December 16, 2019

गांव अभी पढ़ने बैठा है…

मिथिलेश कुमार राय
उस दिन अखिलेश सदा बाजार में मिला था तो चिंहुक रहा था। बोला-तार और बलब खरीदने आए हैं। टोले में कल से बिजली आने लगी है। सुनकर मेरे होंठों पर भी हंसी आ गई। मैंने उन्हें मुबारकबाद दी और कहा कि चलो, एक लंबे इंतजार का अंत हो गया। बिजली के आने की खबर से उसके चेहरे पर मुझे कुछ रोशनी पसरी हुई दिख रही थी। लेकिन घुप्प से वह बुझ गया, लगा जैसे बिजली कट गई हो। असल में उसकी बुनियादी चाहत बलवती हो गई थी। कहने लगा-बिजली से भी पहले सड़क का इंतजार हो रहा है। यह इंतजार खत्म हो जाए तो जिंदगी को कुछ गति मिले।

यह लालपुर की बात है, लालपुर महादलित टोले की। एक छोटे से गांव के छोटे से टोले की। तीन टोले के एक गांव की। बीच में एक ध्वस्त नहर है। नहर के पश्चिम दो टोले और पूरब एक टोला। पश्चिम का टोला ब्राह्मण टोला और सिंह टोला। पूरब का सदा टोला। यह अखरने वाली बात थी कि पश्चिम के टोले में दशकों से बिजली के बलब जल रहे थे। ईंट सोलिंग की साफ सड़कें थीं। वह सड़क जब बाढ़ में ध्वस्त हो गईं-प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना से चकाचक ढलाई और पिचिंग वाली सड़क बन कर तैयार हो गई। क्यों? पूरब टोले में इस तरह का कोई सवाल कभी किसी के दिमाग में नहीं उठा, न ही किसी को अखरा। अखरना और सवाल का उठना दोनों ही मेहनत और मजदूरी की जद्दोजहद में गुम हो जाते हैं।

लेकिन कार्य अब प्रगति पर है। अखिलेश कह रहा था कि बिजली आ गई। अब सड़क भी आ जाएगी। बाढ़ से पहले की कच्ची सड़क ध्वस्त हो गई थी, उसे ठीक कराने और जगह-जगह पुल-पुलिया देने के बारे में बात उठी है। लगता है कि जल्दी ही सब ठीक हो जाएगा और जब सावन आएगा, मुख्य सड़क तक तैर कर जाना नहीं पड़ेगा..।
चीजें तेजी से बदल रही है। ग्रेजुएशन के बाद गांव के तीन-चार युवाओं ने नौकरी की बाट नहीं देखी और मेडिकल रिप्रजेन्टेटिव की नौकरी ज्वाइन कर ली है। दशकों पहले जो लोग रोजगार की खोज में पंजाब, दिल्ली, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश की ओर निकले थे, उनमें से कुछ बुजुर्ग होकर अब गांव लौट आए हैं। आज किसी भी घर में ऐसी कोई लडकी नहीं होगी जिसका स्कूल में एडमिशन न हो। कॉलेज जाने की रफ्तार अभी कम है लेकिन धीरे-धीरे वह भी गति पकड़ रही है। लोगों का अंदाजा है कि आने वाले दस-बीस सालों में लालपुर की सूरत बदल जाएगी। लोग ऐसा इसलिए कहते हैं क्योंकि अब गांव में बच्चे और बच्चियों को हुजूम में स्कूल जाते हुए देख रहे हैं। उन्हें ट्यूशन जाते हुए देख रहे हैं। सफेद कमीज और ब्लू पेंट में जब बच्चे समूह में पढ़ने जाते हुए दिखते हैं तो लोगों के दिलों में एक भरोसे का जन्म होता है कि आने वाले दिनों में गांव की तस्वीर साफ और संपन्न नजर आएगी…

ऐसा नहीं है कि गांव ने अभी-अभी पढ़ना शुरू किया हो। गांव बहुत पहले से पढ़ रहा है। लेकिन वह आगे क्यों नहीं बढ़ रहा था। लोग कहते हैं कि पूरा गांव नहीं पढ़ रहा था। गांव का सिर्फ एक टोला पढ़ रहा था। पढ़कर गांव का सिर्फ वह एक टोला आगे बढ़ रहा था। पूरा गांव आगे नहीं बढ़ रहा था। अब पूरा गांव साथ साथ पढ़ने लगा है तो उम्मीद जग रही है। जो गांव अभी पढ़ने के लिए बैठा ही हो उसका क्या इतिहास हो सकता है। अगर होगा भी तो वह किस तरह का इतिहास होगा। उस इतिहास में क्या-क्या दर्ज होगा। ज्यादा से ज्यादा थोड़ी-सी जमींदारी, थोड़ा बहुत मूंछों पर तांव। बाद बाकी भूख, गरीबी, अशिक्षा, बेकारी, पलायन, उदासी आदि-आदि। लेकिन अब श्वेत श्याम तस्वीर में रंग भरता जा रहा है। अब पिताओं के मन में हसरत है। बगल में स्कूल है, कॉलेज है। सड़कों के कारण परिवहन के साधन हैं। रात के अंधेरे से निपटने के लिए बिजली के लट्टू हैं। अस्पताल है। मेहनत करने का जज्बा है। अब इतिहास बनकर रहेगा। फिर उसे लिखा जाएगा।

गांव की चौहद्दी में पूरब में एक नदी है। नाम है-सुरसरि। जेठ में नदी के पेट का बालू हवा संग उड़ता रहता है और जब सावन-भादो आता है, तब नदी इतना भर जाती है कि उसका पानी बांध को चूमने के लिए बार-बार दौड़ता है। उन दिनों बाशिंदों का एक जरुरी काम यह हो जाता है कि वे नदी के पानी को बार-बार जाकर देखें और सजग रहे। यहां के लोग बाढ़ को कभी विस्मृत नहीं कर पाते। लेकिन नदी के पास आकर लालपुर की सीमा खत्म नहीं हो जाती। लालपुर जितना नदी के इस पार है उतना ही नदी के उस पार भी-नोनिया टोला। पश्चिम में तिलाठी है-नीची जमीन में बसा गांव। उत्तर में हरिहरपुर और दक्षिण में रामपुर। हरिहरपुर यादव और मंडल का गांव है। रामपुर में मुसलमानों की घनी आबादी है। लालपुर, रामपुर, हरिहरपुर और तिलाठी में सिर्फ तिलाठी ही अपनी दूरी की वजह से अलग गांव का भ्रम रचता है। बाकी रामपुर, लालपुर और हरिहरपुर माने ब्राह्मण, नोनिया, यादव, महादलित, मंडल आदि टोले के लोग जैसे एक ही परिवार के लोग थे जो बाद में अलग-अलग घर बनाकर रहने लगे हैं, इस तरह बसे हुए हैं। किसी को भी याद नहीं कि इन सब के बीच कभी कोई बड़ा मामला हुआ हो और वह बुरी तरह उलझ गया हो। कभी हुआ भी होगा तो दस आदमी बैठकर उसे सुलझा लिए होंगे, बात आई गई हो गई होगी। क्योंकि सबकी राम कहानी एक जैसी ही है। सारे गांव के लोग परदेस आते-जाते हैं और अपनी नई पीढ़ी को पढ़ा रहे हैं। सारे गांव के लोगों की आंखों में एक ही सपना है जो वे तब देखते हैं जब बच्चे तैयार होकर स्कूल के लिए निकलते हैं…।
(स्वतंत्र लेखन, फिल्म निर्माण ग्राम लालपुर, प्रखण्ड छातापुर जिला सुपौल,बिहार)

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