुद बखुद कम होगा।
पूर्व केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने कहा कि सरकारें गंगा की निर्मलता पर ज्यादा जोर देते रही हैं। यहां तक उन्होंने भी गंगा की निर्मलता, स्वच्छता, पर्यावरण की सुरक्षा पर ज्यादा जोर दिया। अविरल धारा पर ज्यादा जोर नहीं दे पाये। कन्नौज से वाराणसी तक गंगा के गंदगी पर बात होती है, लेकिन गंगा की अविरलता पर ध्यान नहीं जाता। अब समय आ गया कि अविरल धारा पर बात की जाये। हमें कुछ कड़े निर्णय लेने होंगे। गंगा नदी में व्यवसायिक परिवहन की कोशिश हो रही हैं,लेकिन इस परिवहन से गंगा पर क्या असर होगा। परिवहन पर क्या असर होगा,डॉल्फिन पर क्या असर होगा इस पर भी विचार किया जाये। बराज पर न्यूनतम पर्यावरणिय जरूरतों का ध्यान रखा जाए। पानी का प्रवाह हो। जयराम ने कहा कि इस बात पर भी विचार किया जाना चाहिए कि क्या फरक्का को वर्तमान जरूरतों के मुताबिक रिडिजाईन किया जा सकता है।

पर्यावरण विशेषज्ञ जीडी अग्रवाल ने कहा कि सृष्टि में जड़ और चेतन दोनों तत्व हैं। चेतन तत्व के विषय में विज्ञान कुछ नहीं कर सकता। हमारे चिंतन में प्रकृति का संरक्षण होना चाहिए। चाहे बात गंगा की हो,या यमुना कि या किसी और नदी की,मुख्य समस्या यही है कि हम मानव को सबसे अलग मानते हैं। हमे समझना होगा कि नदियां जड़ जलधारा नहीं चेतन हैं। प्राणवान हैं। विकास के इस दौर में सतत शब्द गौण हो गया है। जिसका बोझ गंगा नदी झेल नहीं पा रही हैं। अपने लोभ पर रोक लगाना होगा। हमें यह समझना होगा कि हम असीम भौतिक विकास नहीं कर सकते। सबका विकास का नारा दिया जा रहा है। जबकि हमें पर्यावरण सह विकास की बात करनी चाहिए।
वक्ताओं में जल पुरूष राजेंद्र सिंह, राज्यसभा सांसद हरिवंश, जस्टिस वी गोपाले गौडा, डॉ एस एन सुब्बा राव शामिल रहे। कार्यक्रम में देश के अलग—अलग हिस्सों से आये पर्यावरण विदों ने भाग लिया।
क्रमश:

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एक दशक से भी ज्यादा से पत्रकारिता में सकिय। संसद से लेकर दूर दराज के गांवो तक के पत्रकारिता का अनुभव। ग्रामीण समाज व जनसरोकार से जुड़े विषयों पर पत्र पत्रिकाओं में लेखन। अब पंचायत खबर के जरिये आपके बीच।

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