October 14, 2019

गांधी दर्शन में है गांवों के विकास का मंत्र

सोमपाल शास्त्री
गांधी जी का दर्शन या गांधी जी का विचार न केवल एक समग्र और समेकित विचार था, बल्कि आर्थिक ही नहीं सामाजिक विकास के सातत्य का आधारभूत विचार था। उसके मूल में व्यक्ति की स्वतंत्रता चाहे वो धार्मिक विश्वास हो, अपनी आजीविका चलाने की विद्या हो या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हो, उसको सामाजिकता के ताने—बाने के साथ अंतरंग रूप से बुने हुए रखने का विचार था। उसमें समृद्धि का निषेध नहीं था परंतु अनावश्यक संग्रह और दंभ की प्रवृति को नियंत्रित और संयमित करके विषमता को न्यूनतम रखने का आदर्श था। गांधी जी ने अपने व्यक्तिगत आचरण से प्रमाणित करके इन आदर्शों को समाज के समक्ष एक प्रेरक उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया।

गीता के इस ष्लोक –
यदा चरती श्रेष्ठ, तत देवता रोजनः
सहस यत प्रमाण कुरुते लोकस तदनुवर्तनेः।
इसका भावार्थ है कि समाज के अग्रणी लोग जैसा आचरण प्रस्तुत करते हैं, वैसा ही जनसाधारण भी करने लगता है। समाज में सामथ्र्य पद अथवा किसी विशिष्ट स्थिति के कारण अग्रणी लोग अपने मन, वचन, कर्म से जो भी बात प्रमाणिक करते हैं, आमजन उसी का अनुकरण करते है। इससे स्पष्ट है कि जब व्यक्ति के कथनी और करनी में भेद नहीं रहता, तभी उसे किसी विषय में उपदेश देने का नैतिक आधार रहता है। यदि नेता अथवा उपदेष्टा के चिंतन और आचरण में द्वैध रहेगा तो किसी न किसी समय वह उजागर होगा और जनता में अविश्वास घर करने लगेगा। गांधीजी के चिंतन, आचार व्यवहार में यही विशिष्टता रही जो उनके चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता है। यह दुर्भाग्य की बात है कि उन्हें बापू कहने वाला राष्ट्र इस दर्शन एवं मान्यता का पालन करने की जगह पूरी तरह तिरस्कृत कर चुका है। परिणामतः आज नेता कहे जाने वाले लोगों की विश्वसनीयता न केवल संदेहास्पद हो गयी है, बल्कि शून्य से भी नीचे नकारात्मक हो चुकी है। इससे भी अधिक सोचनीय यह है कि परस्पर अविश्वास की यह भावना निरंतर गहराती जा रही है। परिणामतः शाषन और नागरिक के बीच की विश्वास-भित्ति पूर्णतः ध्वस्त हो चुकी है।

ग्रामीण विकास का गांधी जी का विचार गांवों की अपनी संपत्ति और पंरपरागत धरोहर तथा स्वरचित, स्वनियमित, स्वस्फूर्तः पंचायत प्रणाली के सामूहिक, सहकारी और समरस भाव पर आधारित था। यह गांधी जी का कोई नया विचार नहीं था, बल्कि हजारों वर्षों में विकसित भारत के सामाजिक संबंध और सामूहिकता, सामुदायिकता और सहकारिता के आधारभूत मंत्र पर चलने वाली व्यवस्था को पहचानकर और उसी को सशक्त और समृद्ध करके प्रगति करने का विचार था। आज जो वैद्यानिक पंचायतें बनी हैं वह गांधी जी द्वारा चिन्हित इन कालसिद्ध परंपराओं और प्रणालियों के सर्वथा विपरीत है। सैकड़ों वर्षों से इन सामाजिक भावनाओं के विपरीत एक बाह्य, अपरिचित विदेषी विचार और व्यवस्था को थोपकर न केवल समाज की अनदेखी की गयी बल्कि उसमें जान-बूझकर विद्वेष और टकराव पैदा करके उसे षोषण और भ्रष्टाचार का ग्रास बना दिया गया।

विडंबना यह है स्वतंत्रता के पश्चात जो आशा जगी थी कि विश्व की प्राचीनतम संस्कृति और सभ्यता का यह देश अपनी उन कालसिद्ध उज्जवल संस्थाओं और विचारों को पुनर्जीवित करते हुए शासन के अनावश्यक हस्तक्षेप के भार और भ्रष्टाचार से मुक्त होकर प्रगति की ओर अग्रसर होगा, वह नहीं हो पाया। गांधी जी का चरखे से सूत कातने का विचार इस मूल दर्शन पर आधारित था कि राष्ट्र का प्रत्येक व्यक्ति उत्पादक कार्य में योगदान करेगा और न्यूनतम आवश्यकतापरक उपभोग के माध्यम से राष्ट्र के संसाधनों का अक्षय उपयोग करेगा। हुआ उसके ठीक विपरीत। आज चाहे आर्थिक विषमता की बात हो, समाज में आपाधापी जनित टूट-टकराव की बात हो, प्राकृतिक संसाधनों के उपर अनावश्यक एवं असह्य दबावों की बात हो अथवा व्यक्तिगत स्वार्थ और बेचैनी के कारण संयुक्त परिवार ही नहीं एकल परिवार के भी विश्रृंखलित होने की बात हो, यह सब गांधी जी के मौलिक विचारों को तिलांजलि देकर एक वैदेशिक संस्कृति की भौंडी नकल करने के कारण हो रहा है।

चाहे कोई व्यक्ति हो अथवा परिवार अथवा जनपद या देश उसकी प्रगति का मौलिक तत्व उसके नैसर्गिक स्वभाव और प्रकृति में निहित रहता है। भारत की आत्मा उसके गांवों में बसती है और गांव की समूची संस्कृति और अर्थव्यवस्था मूलतः उसकी कृषि और परंपरागत ​​शिल्प के उपर आधारित थी। इन आधारभूत सामर्थ त्यागकर एक सर्वथा अपरिचित वैदेशिक व्यवस्था को लादने का जो कुत्सित प्रयास विदेशी शासकों ने किया था, उससे भी अधिक विद्रूप और कुत्सित तरीके से हमारी तथाकथित स्वदेशी एवं लोकतांत्रिक सरकारों ने किया है। आश्चर्य की बात है कि मुगलों एवं अंग्रेजों सहित सभी विदेशी शासकों ने भारत की अंतरात्मा और उसके सामुदायिक और आर्थिक तानेबाने को उतना नष्ट भ्रष्ट नहीं किया जितना हमारी अपनी सरकारों ने। विदेषी शासकों ने पारिवारिक संपत्ति के उत्तराधिकार, विवाह-शादी के नियमों, धार्मिक कृत्यों तथा स्वशासन की पंचायत जैसी व्यवस्थाओं को न केवल बनाए रखा अपितु शासन को सुचारू रूप से चलाने, विवादों को सुलझाने, कर निर्धारण और संग्रह करने तथा युद्धों के समय सेना की भर्ती करने जैसे महत्वपूर्ण शाषकीय कार्यो में इन संस्थाओं का भरपूर उपयोग किया और उन्हें मान्यता एवं सम्मान दिया। हमारी सरकारों ने इन सबको तहस-नहस करने का घिनौना काम करके न केवल गांधीजी के विचारों को नकारा बल्कि विदेशी शासकों को अच्छा साबित कर दिया।

आधुनिक ग्राम व नगर पंचायतों और पालिकाओं के तथाकथित औपचारिक चुनाव की पद्धति और वैधानिक व वित्तीय अधिकारों वाली व्यवस्था का निश्चित परिणाम यह हुआ है कि ग्रामजनों को भी भ्रष्टाचार करने की दीक्षा और छूट मिल गयी है। प्राचीन पंचायत प्रणाली में सामूहिक कार्यों को करने के अलावा महामारी और प्राकृतिक आपदाओं से निजात पाने तथा भूमि, सीमा, उत्तराधिकार और वैवाहिक आदि विवादों को सुलझाने की एक स्वस्फूर्त व्यवस्था थी। किसी भी ऐसी घटना के होने पर पंचायतें एकत्र होती थीं। तालाब, कुंएं, धार्मिक स्थल, विवाह मंडप आदि का निर्माण करने और विवादों को सुलझाने के लिए पंचायत इकट्ठा होती थी। विवाह से संबंधित मामलों में संबंधित पक्ष अपनी बात पंचायत के सामने रखते थे और मामला सुलझाकर संबंध में आयी खटास को समाप्त कर एकजुटता बहाल कर दिया जाता था। यह सब पूरे समाज के सामने होता था।

आधुनिक न्याय प्रणाली विवादों को सुलझाना तो दूर, उसे और गहराने तथा स्थाई करने का काम करती है। इसमें हार और जीत के साथ कड़वाहट बनी रह जाती है। पंचायत सुलझाव करती थी। वर्तमान व्यवस्था उलझाव करती है। पहली व्यवस्था में नागरिक के उपर राजनेताओं के भारी भरकम वेतनों, भत्तों और भ्रष्टाचार का बोझ नहीं था। प्राचीन व्यवस्था का एक बहुत ही सटीक वर्णन महाभारत के शांतिपर्व में आता है, जब युधिष्ठिर ने भीष्म पितामह से अपने कुल का इतिहास जानने के बाद यह पूछा था कि हमारे कुल का शासन प्रारंभ होने से पूर्व कौन शासक था और यदि कोई नहीं था तो समाज की व्यवस्था कैसे चलती थी।
भीष्म का उत्तर था-
न रात्यीव, न च राजासीन, न च दंडो न डाण्डिके
सर्वे प्रजा धर्मेंनयैव रक्षन्ति समय परस्परम।।
अर्थात न कोई राजा था, न कोई दंड देने वाले न्यायालय थे, न कोई दंड देने वाला अधिकारी था। नागरिक स्वयं इतने प्रबु़द्ध थे कि परस्पर धार्मिक व्यवहार से सब बातों का समाधान कर लेते थे। उन्हें अपने अनुशासन के लिए किसी बाह्य श​क्ति की अपेक्षा ही नहीं थी। यही था गांधीजी का विचार। इसके सर्वथा विपरीत आधुनिक, राजनैतिक, प्रशासनिक और न्यायिक व्यवस्था समाज में टकराव पैदा करने की नीति पर आधारित है। राजनीति स्वभावतः टकराव से ही जन्मती है। पूरी मानवता का इतिहास ऐसी घटनाओं से भरा पड़ा है कि राजनैतिक लोग समाज में टकराव की टोह में रहते है और उन टकरावों की विभिषिका में अपनी रोटी सेंकते हैं। यदि कोई टकराव उन्हें दृष्टिगोचर न हो तो आयु, वर्ग, भाषा, क्षेत्र आदि के नाम पर टकराव पैदा करने का कुत्सित प्रयास करते हैं और स्वयं को उन्हें सुलझाने के लिए पेश करने की चालबाजी करते हैं। निर्दोष जनता उनकी इन कुटिलताओं का शिकार होती है और एक के बाद दूसरे को चुनकर अगला चुनाव आने तक ठगा महसूस करते हैं और फिर से नए शिकारी का ग्रास बन जाते हैं। इस दुव्र्यवस्था से बाहर निकलने के लिए जनता को स्वयं जागरूक होना पड़ेगा और गांधी दर्शन का अवलंबन करके अपनी सुध स्वयं लेनी होगी क्योंकि ‘यथा राजा, तथा प्रजा’ की प्राचीन कहावत को अब लोकतंत्र में ‘यथा प्रजा, तथा राजा’ कहना अनुचित नहीं है। अन्यथा गांधी जी जैसे किसी मसीहा की प्रतीक्षा में न जाने कितने समय रहना पडे और गांधी जयंती जैसे दिखावटी कार्यक्रमों में आने वाले राजनीतिज्ञों के कुटिल इरादों का शिकार होते रहना पडे।

मेरे गांव की बात
मेरा जन्म बागपत जनपद के ककौद नामक गांव में हुआ जो छतरौली प्रखंड में यमुना के ठीक पूर्वी किनारे पर स्थित है। हमारा परिवार एक साधारण परंतु सक्षम परिवार था। चार पीढ़ियों तक हमारे परिवार की खेती साझा थी। उस समय गांव के स्तर पर और परिवार के स्तर पर श्रम का विभाजन परंपरागत रूप से होती थी, बड़ी सुचारू व्यवस्था थी। नहर और नालियों की खुदाई, कुओं का निर्माण, तालाबों की सफाई, मंदिर, मेले, त्योहार आदि का आयोजन, कब्ड्डी, कुश्ती, रस्साकस्सी आदि सामूहिक खेलों का आयोजन, बैल चालित कोल्हू द्वारा गन्ने की पेराई, गेहूं आदि को खलिहान में डालकर अनाज और भूंसा निकालने का काम, पशुओं को चारगाह ले जाना और उनके प्रजनन के लिए सामूहिक स्वामित्व वाले सांड व भैंसा आदि रखना, कुम्हार द्वारा मिट्टी के दीप व बर्तन बनाना, लोहार, बढ़ई, नाई, तेली, धोबी, धुनका, धोबी आदि शिल्पियों द्वारा गांव की सभी आवश्यकताओं को गांव में ही पूरा करना, शादी-विवाह के समय सारी व्यवस्थाओं को पूरे गांव द्वारा मिल-जुलकर करना तथा व्यक्तिगत अथवा सामूहिक विवादों को पंचायत के द्वारा नियमन, शिक्षण और धार्मिक संस्थाओं के लिए चंदा इकट्ठा करना, पशुओं और मनुष्यों में रोगजनित महामारी, मृत्यु और जन्म तथा अन्य उत्सवों को मिलजुल कर मनाना, यह सब मैंने अपनी आंखों से देखा है।

आज ये सब परंपराएं लुप्त हो गयी हैं। बड़े बुर्जुगों के अनुशासन में रहना तब गौरव की बात हुआ करती थी। उसका स्थान अब उदंड्ता ही नहीं, बल्कि दुश्चरित्रता और नशाखोरी ने ले ली है। मैं पहली कक्षा तक गांव की उस चौपाल में पढ़ा हूं जहां घर से पुरानी फटी बोरी ले जाकर आसन बनाकर बैठते थे, स्लेट और लकड़ी की पट्टी को कालिख पोतकर खरिया की स्याही से और सरकंडे की कलम से लिखावट और गणित के प्रश्न हल करना सीखा। छठीं कक्षा से दसवीं कक्षा तक गांव से लगभग 6 किलोमीटर दूर छपरौली कस्बे में स्थित स्कूल में पढ़ा। छह किलोमीटर जाना-आना पैदल हुआ करता था। सारी खाद्य आवश्यकता दूध, दही, घी, जुलाहे द्वारा बुने कपड़े, चर्मकारों द्वारा जूता, गुड़-शक्कर और मिठाई गांव में उपलब्ध थे। खेत मजदूरों की मजदूरी, भूमिहीन किसान ठेके-बंटाई पर भूमि लेकर खेती किया करते थे। आर्थिक संसाधन कम होने के बावजूद भारत के गांव संपन्न थे, खुशहाल थे और गांधी के ग्राम स्वराज की अवधारणा के ज्यादा करीब थे।
(पूर्व केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री व जाने माने चिंतक)

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