November 15, 2018

चिपको की सफलता की कहानी चंडी प्रसाद भट्ट की जुबानी

संतोष कुमार सिंह

– अनुपम जी मेरे मित्र थे और उन्होंने मेरे जैसे अनेक मित्रों की आंखों को रोशनी दी जिससे समाज को देखने, दुनिया को देखने समझने की दृष्टि मिली।
– हिमालय के सवाल पर भारत,चीन,नेपाल,भूटान का बने प्राकृतिक मोर्चा
नयी दिल्ली:चंडी प्रसाद भट्ट जी प्रथम अनुपम मिश्र व्याख्यान देते हुए कहा कि अनुपम उनसे 15 वर्ष छोटे थे। गांधी ​स्मृति एवं दर्शन समीति राजघाट द्वारा अनुपम मिश्र की याद में इस श्रृंखना का प्रथम व्याख्यान आयोजित किया गया। विषय था—हिमालय बदलते सवाल में संवेदन की कसौटी। इस क्रम में भट्ट ने अपने साथ अनुपम के संबंध का उल्लेख करते हुए कहा कि अनुपम जी पुष्प थे और मैं उस पुष्प की सुगंध से आकर्षित होकर पुष्प पर मड़राने वाला कीड़ा। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कहा कि मित्र आंख में लगने वाले सुरमे की तरह होते हैं। सुरमे का कार्य आंखों की रोशनी बढ़ाना होता है। अनुपम जी मेरे मित्र थे और उन्होंने मेरे जैसे अनेक मित्रों की आंखों को रोशनी दी जिससे समाज को देखने, दुनिया को देखने समझने की दृष्टि मिली।

चिपको आंदोलन की सफलता और उसके विभिन्न पड़ावों की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि चिपको की सफलता की कहानी आम लोगों की कहानी है। भुक्त भोगी महिलाओं की कहानी है। ये आंदोलन फैशन का नहीं है। हम दो कारनों से उत्तराखंड में परेशान थे। अलकनंदा में प्रलय की स्थि​ती थी। पूरी घाटी में पेड़ लगा था लेकिन पेड़ों की कटाई के वजह नदियां सिल्ट से भरी थीं। जहां—जहां पेड़ काटे गये वहां से शिल्ट आई और नदियों की बहाव क्षमता प्रभावित होती गई,नदियां उथली होती गईं। सरकार ने वनों की लकड़ियों से कृषि यंत्र बनाने का अ​नुमती दी, जिसकी वजह से बड़े पैमाने पर वनों की कटाई शुरू हुई। ये हल्की लकड़ियां वन विभाग के लिए डॉलर का काम करने लगीं। जिससे पर्यावरण प्रभावित होने लगा। चिपको आंदोलन के क्रम में 150 लड़कों ने चमोली जिले के अलग—अलग क्षेत्र में वन लगाया। अनुपम ने कहा कि आज जो आप परीक्षा दे रहे हैं,उसका परिणाम 10 वर्ष बाद आएगा। उन्होनें इन लड़कों को गढ़ने का काम किया। आज उनमें से कई लड़के अलग—अलग पद पर हैं लेकिन देश में पर्यावरण की सेवा कर रहे हैं। उन्होनें कहा कि उन लड़कों में एक कांग्रेस राज्य सभा सांसद प्रदीप टम्टा भी शामिल थे। अनुपम ने निष्प्रिय भाव से संघर्ष को सही दिशा देने का और रचना का काम किया। दिनमान जैसे पत्रिकाओं में जब आंदोलन की खबरें छपीं तो उसका प्रभाव ये हुआ कि हमारे शिविर में पुलिसिया कार्रवाई नहीं होगी, से भरोसा हुआ। दिनमान ने हमारे शक्ति बढ़ाने का काम किया। अनुपम चिपको आंदोलन में प्रतिनिधी के रूप में दिल्ली गए। हमारा मानना था कि पत्रकार यदि आंदोलन के क्रम में उन क्षेत्रों में आएंगे तो व्यवधान होगा।
हिमालय के वर्तमान स्थिती पर चर्चा करते हुए चंडी प्रसाद भट्ट ने कहा हमें हिमालय के अंर्तसंबंधों को समझना होगा। केवल उत्तराखंड ही नहीं दिल्ली को भी बचाना है तो हिमालय का संरक्षण करना होगा। केदारनाथ में जो त्रासदी हुई थी वो फिर से हो सकती है। हिमालय आज प्राकृतिक दबाव के साथ भौतिक दबाव का भी सामना कर रहा है। औषधियों के कारण भी वनो पर दबाव है।

नेपाल की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि भले ही नेपाल राजनीतिक ​दृष्टि से अलग है लेकिन प्राकृतिक दृष्टि से एक है। बिहार में बाढ़ आई लेकिन किसी ने उसे बुनियादी तरीके से समझने का प्रयास नहीं किया। हम आपदा को रोक नहीं सकते लेकिन उसके मारक क्षमता को कैसे कम करें, उस दिशा में काम किया जाना चाहिए।
उन्होंने स्कूलों में संस्कार शिक्षण देने की जरूरत पर बल दिया। विकास के वर्तमान धारा पर चोट करते हुए उन्होंने कहा कि विकास चाहिए लेकिन सहअस्तित्व बनी रहे इस बात का ध्यान हो। सड़क तो चाहिए लेकिन लोगों को उजाड़ कर नहीं। बिजली तो चाहिए लेकिन उस बिजली के चक्कर में सर्वनाश न हो। उत्तराखंड की घटना मानव निर्मित है प्राकृतिक नहीं। हम ग्लोबल वार्मिंग के प्रति चिंतित हैं लेकिन लोकल वार्मिंग से अनभिज्ञ हैं।
उन्होंंने सुझाव दिया कि हिमालय से जुड़े सभी देशों मसलन भारत,चीन,नेपाल,भूटान का प्राकृतिक मोर्चा बने ताकि इस ईलाके में होने वाली गड़बड़ियों का विज्ञान सम्मत आदान—प्रदान हो सके और आपदा से होने वाले नुकसान को कम किया जा सके।
सत्याग्रह मंडप में आयोजित इस विचार गोष्टी में देश के कई जाने माने गांधीवादी कार्यकर्ता,पर्यावरण विद् और बुद्धिजीवि उपस्थित थे।

 

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एक दशक से भी ज्यादा से पत्रकारिता में सकिय। संसद से लेकर दूर दराज के गांवो तक के पत्रकारिता का अनुभव। ग्रामीण समाज व जनसरोकार से जुड़े विषयों पर पत्र पत्रिकाओं में लेखन। अब पंचायत खबर के जरिये आपके बीच।

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