November 16, 2019

लोकशक्ति से होगा गांवों का विकास बशर्ते राजशक्ति करे लक्ष्मण रेखा का पालन

प्रो डाॅ आनंद कुमार
हमारे देश के अधिकांश हिस्से में गांव बनाम शहर का दर्द कई कारणों से सुलझने की बजाय उलझता जा रहा है। गांव की तुलना में शहर का पलड़ा आर्थिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से लगातार भारी हुआ है। गांधीजी की यह मान्यता थी कि भारत गांवों का देश है। अब नयी आर्थिक नीति के दौर में समाज का चेहरा दुखद सच की तरह विकृतियों का शिकार बन गया है। इस दृष्टि से पूर्वी उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के गहनी गांव में लगभग डेढ़ दशक तक रचनात्मक नवनिर्माण के प्रयासों का उल्लेख प्रासंगिक होगा।

जौनपुर सरकी सल्तनत के दौरान उत्तर भारत की राजधानी था। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में जौनपुर के किसानों ने बागी सिपाहियों का साथ दिया था। राष्ट्रीय आंदोलन के चरम बिंदू अर्थात अगस्त 1942 में अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन में जौनपुर ने भरपूर योगदान किया था, लेकिन आजादी के 35 साल बाद यानी 1989 में गहनी गांव हर तरह की बदहाली का शिकार था। परिवर्तन की कुंजी के रूप में शिक्षा और रोजगार के दो मोर्चों पर हमलोगों ने परिवर्तन नामक मंच से स्थानीय ग्रामीणों की शुभकामनाओं और युवक-युवतियों के सहयोेग से काम शुरू किया। एक माध्यमिक विद्याालय की स्थापना के लिए गांव सभा ने सहर्ष जमीन उपलब्ध कराई। शिक्षित लेकिन बेरोजगार युवकों में से कुछ लोग शिक्षक बने। परिवारों ने अपने बच्चे-बच्चियों को इस नए स्कूल में भेजना शुरू किया। इस सफल शुरूआत का एक कारण यह भी था कि आजादी के तीन दशक बाद भी कई गांव में छोटे बच्चों के लिए पढ़ाई की सुविधा नहीं थी। इसी के समांतर ग्रामीण स्त्रियों के बीच में खादी ग्रामोद्योग आयोग की वाराणसी शाखा की मदद से एक कताई केंद्र भी शुरू किया गया। इसके लिए ग्राम प्रधान ने अपने अहाते में जगह दी, जहां विभिन्न जातियों की स्त्रियां बिना भेदभाव के चरखा चलाकर स्वरोजगारी बनने में जुट गईं। इन दोनों छोटे कदमों ने परिवर्तन के इस प्रयोग को प्रतिष्ठा दिलाई। इससे हमलोग तीसरे कदम के रूप में स्वास्थ्य शिविरों के लिए काशी विश्वविद्यालय के सर सुंदरलाल अस्पताल के चिकित्सकों का सहयोग लेने में सफल हुए।

गहनी जैसे गांवों में 1971 के गरीबी हटाओ कार्यक्रम के दौरान निर्धन परिवारों को भैंस देने का प्रयोग असफल हो चुका था। लेकिन पशुपालन के जरिए अपनी पारिवारिक आय बढ़ाने के लिए परिवारों में उत्साह था। इसका सदुपयोग कर हमलोगों ने अच्छी प्रजाति की बकरियां बांटी। बकरियां पालने वाले परिवारों से सालभर के अंदर बकरी के बदले बकरी वापस लेने का नियम बना और गहनी और आसपास के सौ से ज्यादा परिवार बकरी की मदद से गरीबी से लड़ने में कुछ कदम आगे बढ़े। इस काम में शुरूआती संसाधन की व्यवस्था अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन और दिल्ली स्थित सेंटर फाॅर सोशल रिसर्च ने की। यह स्वभाविक था कि शिक्षा, गरीबी का मुकाबला, स्वास्थ्य सुधार और पशुपालन के बाद गांव के लोगों में फलदार पेड़ लगाने के प्रस्ताव के प्रति सकारात्मकता बनाई गई। जौनपुर के जिला सामाजिक वानिकी विभाग के सौजन्य से दो बार वृक्षारोपण के लिए पौधे तैयार कराए गए। हमारे रचनात्मक परिवर्तन अभियान में अपना योगदान करने के लिए जिला प्रशासन ने 3 किलोमीटर सड़क और जल संरक्षण के लिए एक बड़े तालाब के निर्माण कराया। चूकी गहनी में परिवर्तन के कार्यक्रमों में बनारस और दिल्ली के समाज विज्ञानियों, चिकित्सकों, कृषि विशेषज्ञों और महिला सशक्तिकरण से जुड़े व्यक्तियों का समन्वय था, इसलिए ग्रामीण जीवन की मुख्य सामाजिक चुनौतियों अर्थात जातिवाद, स्त्रियों की उपेक्षा और आर्थिक बदहाली से जुड़े अपराध की प्रकृति भी सरोकारों के दायरे में आ गई।

लेकिन इस पूरे अभियान में कुछ समस्याएं भी पैदा हो गयी जिनका कोई समाधान हमारे पास नहीं था। उदाहरण के लिए चुनावों के मौके पर हमारे समूह में व्यक्तियों के बीच उम्मीदवारी का आवेग पैदा हो जाता था। कुछ स्वयंसेवक ग्राम पंचायत और विधानसभा के चुनाव में उम्मीदवार भी बने। दूसरे, जिला प्रशासन के सर्वोच्च स्तर पर हमारी पहुंच के बावजूद प्रखंड स्तर अधिकारियों और कर्मचारियों की उदासीनता का हमारे पास कोई समाधान नहीं था। तीसरे, परिवर्तन का सारा कार्यक्रम स्त्री-पुरूषों के सहयोग से स्त्रियों के अगुवाई में चलाया जा रहा था। इससे एक तरफ तो गहनी गांव की स्त्रियों में अपने सामथ्र्य को लेकर आत्म विश्वास बढ़ा, लेकिन दूसरी तरफ परिवार की पारंपरिक व्यवस्था दरकने लगी। हमारे साथ सक्रिय स्त्रियां अपने पति, देवर, सास, श्वसुर के व्यवहार में निहित अंर्तविरोधों के बारे में बोलने लगीं। बच्चों और बच्चियों को कम उम्र में ब्याह के लिए ढ़केलने से इंकार करने लगीं। गांव की बेटियां दूसरे गांव में ब्याही जाने के बावजूद ससुराल की ज्यादतियों से मुकाबला करने के लिए मायके में ही परिवर्तन के कार्यों के जरिए अपनी नयी राह बनाने लगी। चौथे, गांव के शिक्षा प्राप्त कर रहे युवकों में गांव के बाहर की दुनिया में जुड़ने और शहरी जिंदगी में जगह बनाने का आवेग प्रबल होने लगा। खेती की दुर्दशा व समाधान के बजाए शहरी काम धंधों के लिए कोशिश को प्राथमिकता दी जाने लगी। फिर भी हमने ग्रामीण नवनिर्माण की दिषा में जन सहयोग विषेषकर स्त्रियों के उत्साह को अप्रत्याशित पूंजी के रूप में पाया।

दूसरी ओर मूल्यों में परिवर्तन के कारण विवाह, परिवार, जाति, राजनीति और शहरीकरण से जुड़े सवालों को उठते देखा। हमारा प्रयोग एक पीढी़ के उभरने के साथ अपने लक्ष्य तक पहुंच कर समापन की सीढ़ी की ओर बढ़ने लगा। अब गहनी गांव के बच्चों के लिए टिकाऊ माध्यमिक विद्यालय चल रहा था। स्त्रियों ने चरखा कटाई और बकरी पालन से शुरू गरीबी से मुक्ति की साधना में अपने-अपने ढंग से कई नए प्रयासों से सषक्तिकरण सीख लिया था। स्वास्थ्य और पर्यावरण के प्रति सजगता का भाव घर-घर में प्रबल हो चुका था। लेकिन पदों की होड़, पैसे का आर्कषण, निजी संबंधों में नए आयाम और बनारस व दिल्ली के शुभचिंतकों के जरिए परिवर्तन की रचना के अर्तविरोध भी थे। इसलिए गांव की स्वायत्तता और सीमाओं का सम्मान करते हुए परिवर्तन ने गहनी की युवा-शक्ति और महिला शक्ति को अपने सामुदायिक बल के आधार पर आगे बढ़ने का अवसर देने के लिए बाहर से आ रही आर्थिक मदद और योजनाओं का समापन करने का निर्णय लिया।

इस परिवर्तनकारी प्रयोग के निष्कर्ष के रूप में यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि हमारे गांव में लोकशक्ति के आधार पर सहकारी प्रगति की अपार क्षमता है बशर्ते राजशक्ति और दलीय राजनीति इसमें बाधक बनने के बजाए साधक बनने की लक्ष्मण रेखा का संयम रखें।
(ज.ला.ने. विश्वविद्यालय नयी दिल्ली के रिटायर्ड प्रोफेसर, राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक)

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