October 14, 2019

गांधी 150 वीं जयंती मनाते वक्त न भूलें बापू के सपने को…

पी वी राजगोपाल
वर्तमान में विकास का ऐसा दौर चल रहा है जिसमें गांव भी बर्बाद हो रहे हैं, शहर भी बर्बाद हो रहे हैं। यानी हम ऐसे मॉडल में फंसे हैं जिसमें न गांव बचेगा और न शहर बचेगा। भारत के शहरों को देखिए तो वहां बेतरतीब तरीके से झुग्गी बस्तियां पसर रही हैं, प्रदूषण की समस्या है, बेरोजगारी आदि समस्याएं हैं। इसी तरह गांव में हिंसा, गरीबी, भूखमरी से लोग परेशान हैं। जिस तरह की स्थिति बनी है उससे यही लगता है कि भारत गर्वनेंस का विफल मॉडल बनता जा रहा है। ऐसे में यह सवाल जरूर उठेगा कि फिर सही मॉडल क्या है?


सही मॉडल वह है जिसके जरिए मां घर चलाती है। मां जब घर चलाती है, बच्चों की परवरिश करती है तो वह ध्यान रखती है कि सबसे ज्यादा दुलार उस बच्चे को करे जिसे देखभाल की सबसे ज्यादा जरूरत है। वह भेदभाव नहीं करती लेकिन सबसे ज्यादा उसका ध्यान रखती है जिसे ज्यादा जरूरत है। इस लिहाज से समाज के सबसे अंतिम पायदान पर बैठे व्यक्ति की उपर तक जाने की क्षमता में बढ़ोतरी करना, उसे इस लायक बनाना कि वह स्वावलंबी हो सके, यही दायित्व सरकार का है। इसीलिए सरकार को माई-बाप कहा जाता है। ठीक इसी तरह अंग्रेजी डिक्शनरी में यदि पॉलिटिक्स का मतलब देखें तो वह है समाज को व्यवस्थित करने की कला। लेकिन आज क्या हो रहा है- दारू पिला के, साड़ी बांट के या अन्य तरह के प्रलोभन के जरिए चुनाव जीतने की कला को ही राजनीति मान लिया जाता है।
राजनीति, गर्वनेंस, विकास के मायने को जब कोई सरकार भूल जाए या भूलने लगे तो इसका मतलब है कि गांधी और गांधी के चिंतन को दरकिनार कर दिया गया। गांधी को कहीं का नहीं रहने दिया गया। दुर्भाग्यवश वामपंथी हों या आरएसएस या फिर दलित आंदोलन, इन सबने मिलकर गांधी को खत्म करने में पूरी ताकत लगाई है। सब का एक ही लक्ष्य रहा गांधी को खत्म करना।
धीरे-धीरे ग्राम आधारित जीवन पद्धति, ग्राम स्वराज, ग्राम स्वावलंबन के सपने को खत्म किया गया। जबकि गांधी चाहते थे कि स्वावलंबी समाज बने। उनके सपनों के विपरीत हमने पूर्णरूपेण परावलंबी समाज बना लिया। हमारा एक ही लक्ष्य रह गया सरकारी नौकरी पाना, आरक्षण का लाभ लेना या फिर उसे हासिल करने की लड़ाई लड़ना या सरकार से कुछ न कुछ लाभ हासिल करने के लिए जद्दोजहद करना। हम यह भूल गए कि सरकार आधारित जीवन पद्धति परावलंबन है। जहां सरकार मजबूत होगी और लोक कमजोर होगा, वहां व्यवस्था ठीक से नहीं चलती। इसी प्रकार यदि लोक मजबूत है तो सरकार सेवा के काम में लगती है, अंतिम व्यक्ति के कल्याण के लिए काम करती है।


जयप्रकाश नारायण कहते थे कि ‘‘सरकार मदमस्त हाथी है। यदि जनता का नियंत्रण उस पर नहीं है तो वह विनाशकारी हो सकती है।’’ जनता का सत्ता पर नियंत्रण तभी होगा जब लोग स्वावलंबी होंगे। इसलिए गांधी के 150 वीं जयंती मनाते वक्त हमें उस सपने को वापस लाना है। केवल सभा, सेमिनार के आयोजन से बात नहीं बनने वाली। गांव में उतरो, गांव के लोगों को संगठित करो, स्वावलंबन और स्वाभिमान की हवा तैयार करो, चुनी हुई सरकार पर नियंत्रण रखो, यही गांधी के 150 वें वर्ष का सपना होना चाहिए।
इस लिहाज से एकता परिषद के माध्यम मैं गांधी के सपने को दो तरीके से पूरा करने में लगा हूं। पहला, ग्रामीण जनता के स्वावलंबन के लिए ‘‘जल, जंगल, जमीन हो जनता के अधीन’’ इस सपने को पूरा करने का काम चल रहा है। हम चाहते हैं कि लोग सरकारी पेंशन पर नहीं, जनता के पेंशन पर जीएं, स्वाभिमानी जीवन जीएं। जब मैं 25 हजार लोगों को लेकर सड़क पर उतरता हूं और उसमें गरीब, किसान, मजदूर, आदिवासी, दलित सब शामिल होते हैं तो एक ही लक्ष्य होता है इन बातों को उठाया जाए और गांधी के सपने का भारत बनाया जाए।
दूसरा, हमारा प्रयास है कि दिल्ली से जेनेवा तक दस हजार लोगों को साथ 18,000 किलोमीटर की पैदल यात्रा की जाए। यह यात्रा 17 देशों से होकर जेनेवा पहुंचेगी। इस यात्रा के जरिए हम न्याय और शांति के एजेंडे को उपर तक ले जाने की कोशिश करेंगे क्योंकि लोगों को यह समझने का समय आ गया है कि शांति, सेना और पुलिस से नहीं बल्कि न्यायपूर्ण व्यवस्था से आएगी। अन्यायपूर्ण व्यवस्था कायम करोगे, सेना के बल पर शांति लाना चाहोगे तो वह संभव नहीं है। दुनिया में इतने संघर्ष और हिंसा है कि उसे हर कीमत पर कम किए जाने की आवश्यकता है। इसके साथ ही हमें जीवन शैली को भी बदलने की जरूरत है। अधिक से अधिक लूट, कमाई, शोषण, ज्यादा से ज्यादा धन-संपदा एकत्र करते रहोगे तो पृथ्वी बचेगी नहीं। इसलिए यह समय सबको याद दिलाने का है कि गांधी ने क्या कहा था। गांधी ने कहा था कि धरती मां के पास सबकी आवश्यकता पूरी करने की क्षमता है लेकिन किसी के लालच को पूरा करने की क्षमता नहीं। यह वर्ष गांधी के संदेश को समझने का वर्ष है, उसके अनुरूप जीने का वर्ष है, उनके संदेश को दुनिया को समझाने का वर्ष है।


राजगोपाल का गांव
भारत के 80 फीसदी लोगों की तरह ही मेरा जन्म भी गांव में ही हुआ है। वह गांव केरल के कन्नूर जिले में तिल्लनकेरी है। यह ऐसा गांव है जहां वामपंथी मूवमेंट सबसे पहले उभरा, हिंसा भी हुई। आगे चलकर इस गांव में दक्षिणपंथी मूवमेंट ने भी जड़ जमाने की कोशिश की। लेकिन अब मेरे काम के कारण ग्राम स्वराज और गांधी की विचारधारा के अनुरूप अच्छा माहौल बन रहा है। सबसे रोचक बात है कि जो वामपंथी गांधी के विरोध में थे, वे भी गांधी में पक्ष में हो रहे है। दक्षिणपंथी जो गांधी के विरोध में थे, उन्हें भी लगने लगा है कि गांधी के बिना मुश्किल है। ऐसे में मुझे लगता है कि आने वाले दिनों में गांव की स्थिति और अच्छी होगी, लेकिन उस गांव में भी आदिवासियों की स्थिति चिंताजनक है। हिंदू-मुस्लिम मैत्री में शायद कमी आने लगी है लेकिन हमारी कोशिश लगातार जारी है। मैं साल में एकाध बार ही गांव जा पाता हूं, लेकिन दूर से प्रभावित करने की कोशिश करता हूं और हमें उम्मीद है गांधी के 150 वीं जयंती वर्ष में भारत के अन्य गांवों की तरह हमारे गांव में भी खुशहाली आएगी।
(गांधीवादी कार्यकर्ता, एकता परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष)

 

About The Author

Related posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *