October 14, 2019

पक्की दीवालों के पीछे की बदहाली की कहानी कहता गांव

प्रो डॉ योगेंद्र यादव
मेरा अपने गांव से विचित्र रिश्ता रहा है। गांव से हूं भी, नहीं भी हूं। मेरा पैतृक गांव हरियाणा के रेवाड़ी जिले का सहारनवास है जो रेवाड़ी से 5 किलोमीटर की दूरी पर है। पिताजी शहर में नौकरी करते थे। राजस्थान के गंगानगर में। इसका मतलब यह हुआ कि छोटे शहर में बड़ा हुआ। गंगानगर शहर एक तरह से गांव का विस्तार ही था। खाली जमीन पर बनाया गया नया शहर। बांगड़ी और पंजाबी संस्कृति का मेल होता था शहर में। खानपान गांव की तरह ही था और संस्कृति गंवई थी। शहर का घर था। पिताजी विभिन्न विचारों में रूचि रखते थे। माक्र्स, गांधी, लोहिया आदि विचारकों की किताबें घर में थी, लेकिन उसी घर में भैंस भी पाली जाती थी। रोज उस भैंस का चारा भी लाता था। जब दूध का सीजन होता था तो पास-पड़ोस में दूध भी दे आया करता था। विचार की दृष्टि से परिवार एक वैश्विक संस्कृति का वाहक, लेकिन खान-पान, रहन-सहन में विशुद्ध गंवई।

जब पढ़ने के लिए दिल्ली आया, शहर को देखा, तब यह समझ पाया कि एक ही साथ दाल और रोटी दोनों खाते हैं। हमारे इलाके में मिस्सी रोटी, मक्खन, दूध यही खाना था। गांव हर साल जाना होता था। पिताजी का आग्रह था कि गर्मी की छुट्टी गांव में ही बिताई जाए। इसलिए गांव से वहां लगातार रहने वाले व्यक्ति जैसा संबंध भले नहीं रहा, पर अतिथि जैसा संबंध रहा। पिताजी ने सुनिश्चित किया कि हम गांव के लोगों को जानें और वे हमें जाने। इसलिए आज भी रिश्ता न सिर्फ बना हुआ है बल्कि पहले से ज्यादा गहरा हुआ है। जिस दिन पिताजी रिटायर हुए, उसी दिन से शहरी संपत्ति बेचकर गांव में रहना शुरू किया। आज भी मेरे माता-पिता गांव में ही रहते हैं। उन्हें सेवानिवृत हुए 30 साल हो गए। मेरा भी गांव से बेहतर और नियमित आने जाने का संबंध बना हुआ है। पिछले 50 साल को देखूं तो गांव का चेहरा बिल्कुल बदल गया है। एक भी घर कच्चा नहीं बचा। गरीबी, बदहाली है लेकिन अब पक्की दीवारों और बंद दरवाजों के पीछे छिपी हुई है। खेती किसानी पर निर्भरता आज भी है लेकिन हर परिवार में कोई न कोई नौकरी करने वाला व्यक्ति है। पहले परिवार की हैसियत इससे तय होती थी कि किसके पास कितनी जमीन है। अब नौकरी और बड़ी नौकरी से हैसियत तय होने लगी है।

बहुत बड़ा बदलाव दलित समाज की आस्था में परिवर्तन है। हमारे गांव में लगभग आधी आबादी दलित है। बाकी आधे में अधिकांश लोग यादव समाज से हैं। सारी जमीन लगभग यादव समाज के पास थी। पिछले 50 साल में दलित समाज के पास जमीन के कुछ टुकड़े आए हैं, लेकिन उससे भी बड़ी बात यह है कि सरकारी नौकरी खासतौर पर रेलवे में आरक्षण के चलते दलित जाटव समाज के कई लोगों को नौकरी मिली। घर की अवस्था सुधरी और समाज में सम्मान भी बढ़ा। दलित और गैर-दलित में आज भी रोटी-बेटी का व्यवहार नहीं है लेकिन दोनों की हैसियत में अंतर बहुत कम हुआ है। औरतों की स्थिति में बहुत सुधार हुआ है। घूंघट आज भी चलता है लेकिन घूंघट के पीछे से खरी-खरी बात कहने वाली औरतें आसानी से मिल जाती हैं। पढ़ने में लड़कियां लड़कों से ज्यादा तेज है। मेरी दोनों बहनें चाहे गांव में पली नहीं, लेकिन उन दोनों का डॉक्टर बनने और नजदीक के शहर में प्रतिष्ठित होने से गांव की बहुत लड़कियों को संबल मिला है। बंद दरवाजे के पीछे औरत से दुव्र्यवहार और मारपीट होती है, लेकिन कुल मिलाकर वे पहले से ज्यादा सक्षम है।

सुख सुविधाओं में विस्तार के साथ गांव का सामाजिक तानाबाना कमजोर हुआ है। रोज शाम मिल-बैठकर बात करने या झगड़ने के बजाए अब घरों के दरवाजे बंद हो जाते हैं। दिन में तास की मंडली और शाम को टीवी अधिकांश निठल्ले मर्दों का समय खा जाती है। गांव में अब पक्की सड़क है, लेकिन सफाई नहीं। दिल्ली में स्वच्छ भारत की घोषणा हो गई, लेकिन गांव में चारों तरफ गंदगी के दर्शन होते रहते हैं। गांव के दो छोर पर दौ जोहड हैं। बचपन में एक जोहर में बच्चे नहाया करते थे, दूसरा जोहड पशुओं के लिए था। दोनों जोहड के किनारे कुओं से मीठा पानी लिया जाता था जिससे सारे गांव का काम चलता था। क्योंकि हमारे यहां भूगर्भ का पानी खारा है। आज दोनों जोहड कूड़ा घर बन चुके हैं। उनके गंदले हरे पानी को मवेशी भी नहीं पीते। गांव अब सरकारी पानी के पाइप पर निर्भर है, जिसे लेकर झगड़े होते रहते हैं।

अगर किसी एक चीज का निर्विवाद विस्तार हुआ है तो वह है शराब। शाम के वक्त जब भी सभा-बैठक हो तो कोई न कोई शराबी रंग में भंग डालता है। गांव की जिस औरत से बात करो, वह एक ही प्रार्थना करती है, शराब की दुकान हटवा दो। शराब बंद करवा दो। शराब के चलते घर टूट रहे हैं। बच्चे बर्बाद हो रहे हैं। बेशक आज गांव में पहले से ज्यादा पैसा है लेकिन पैसे के झगड़े भी पहले से ज्यादा उग्र हैं। खानपान का स्तर पहले से उंचा है, लेकिन दिखावा ज्यादा है और पोषण कम। गांव के स्कूल की बिल्डिंग बेहतर हो गयी है। पढ़ने वाले बच्चे कम हो गए हैं और शिक्षा की हालत पहले भी बेकार थी, अब भी बेकार है। जिस घर की थोड़ी बहुत हैसियत है, वे सभी अपने बच्चों को रेवाड़ी शहर के स्कूल में भेजते हैं। अंग्रेजी माध्यम स्कूलों का बोलबाला है। बस दिक्कत यह है कि न मां-बाप अंग्रेजी जानता है, न बच्चा और न ही अध्यापक अंग्रेजी जानता है। बेरोजगार लड़के गांव में घूमते दिखाई देते हैं। इतनी शिक्षा सबको मिल गयी है कि हाथ से काम करने में तौहीन मानते हैं, लेकिन इतनी शिक्षा नहीं मिली कि कोई ठीक ठाक नौकरी या दूसरा काम कर सकें। शायद इसी को विकास कहते हैं। बचपन में गांव जाता था। लेकिन संबंध, संपर्कों का दायरा या तो रिश्तेदारी में था या पड़ोस तक सीमित था। धीरे-धीरे सब रिश्तेदार गांव से बाहर शहरों में आ गए।

विचित्र संयोग है कि अपनी पीढ़ी में सबसे ज्यादा शिक्षित मेरे पिताजी हैं। वे गांव में ही रहते हैं। एक लिहाज से सबसे ज्यादा शहरी मेरा परिवार है। गांव से ज्यादा रिश्ता बना के रखा हुआ है। बृहत परिवार से रिश्ता अच्छा है लेकिन गांव उसकी धुरी नहीं बना। शादी-समारोह के बहाने इकट्ठे होते हैं, लेकिन पिछले 20 साल से सारा परिवार गांव में इकट्ठा नहीं हुआ। बाकी गांव से संबंध अच्छा रहा है तो उसका एक विशेष कारण है कि पिताजी के बहुत पढ़े लिखे होने की वजह से और उनकी विनम्रता और उदारता के चलते गांव के हर व्यक्ति का उनके प्रति विशेष आदर रहा है, झगड़ा करना असंभव काम है। उनके प्रति जो आदर है उसका कुछ अंश मुझे भी मिल जाता है। उनकी नजर में मैं भी वीआईपी हूं, इसलिए गांव के सामान्य संबंधों की खींचतान हमारे परिवार तक नहीं पहुंचती। उसका फायदा भी है और नुकसान भी। फायदा यह है कि गांव के नाहक और टुच्चे किस्म के झगड़े से दूर हैं, नुकसान यह है कि एक कृत्रिम किस्म का संबंध रहता है। गांव की अदरूनी राजनीति से थोड़ी दूरी बनी हुई है जिसके चलते सब पक्षों से दुआ सलाम बनी रहती है। पंचायत के चुनावों को लेकर गांव में अच्छा खासा तनाव रहता है। दुश्मनियां होती हैं, लेकिन साथ-साथ चुनावी राजनीति के चलते दलित समाज की हैसियत बेहतर हुई है।

मेरा गांव हरियाणा के उस इलाके में है जो हरियाणा की छवि से मेल नहीं खाता। दरअसल उसे राजस्थान कहा जाए तो बेहतर होगा। सूखी जमीन है, बारिश बहुत कम होती है, नजदीक कोई नदी, नाला, नहर नहीं है और जमीन का पानी खारा है। इसलिए हमारे यहां धान, गन्ना या फल, सब्जियां उगाने की कोई गुंजाईश नहीं। मुख्य फसल रबी की है। पहले ज्वार, चना, सरसों और गेहूं होता था अब सिर्फ सरसों और गेहूं होता है। खरीफ की फसल लगभग रामभरोसे चलती है। मुख्यतः बाजरा बोया जाता है, बारिश हुई तो ठीक हो जाता है नहीं तो नहीं। गांव में दो बड़े जमींदार परिवार को छोड़कर सब परिवारों की जोत छोटी होती जा रही है। सिर्फ खेती के दम पर कोई परिवार संपन्न नहीं है। जो परिवार नौकरी के दम पर अपेक्षाकृत संपन्न है उन्होंने अपने हाथ से खेती करना छोड़ दिया है। मेरे परिवार की तरह वे सब अपना खेत ठेके या बंटाई पर दे देते हैं। जो सिर्फ खेती पर निर्भर है वह पहले से बदहाल था आज भी बदहाल है। गाय, भैंस के सहारे गुजारा चलता है लेकिन हमारे यहां डेयरी रखने का प्रचलन नहीं है।

अपने गांव के भविष्य के बारे में सोचता हूं तो पहला सवाल तो यही उठता है कि गांव बचेगा भी या नहीं। हमारा गांव शहर से 5 किलोमीटर से कम दूरी पर है। बीच में दो रेलवे लाईन पड़ते हैं इसलिए शहर का विस्तार तेजी से हमारी दिशा में नहीं हुआ। लेकिन अब पूल बन गए हैं और रेवाड़ी शहर हमारी तरफ पसरने लगा है। गांव के लोग मानकर चलते हैं कि देर-सबेर हमारी जमीन का अधिग्रहण होगा। आज नहीं तो आज से 50 साल बाद सहारनवास रेवाड़ी शहर का एक मुहल्ला बन जायेगा। हो सकता है कि बड़ी जमीन वाले अपने बाप-दादा के नाम पर कॉलोनी काटकर कोई अभय सिंह नगर या जसवंत पुर नगर बसा दे या हरियाणा विकास प्राधिकरण अपना सेक्टर 58 या 72 वहां खोल देगा। पता नहीं कितने लोगों को बुरा भी लगेगा, पर हो सकता है मेरे गांव के कई लोग इसी इंतजार में बैठे हों। यह तस्वीर ग्राम स्वराज के अमूर्त सपने से बहुत दूर है। शायद भयावह भी है। लेकिन अगर यह हमारी वस्तुस्थिति पर टिप्पणी है तो साथ ही हमारे सपनों पर भी।

मैंने अपने लिए अब भी यह सपना नहीं छोड़ा है कि आने वाले कुछ सालों में दिल्ली छोड़कर गांव में रहना शुरू करूंगा। यह कोई वैचारिक आग्रह नहीं है। ऐसी संभावना इसलिए है कि यह एक पारिवारिक संस्कार है, पिछले चार पीढ़ियों से मेरे परिवार में लोगों ने शहर में काम किया और जीवन के अंतिम दौर गांव में बिताया। मैं भी ऐसा कर पाऊं तो सही रहेगा।
सामाजिक,राजनीतिक चिंतक व राष्ट्रीय अध्यक्ष स्वराज पार्टी

About The Author

Related posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *