August 15, 2020

उतार-चढ़ाव के हिचकोलों भरी जिंदगी में चलते रहना ही नियति है…

प्रशांत बलिया

चंद्रशेखर जी जैसे युगदृष्टा कभी दिवंगत नहीं होते, वे मृत्यु को भी प्राप्त नहीं होते। वे तो सदा वर्तमान रहते हैं, अपने आदर्शों के जरिये, अपने दूरदर्शी विचारों के जरिये अपने लाखों-करोडों समर्थकों के हृदय में सुनहरे भविष्य की आशा की एक धड़कन बन कर। आज चंद्रशेखर जी की पुण्यतिथि है। आज से ठीक 13 वर्ष पहले वे इस देश को हम युवाओं के हाथों में सौंप एक अनंत यात्रा हेतु चले गए।

(पुण्यतिथि स्मरण- 8 जुलाई )

चंद्रशेखर जी का सम्पूर्ण जीवन ही एक यात्रा रहा। ‘चरैवेति-चरैवेति’ के सूत्र वाक्य से अनुप्राणित। उनकी जीवन यात्रा एक ऐसी गाथा है जिसे इतिहास के फ़नकारों ने थोड़ा गाया है, अभी बहुत कुछ गाया जाना शेष है। भविष्य की पीढ़ियाँ आती रहेंगी, छूटी हुई गाथाएं गाती रहेंगी।

चंद्रशेखर के सम्पूर्ण जीवन यात्रा को हमें यदि और बेहतर से जानना हो तो उनके ही शब्दों में-

“आचार्य नरेंद्रदेव ने कहा था : चंद्रशेखर, छोड़िए शोध कार्य, देश बनाने के लिए निकलिए। उसी एक वाक्य ने जीवन की धारा को सदा के लिए बदल दिया। मंजिल की तलाश में चलता रहा, देश बनाने की तमन्ना दिल में लिए, कितने जोखिम भरे अवसरों से गुजरा, कितने ऐसे मुकाम आए जब मंजिल सामने आती दिखाई पड़ी पर फिर वही उधेड़बुन, वही ईर्ष्या द्वेष! विवादों से बचने के प्रयास का परिणाम निकला एक उधेड़बुन भरा जीवन। देश को निकट से देखा समझा। उच्च स्थानों पर आसीन लोगों के क्रियाकलापों को देखने परखने का अवसर मिला, सत्ता के गलियारों में काम करने वाले लोगों से संपर्क हुआ, अल्प समय के लिए ही सही, उसका व्यक्तिगत अनुभव भी किया। साधारण जन की भावनाओं से परिचित हुआ, देश की क्षमता और इसके लोगों की शक्ति में भरोसा बढा, जो कुछ करना संभव था उसके लिए व्यक्तिगत रूप से प्रयास किया। समय रहते आसन्न संकट के प्रति उत्तरदायी लोगों को आगाह किया, पर परिणाम अधिकतर आशा के विपरीत ही रहे। कई बार मेरी आवाज को चुनौती समझ कर उसका प्रतिकार करने का प्रयास किया गया और मेरी सदा यही कोशिश रही कि समय रहते लोगों को आने वाले संभावित खतरे के प्रति आगाह कर दूँ। सारे प्रयास के बावजूद आज जिस दौर से हम गुजर रहे हैं उसमें भविष्य अंधकार में दिखाई देता है। पर हर ऐसे मोड़ पर देश के लोगों ने अपनी शक्ति का परिचय दिया है। अपनी दूरदृष्टि के आधार पर उन्होंने उज्जवल भविष्य के निर्माण के लिए कदम उठाया है। उन्हीं यादों का सहारा है। मैंने संभवत 1955 में अपनी डायरी में लिखा था- ‘ परिवार की सीमाओं में हम समा न सके, नए परिवार हम बना ना सके, प्यार के परंपरागत स्रोत सूख गए, और नए चश्मों की तलाश में हम भटकते ही रहे।’
अपनी तो मनः स्थिति आज भी वैसी ही है। काश, हम भारत के इस परिवार को संजोए रखने की दिशा में कुछ कर सकते!”

चंद्रशेखर जी अन्यंत्र एक जगह लिखते हैं-

” बलिया के एक छोटे से गांव से आज तक की यात्रा एक ऐसी गाथा है जिसमें जिंदगी उतार-चढ़ाव के हिचकोलों से गुजरी है कितने सहयोगी मिले, कितनों ने उन्मुक्त स्नेह दिया। कितनों ने उदासी के क्षणों में सहारा दिया, अपने ममत्व का संबल दिया। साथ ही उनसे भी प्रेरणा मिली जिन्होंने मार्ग में रोड़े अटकाए, अकारण आक्षेप लगाए। मेरे मंसूबों को तोड़ने की हर कोशिश की, पर ऐसे कम ही रहे। जो रहे भी उनका मेरे मन पर कोई गहरा असर नहीं पड़ा। क्षणिक आक्रोश या उदासी में समय बीता, पर शायद ऐसी ही है जग की रीति।”

इस यात्रा के कुछ गाथाओं को आज सुनाना समीचीन रहेगा।

गाथा (1)

चंद्रशेखर जी जब प्रधानमंत्री थे तो एक बार वे सीमा सुरक्षा बल के वार्षिक समारोह के जलसे में गए। महानिदेशक और अफसरों ने उनसे एक अनुरोध किया। उन लोगों ने बताया कि पंजाब और राजस्थान सीमा पर गरम कोट देने की व्यवस्था नहीं है। चंद्रशेखर जी ने पूछा कि गरम कोट के बगैर वहां सैनिक रात में पहरा कैसे देते हैं? तो पता चला कि कंबल या रजाई ओढ़कर ड्यूटी करते हैं। यह मामला उन अफसरों ने बार-बार उठाया था। 2 साल से मामला चल रहा था। चंद्रशेखर जी ने महानिदेशक से बात की तो पता चला कि BSF ने केंद्र से 70 लाख रुपये की मांग की है, लेकिन वह पैसे नहीं मिल रहे हैं। चंद्रशेखर जी ने पता किया तो पता लगा कि मामला फैसले बिना ही अटका हुआ है।
चंद्रशेखर जी ने वित्त मंत्रालय को कहा कि यह राशि उसी दिन स्वीकृत करे।
चंद्रशेखर जी ने तत्काल फैसला लिया और सीमा सुरक्षा बल को वह राशि उपलब्ध हो सकी।
कई बार शासन स्तर पर कई महत्वपूर्ण कार्य फैसले के अभाव में ऐसे ही अटके रहते हैं।

 

गाथा- (2)

1971 का दौर था, इंदिरा जी की सरकार थी। चंद्रशेखर जी मंत्री पद अस्वीकार कर चुके थे। लेकिन इंदिरा जी चंद्रशेखर जी को कोई जिम्मेदारी अवश्य देना चाहती थी। उनके परामर्श से एक दिन रघु रमैया जी चंद्रशेखर जी के पास आये और पूछा कि चंद्रशेखर जी किस संसदीय समिति में रहना चाहेंगे? (सदस्य नहीं, अध्यक्ष या चेयरमैन होने की बात थी।) चंद्रशेखर जी ने किसी कमेटी में जाने से इनकार किया लेकिन रघु रमैया ने उन्हें याचिका समिति का अध्यक्ष बना दिया । चंद्रशेखर जी ने रघु रमैया से कहा कि तय करने से पहले जरा सोच लीजिये। रघु रमैया ने कहा की सोच लिया।

कुछ समय बाद , समिति के सामने एक याचिका आयी, उस सिलसिले में दो मंत्रालयों से जानकारी माँगी गयी। विषय संवेदनशील था। लेकिन मंत्रालय द्वारा जानबूझकर जानकारी रोकी जा रही थी। जिसके चलते समिति की कई मीटिंगें स्थगित करनी पड़ी। एक दिन जब अफसरों ने कहा कि बार बार पत्र के बावजूद मंत्रालय द्वारा सूचना नहीं दी जा रही है। तब चंद्रशेखर ने अभूतपूर्व कदम उठाया उन्होंने अपने दल की सरकार के अपने मंत्रालय को को एक पत्र भिजवाया कि यदि यदि आज 2:00 बजे तक आपके मंत्रालय से उत्तर नहीं मिला तो समिति राज्यसभा को रिपोर्ट कर देगी यह मंत्रालय समिति से सहयोग नहीं कर रहे हैं। इसका असर हुआ 1:30 बजे ही पहले मेरे दो मित्र रघुनाथ रेड्डी और सफी कुरेशी आए, पूछने लगे कि तुमने क्या कर दिया। वह जानकारी इन्हीं दोनों के मंत्रालय से संबंधित थी मंत्रालयों को यह समझ आ गया कि समिति को भ्रमित नहीं किया जा सकता टाला नहीं जा सकता है ।

गाथा – (3)

बात तबकि है जब केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी जी प्रधानमंत्री और लालकृष्ण आडवाणी जी उप-प्रधानमंत्री और गृहमंत्री थे। चंद्रशेखर जी अपने तेवरों से इस सरकार को कई मौकों पर असहज कर रहे थे। उनके प्रश्नों और तर्कों से गृह मंत्री जी खास तौर पर असहज हो रहे थे।
एक दिन संसद चल रही थी। चंद्रशेखर जी के किसी आदमी ने उनको संसद में यह सूचना पहुंचाई कि भोंडसी आश्रम के मुख्य मार्ग को BSF ने अवरुद्ध कर दिया है। किसी को आने जाने नहीं दिया जा रहा है।
इतना सुनते ही चंद्रशेखर जी अपने स्थान से उठे और बेहद गुस्से में सीधे प्रधानमंत्री अटल जी के कक्ष में पहुंचे और कहा – गुरुदेव! जहाँ तक मैं आपको जानता हूँ आप ऐसे पीठ पीछे वाली हरकत नहीं कर सकते और मैं यह भी जानता हूँ कि इस सब के पीछे कौन है। मैं आपको यह बताने आया हूँ कि मैं भोंडसी जा रहा हूँ आप उनसे कह दें कि मुझे रोक सकते हैं तो रोक लें।

अटल जी चंद्रशेखर जी को रोकते रह गए कि अरे! चंद्रशेखर जी एक मिनट रुकिये तो, सुनिये तो लेकिन चंद्रशेखर जी अपने तमतमाये चेहरे के साथ उनके कक्ष से निकल चुके थे।

चंद्रशेखर जी ने अपने ड्राइवर से सीधे भोंडसी चलने को कहा। उनकी गाड़ी अभी संसद भवन से निकल दिल्ली की सीमा छोड़ी भी न थी कि तभी फिर से उनके पास खबर आयी की BSF ने अपनी नाकेबंदी हटा ली है।

गाथा -(4)

चंद्रशेखर जी 1962 में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर राज्यसभा के लिए चुने गए थे। उन दिनों प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के राज्यसभा में नेता बाबू गंगा शरण सिंह थे। जिन्हें लोग गंगा बाबू कहा करते थे।राज्यसभा में कम्युनिस्ट पार्टी के एक कद्दावर नेता थे- भूपेश गुप्त। बहुत ही धाकड़ नेता थे, विद्वता में भी बेजोड़। कोई उनसे भिड़ने का साहस नहीं करता था। भूपेश गुप्ता जी रोज प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का नाम लेकर कोई न कोई आक्षेप करते थे। सोशलिस्ट पार्टी को प्रतिक्रियावादी कहना उनके लिए सामान्य बात थी। एक रोज चन्द्रशेखर जी ने गंगा बाबू से कहा कि यह आदमी रोज आरोप लगा रहा है आप जवाब क्यों नहीं देते? गंगा बाबू ने कहा कि बोलना मत नहीं तो और गाली देगा। बहुत खतरनाक आदमी है। एक दिन भूपेश गुप्त कुछ बोल रहे थे तो उनकी टिप्पणी चंद्रशेखर जी को बर्दाश्त नहीं हुई। सदन में ही भूपेश गुप्त की चंद्र शेखर जी से झड़प हो गई। भूपेश गुप्त ने कहा कि यु आर वर्स्ट दैन डकैट्स ऑफ भिंड -मुरैना। (आप भिंड और मुरैना के डकैतों से भी गए गुजरे हैं)। चंद्रशेखर जी कहा मानने वाले थे उन्होंने जवाब दिया कि आप 1942 के आंदोलन के गद्दार हैं। इतना सुनना था कि भूपेश गुप्त फट पड़े। जिस सदन में बड़े-बड़े उनके सामने बोलने से कतराते थे, नेहरू जी कतराते थे वहाँ एक नया लड़का ऐसे जवाब दे दे। काफी बहस हुई । बाद में दोनों के स्टेटमेंट सदन की कार्यवाही से निकाल दिए गए। उस दिन से भूपेश गुप्ता ने सीधे आरोप लगाने बंद कर दिए। परोक्ष, इशारों से आरोप लगाते थे। बात आई गई हो गई। कुछ दिन बाद एक दिन तारकेश्वरी सिन्हा का वित्त मंत्रालय पूरक बजट पेश कर रहा था। मैडम अल्वा अध्यक्षता कर रही थी। चंद्रशेखर जी ने उनसे बोलने का मौका मांगा। मौका मिला। पहले तो चंद्रशेखर जी ने फाइनेंस बिल की साधारण आलोचना की फिर उन्होंने बोला- मैडम! ट्राटस्की ने स्टालिन की जीवनी लिखी उसने उसकी भूमिका में लिखा है कि- ए राइटर इज ए ग्रेटर दैन आ ओरेटर, ए राइटर कैन प्रोड्यूस सो मेनी ओरेटर्स बट इट वाज अ सियर फैक्ट ऑफ हिस्ट्री दैट स्टॅलिन हू वाज नाइदर ए राइटर नार एन ओरेटर, ओनली ए कंस्पिरेटर, चेंज दी कोर्स ऑफ हिस्ट्री। उन्होंने आगे कहा- मैडम, डिप्टी स्पीकर दी ऑनरेबल डिप्टी मिनिस्टर शुड रिमेंबर दैट दीज कंस्पिरेटोरिअल संस ऑफ स्टालिन आर एक्टिव इन एवरी पार्ट ऑफ द इमेन इन आवर ओन कंट्री। अगर सरकार ने सबक नहीं सीखा तो गरीब लोग यहाँ भी पूरी राज्य-व्यवस्था के खिलाफ उठ खड़े होंगे। इस पर सब लोगों ने सदन की मेज थपथपाई। भूपेश गुप्ता ने गंगा बाबू को बधाई दी। उन्होंने कहा- मैडम, आई कॉन्ग्रोचुलेट गंगाशरण सिंह फॉर हैविंग सच ए ब्रिलियंट फालोवर!

गाथा -(5)

प्रतापगढ़ में प्रजा सोसलिस्ट पार्टी का कैम्प लगा हुआ था, उसमें डॉ लोहिया भाषण कर रहे थे। वे राजनीति, नेता और जनता की भूमिका और संबंध पर बोल रहे थे। उन्होंने तर्क दिया कि लड़के को अगर तैराकी सिखानी है तो उसे पानी में छोड़ो। अगर हरदम हाथ पकड़े रहोगे तो कभी तैरना नहीं सीखेगा। जब तैरने में दो घूंट पानी पिएगा तो सीख जाएगा, इसलिए आपको खतरा मोल लेना पड़ेगा इसके बाद उन्होंने कहा कि सवाल पूछिए। चंद्रशेखर जी ने कहा- लोहिया जी एक संदेह है मेरे मन में।आपने तैराकी के सिलसिले में तीन बिंदु बताएं। एक चौथा बिंदु भी है उसकी चर्चा आपने कहीं नहीं की। उन्होंने पूछा कि वह क्या है? चंद्रशेखर जी ने बताया एक है तैराकी सीखने वाला, दूसरा सिखाने वाला, तीसरा है पानी, और चौथा बिंदु है ‘नेचर ऑफ वाटर’ जिसकी चर्चा आपने नहीं की। अगर पानी की धारा तेज हो और उसमें लड़के को छोड़ दीजिए तो वह बह जाएगा। मान लीजिए, ठहरा हुआ पानी हो और उसमें मगरमच्छ हो तो लड़के को निकल जाएंगे। आज हिंदुस्तान की राजनीति में बड़े-बड़े मगरमच्छ है। इस पर लोहिया निरुत्तर हो गए।

गाथा -(6)

1990 में जब चंद्रशेखर जी की सरकार बनी तो मनमोहन सिंह जी को उन्होंने अपनी सरकार का आर्थिक सलाहकार नियुक्त किया। जिन्हें अपनी सरकार गिरने से पहले ही चंद्रशेखर जी ने विश्व विद्यालय अनुदान आयोग में नियुक्त कर दिया। वही मनमोहन सिंह नरसिंह राव जी की सरकार में वित्त मंत्री बने। मनमोहन सिंह जी ने जब उदारीकरण का प्रस्ताव संसद में प्रस्तुत किया तो चंद्रशेखर जी ने उनका मुखर विरोध किया। उन्होंने मनमोहन सिंह जी की खूब मलामत की। सत्तारूढ़ पार्टी की ओर से कहा गया कि – चंद्रशेखर जी मत भूलिए कि मनमोहन सिंह जी को आप ही लेकर आये थे।

चंद्रशेखर जी ने जवाब दिया- हां, मनमोहन जी को मैं ही लेकर आया था लेकिन जिस चाकू को मैं सब्जी काटने के लिए लाया था, आप उससे ऑपरेशन करने लगे। ऐसा तो मैंने नहीं कहा था।

 

चंद्रशेखर जी के जीवन यात्रा के कुछ महत्वपूर्ण पड़ाव
■ 17 अप्रैल 1927 को बलिया के एक सीमांत किसान सदानंद सिंह के घर जन्म।

■ 1945 में श्रीमती द्विजा देवी से विवाह।

■ 1949 में बलिया के प्रतिष्ठित सतीश चंद्र कॉलेज से स्नातक की उपाधि।

■ 1951 में इलाहाबाद विश्व विद्यालय से राजनीति शास्त्र में परास्नातक की उपाधि।

■ 1951 में आचार्य नरेंद्रदेव के आवाहन पर अपना शोध कार्य छोड़, बलिया जिला सोशलिस्ट पार्टी के मंत्री का कार्य संभाला।

■ 1955 में प्रदेश सोशलिस्ट पार्टी के महामंत्री बने।

■ 1962 में प्रज्ञा सोशलिस्ट पार्टी की ओर से राज्यसभा के लिए चुने गए।

■ 1964 में अशोक मेहता के रचनात्मक विपक्ष का समर्थन करने के कारण पार्टी से निष्कासन के बाद कांग्रेस में शामिल हुए।

■ 1967 में कांग्रेस संसदीय दल के मंत्री चुने गए।

■ 1969 में और उसके बाद भी लगातार कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य रहे।

■1969 में ही कांग्रेस सिंडीकेट के विरुद्ध व्यापारिक एकाधिकार के विरुद्ध रामधन, कृष्णकांत आदि साथियों के साथ संघर्ष का बिगुल फूंका। समाचार पत्रों द्वारा श्री चंद्रशेखर को ‘युवातुर्क’ की उपाधि।

■ 1971 के चुनावों में इंदिरा गाँधी की ओर से जबरदस्त चुनाव प्रचार, चुनावों में इंदिरा गाँधी की अभूतपूर्व सफलता, श्री चंद्रशेखर द्वारा मंत्री पद का अस्वीकार।

■1972 इंदिरा जी के द्वारा चुनावी वादों को पूरा न किये जाने से कुछ अनबन, इंदिरा जी व हाई कमान विरोध के बावजूद शिमला में कांग्रेस चुनाव समिति के सदस्य के रूप में चुने गए।

■ जून 25,1975 को आपातकाल में कांग्रेस का महासचिव होने के बावजूद गिरफ्तार, कारण जयप्रकाश नारायण का समर्थक होने का शक। 19 महीने जेल में।

■ 1977 में पहली बार बलिया की लोकसभा सीट से चुने गए। मोरारजी देसाई की जनता सरकार में जेपी के आग्रह के बावजूद मंत्री पद का अस्वीकार। किंतु जेपी के आदेश पर नवगठित जनता पार्टी के अध्यक्ष का पद स्वीकार किया। तभी से उनके लिए ‘अध्यक्षजी’ का संबोधन प्रचलित।

■ 1983 में भारत की 4260 किलोमीटर की पदयात्रा। दक्षिण भारत और पश्चिम भारत से भारत यात्रा कार्यक्रम को भरपूर समर्थन।

■ 1990 नवंबर 10, को भारत के प्रथम समाजवादी प्रधानमंत्री बने। प्रधानमंत्री पर अल्पावधि के कार्यकाल में कई मोर्चों पर महत्वपूर्ण फैसले और पहल। मसलन- भारत की आंतरिक अशांति, अयोध्या विवाद, कश्मीर समस्या, पंजाब समस्या 1991 का तेल संकट।

■ 11 मार्च 1991 को त्यागपत्र किंतु राष्ट्रपति के अनुरोध पर 20 जून 1991 तक प्रधानमंत्री पद पर रहे।

■ 1992 संसद में और संसद के बाहर भी उदारीकरण की नीतियों और डंकल प्रस्ताव का जबरदस्त विरोध।

■ 12 दिसबंर 1995 को सर्वश्रेष्ठ सांसद का पुरस्कार।

■ 2000 में पाँच पूर्व प्रधानमंत्रियों के साथ मिल उदारीकरण की नीतियों की समीक्षा का प्रयास।

■ 2004 के चुनावों में अंतिम बार बलिया के लोकसभा सीट से निर्वाचन, 1977 से लगातार (1984 को छोड़कर) सांसद रहे।

■ 8 जुलाई 2007 को बलिया के सांसद के पद पर रहते हुए निधन।
इस तरह से 17 अप्रैल 1927 से बलिया के इब्राहिम पट्टी से शुरू हुई उनकी यात्रा 8 जुलाई को 2007 को एक महत्वपूर्ण विराम लेती है।

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