August 15, 2020

पत्तल, दौना तथा पंगत वाली संस्कृति, प्लास्टिक मुक्त भारत

रणविजय निषाद, पर्यावरणविद

वर्त्तमान में वैश्विक स्तर पर अपने स्वास्थ्य को लेकर लोकमानस चिन्तित हैं। प्राचीन संस्कृति में आमजनमानस और बुद्धजीवी प्रकृतिप्रेमी हुआ करते थे। शादी-विवाह या अन्य कार्यक्रमों में हम इन्ही पेड़-पौधों के पत्तियों, लकड़ी, छाल आदि का प्रयोग करते थे। नीम की दातून का प्रयोग दाँतों की सफाई के लिए किया करते थे। वर्त्तमान में प्राकृतिक संसाधनों यथा हरे पेड़-पौधों, ताल-तलय्यों, नदियों, झीलों तथा भू-गर्भ जल का प्रत्येक स्तर पर इतना दोहन किया जा चुका है कि अब जल एवं पर्यावरण प्रदूषण तथा हमारे स्वास्थ्य का खतरा मंडरा रहा है। यह संसार चित्र-विचित्र है, यहाँ सुन्दर-असुन्दर, सत्य-असत्य, मृदु-कटु, वरदान-अभिशाप, रात्रि-दिन, आशा-निराशा आदि सोपानों से गुजरना पड़ता है। पर्यावरण क्षरण तथा थर्माकोल, प्लास्टिकयुक्त वस्तुओँ के उपयोग-उपभोग के साथ हमारी प्रगति आशा का मंगलदीप है तो निकट भविष्य में हमारे स्वास्थ्य के लिए कठोर कालरात्रि भी होगी।
निकट भविष्य में यदि हमने अपनी जीवनशैली में परिवर्त्तन नहीं किया तो अपनी कमाई का अधिकांश पैसा दवा इलाज़ में ही खर्च करना पड़ेगा, इसकी शुरुआत अब प्रारम्भ हो चुकी है। वास्तव में समग्र पर्यावरण-प्रदूषण से जड़-चेतन आक्रान्त हैं, जिसके मूल में विकृत मानव प्रवृत्ति है। आजतक सड़क चौड़ीकरण एवं स्वयं के उपयोग-उपभोग हेतु मानव हरी-भरी वनस्पतियों का बड़ी ही निर्दयता के साथ बलपूर्वक दोहन और शोषण करता चला आ रहा है। प्लास्टिक एक ऐसी वस्तु है जिसको हम नष्ट नहीं कर सकते हैं। यही प्लास्टिक मिट्टी के अन्दर जाकर एक परत बना लेती है जिससे वर्षा का जल भू-गर्भ में जा ही नहीं पाता है। परिणामस्वरूप वही जल बहकर नलियों, नालों, नदियों से होता हुआ समुद्र में व्यर्थ चला जाता है। प्लास्टिक विभिन्न प्रकार के रोगों की जननी है।
हमारा थल, जल तथा नभमण्डल इतना विषाक्त हो चुका है कि हमको शुद्ध प्राणवायु (ऑक्सिजन), स्वच्छ शीतल जल मिलना दुर्लभ सा हो गया है; तथा उन्नतशील कृषि के लिए मृदा उर्वरकता भी विच्छिन्न सी हो गयी है। हम साँस, दमा, पीलिया, कैंसर, छय, हैज़ा तथा विभिन्न प्रकार के रोगों से ग्रसित होते जा रहे हैं। ऐसी ही बीमारी, हाल ही में कोरोना वायरस डिजीज-19(कोविड-19) से आमजनमानस त्राहिमाम-त्राहिमाम कर रहा है। ऐसा नहीं है कि इससे बचने के लिए निरापद उपाय और युक्तियाँ नहीं हैं; परंतु मानव सर्वनाश के किनारे खड़ा होकर भी प्रकृति-प्रलय की आहट नहीं सुन पा रहा है।
आज से लगभग 25 वर्ष पीछे हम जाते हैं तो देखते हैं कि गाँवों में तालाब हुआ करते थे, लोग अपने आस-पास नीम, तुलसी, पीपल, बरगद,पलास, महुआ आदि के पौधों को लगाते थे, उन्हें देखभाल करके वृक्ष का रूप देते थे। तालाबों में हम स्नान करते थे, कपड़े धुलते थे, जानवरों को पानी पिलाते थे, कहीं-कहीं वर्षा के एकत्र जल को पीते भी थे, तब आर०ओ० या हैण्डपम्प की व्यवस्था नहीं थी; और लोग बहुत कम बीमार हुआ करते थे।

दूसरी तरफ़ शादी-विवाह और प्रीतिभोज के कार्यक्रमों में पलास, महुआ के पत्तियों से बने पत्तल, दौना तथा मिट्टी के प्याले और कुल्हड़ का प्रयोग हम भोजन करने में करते थे। नीम की दातून से दाँतों की सफाई करते थे तब पायरिया जैसे रोगों को हम जानते ही नहीं थे। आज विविध प्रकार के दन्तमंजन आ गए फिर भी हम दाँत के दर्द, पायरिया और दन्तक्षरण से पीड़ित हैं। आज हम, अपने खानपान में रिफाइंड तैल का प्रयोग करते हैं जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, सरसों के तैल की पूड़ी-सब्जी की बात ही कुछ और थी, पूड़ी ठंढी होने के बाद भी मुलायम ही रहती थी। पंगत में बैठकर पत्तल, दौना में खाने का मज़ा ही कुछ और था। लोग उतना ही लेते थे जितना खाना खा सकते थे। आज बफ़र पद्धति में खाना की बर्बादी देखी जा रही है, जिसे देखकर अपराधबोध होता है। सरसों के तैल लगाने से थकान दूर होती थी, बाल बहुत कम झंड़ते थे, बालों को डाई नहीं कराना पड़ता था, काले ही रहते थे। आज छोटे-छोटे बच्चों के सफेद बाल देखे जा सकते हैं।
अपने जीवनशैली में परिवर्त्तन करके अपने सुस्वास्थ्य के लिए कैंसर, पीलिया, दमा, छय रोग से बचने हेतु हमको शादी-विवाह और अन्य कार्यक्रमों में भोजन के लिए पत्तल, दौना तथा कुल्हड़ का प्रयोग करना ही होगा। थर्माकोल की प्लेट, प्लास्टिक की गिलास तथा रिफाइंड तैल का बहिष्कार करना पड़ेगा। जब हम पत्तल, दौना का प्रयोग करेंगे तो निश्चितरूप से पलास, महुआ, बरगद , नीम का पौधा लगाएंगे जिससे हमारा पर्यावरण भी स्वच्छ होगा, हरे पेड़-पौधों की वजह से मानसून भी जल्दी आयेगें जिससे वर्षा भी होगी।

आओ प्लास्टिक मुक्त भारत बनाने हेतु संकल्प लें–
1- शादी-विवाह और अन्य कार्यक्रमों में भोजन हेतु पलास, महुआ आदि की पत्तियों से निर्मित पत्तल और दौना का प्रयोग करेंगे। थर्माकोल की प्लेट और प्लास्टिक की गिलास का प्रयोग नहीं करेंगे।
2- दाँतों की सफाई नीम की दातून से करेंगे।
3- अपने आस-पास नीम, तुलसी,पीपल,महुआ तथा पलास का पौधा लगाकर, उसे वृक्ष का रूप देंगे।
4- वर्षा जलसंचय हेतु भौगोलिक दृष्टिकोण से निचले स्थान पर तालाबों का निर्माण करेंगे। जहाँ आस-पास का वर्षा का जल एकत्रित हो सके।
5- जब हम बाज़ार जाएँ तो जूट/कपड़े का थैला या झोला लेकर जाएँगे। प्लास्टिक में खाद्य सामग्री नहीं लाएँगे, तथा अन्य व्यक्तियों को भी प्रेरित करेंगे।
6- चाय या अन्य पेय पदार्थ का उपभोग हम प्लास्टिक या थर्माकोल से निर्मित पात्र में नहीं करेंगे।

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