August 15, 2020

कारोना के आफत बीच धान तो जैसे तैसे निपटा,गेहूं खरीदगी की बाट जोहता किसान

अमरनाथ झा
पटना:कोरोना काल की देशबंदी और मौसम की बेरूखी की वजह से धान की सरकारी खरीद तो जैसे-तैसे संपन्न हुई, पर जब गेहूं की सरकारी खरीद का मामला आया तब समस्या की गंभीरता उजागर हुई। मक्का की हालत तो कहीं अधिक खराब है, सरकारी खरीद हो नहीं रही और बाजार में न्यूनतम समर्थन मूल्य की आधी से अधिक मूल्य नहीं मिल रहे।
गेहूं की सरकारी खरीद के पहले दिन ढाई सौ टन की खरीद होने के कई लोग कहने लगे थे कि इसबार सरकारी खरीद की रिकार्ड बनेगा, पर अगले ही दिन इसको ग्रहण लग गया। खरीद की मात्रा एकदम घट गई और आधा समय बीत जाने के बाद स्थिति यह है कि केवल 4.6 हजार टन की ही खरीद हो पाई है। खरीद का समय 15 जुलाई तक ही है। इसतरह लगता है कि इस वर्ष पूर्व निर्धारित लक्ष्य का दस प्रतिशत खरीद भी नहीं हो पाएगी। इसबार लक्ष्य सात लाख टन रखा गया है। पहली बार गेहूं खरीद के काम में पैक्सों को लगाया गया है। केवल गेहूं की खरीद में तत्परता से लगने के लिए लगभग चार हजार पैक्सों के पीडीएस लाइसेंस निलंबित कर दिए गए। पर परिणाम उलटा निकला।


लगातार प्राकृतिक आपदा झेलने की वजह से गेहूं की फसल इसबार पहले से संकट से घिरी रही है। असमय बारिस होने से कुछ जगहों पर फसल खेतों में ही रह गई, कुछ जगहों पर खलिहान में आकर अनाज सड़ गया। ऐसे असमय वर्षा की वजह से दाने भी ठीक से नहीं लगे। कई जगहों पर गेहूं के दाने बहुत पतले लगे हैं। हालांकि सहकारिता विभाग के सूत्रों का कहना है कि गेहूं का बाजार भाव सरकारी न्यूनतम मूल्य के आसपास ही है, इसलिए किसान सरकारी खरीद केन्द्रों पर आने के बजाए अपनी उपज बाजार में ही बेच दे रहे हैं। सरकारी खरीद की हालत यह है कि अभी तक केवल 915 किसानों को ही सरकारी खरीद का लाभ मिला है।
धान की खरीद उतनी खराब नहीं हुई जितनी का अंदेशा बारिश की अनियमितता की वजह से हो रही थी, बल्कि कुल खरीद पिछले कुछ वर्षों के मुकाबले अधिक ही हुई। लेकिन इसका कारण खरीद की तारीख बढ़ जाने था। विभिन्न जिलों में खरीद का आंकड़ा है अलग-अलग है, पर औसतन कुल मिलाकर लक्ष्य के 38 प्रतिशत ही खरीद हो पाई। इस साल बाढ़ से हुई क्षति के एवज में 15 जिलों के लगभग कभी प्रखंडों में सरकार की ओर से क्षतिपूर्ति भी दिया गया।


मक्का किसानों की हालत कहीं अधिक खराब है। मक्का उत्तर बिहार के बाढ़ वाले इलाके की प्रमुख और सबसे अधिक कमाई वाली फसल है। इसबार उपज भी अच्छी हुई है। लेकिन सरकारी खरीद नहीं होने से बाजार में काफी कम दाम मिल रहा है। जिससे लागत निकलने में भी परेशानी है।
वैसे इस साल सरकार बड़ी तैयारी में है। उसने खरीफ मौसम में 39.50 लाख हेक्टेयर में खेती करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इसके लिए जरूरी खाद-बीज आदि की व्यवस्था कर ली गई है। यह बात कृषि मंत्री प्रेम कुमार ने खरीफ कर्मशाला का उदघाटन करते हुए कही। वीडियो कांफ्रेंसिग से हुई इस कार्यशाला में कृषि सचिव डॉ एन श्रवण ने कहा कि राज्य में पैमाने पर कृषि यांत्रिकरण हुआ है, लेकिन उन यंत्रों की देखभाल और मरम्मत करने के कारीगर उपलब्ध नहीं है। प्रवासी मजदूरों में शामिल युवकों को इसका प्रशिक्षण देने की योजना बनाई गई है। उन्हें छोटे-छोटे सर्विंसिंग सेंटर खोलने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा।

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