December 16, 2019

गांव की सामुहिकता विलुप्त हो रही है

डाॅ अभय सागर मिंज

परिवर्तन एक सतत प्रक्रिया है और यह हमेशा से इस जीवन का सत्य और तथ्य है। जब सारे विश्व में पश्चिमी जीवन का प्रभाव दिखता है तो आदिवासी समाज भी इस से अछूता नहीं है। गांव में हुए परिवर्तन पर कुछ विचार साझा करने में सालों पहले से अंतर्मन में जो द्वन्द था वो बाहर आ रहा है।

आज भी जब यदा कदा गांव जाता हूं तो सोचता हूं कि बीते पैंतीस सालों में क्या बदला। सुदूर क्षेत्र में पहाड़ों से घिरे मेरे गांव का नाम चिरगांव है जो गुमला जिले के रायडीह प्रखंड के अंतर्गत आता है। आज भी उन्हीं पगडंडियों से होकर गुजरना पड़ता है जो पहाड़ों के बीच से गांव तक जाती है। बरसात में यह दुर्गम हो जाती है। आज भी खेती ही प्रमुख रूप से जीविका का साधन है और हल-बैल से ही जुताई होती है। बिजली सड़क और अन्य मूलभूत सुविधा से वंचित इस ग्राम में और क्या परिवर्तन आया है,बताना थोड़ा कठिन है।

जब छोटा था तो गांव बिलकुल अलग था। आबोहवा, जंगल-पहाड,़ खेत-खलिहान में समय व्यतीत करना पहले भी अत्यंत प्रिय था और आज भी है। किंतु आज जब इन्हीं जंगल, पहाड़, खेत, खलिहान के बीच जाता हूँ तो सूनापन नजर आता है। अनेक प्रकार के विषम परिवर्तन देखने तो मिल रहे हैं। मन बड़ा कचोटता है। आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों की भाँति हमारे गाँव से भी अत्यधिक पलायन हुआ है। खास कर युवाओ में पलायन है। अधकचरी शिक्षा युवाओं को ना तो सही नौकरी दिला सकी और ना ही हल की मूठ पकड़ने लायक रहने दिया। किसी प्रकार मैट्रिक की परीक्षा देने के बाद वे नौकरी की तलाश में पलायन कर जाते हैं। अनेक दिल्ली, मुंबई, उत्तराखंड, कोलकाता, असम इत्यादि में दैनिक मजदूरी पर कार्य कर रहे हैं।

आदिवासी महिलाएं और बच्चियां आज दिल्ली और बम्बई में घरेलू कामगार हैं। आज भी जब गांव जाता हूं तो गांव में नए शिशुओं को और उनके अभावग्रस्त जीवन को देख कर मन व्यथित हो जाता है। पलायन किए पुरुष वापस जब कुछ समय के लिए आते हैं तभी इन बच्चों को पिता का सानिध्य प्राप्त होता है। उनके द्वारा घरेलू खर्च के लिए जो भेजा जाता है वह भी नियमित नहीं होता। अनेक लोगों जिनके साथ मैं खेला और बड़ा हुआ, से बातचीत का अवसर प्राप्त हुआ। सबकी कहानी एक-सी है।

पलायन में भी कम विषमताएं नहीं हैं किंतु वो कहते हैं कि अब वे अभ्यस्त हो गए हैं। वार्षिक आय का पता लगाया तो मालूम हुआ कि कुछ बचता नहीं है। फिर ऐसा जीवन क्यों ? माय माटी से दूरी कैसी। बच्चों के भविष्य के विषय में पूछने पर कोई ठोस प्रतिक्रिया नहीं मिलती है। ग्रामीण क्षेत्रों में एक नयी अवधारण विकसित हो रही है। एकल माता परिवार। अनेक महिलाओं से बात करने पर पता चला कि जीवन कठिन से कठिनतम होता जा रहा है। पति और पिता के अनुपस्थित रहने से परिवार का पूरा भार महिलाओं पर आ जाता है और इसे निभाना बहुत चुनौतीपूर्ण है। आज स्थिति यह है कि गांव में जो सामूहिक धान रोपनी होती थी, वह भी गायब होती जा रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह मात्र कृषि की प्रक्रिया नहीं है। इसके अनेक सामाजिक, आर्थिक आयाम हैं। इस प्रकार के वार्षिक क्रियाकलाप सामाजिक बंधन को मजबूती प्रदान करते हैं। सबका साथ, सबका विकास का इस से अच्छा उदाहरण क्या हो सकता है। सभी परिवार किसी एक परिवार के रोपनी में शामिल होते हैं। पलायन की वजह से यह प्रक्रिया पूरी तरह से विलुप्त होने के कगार पर है। आदिवासी क्षेत्रों में इस सामूहिक रोपनी के बाद संध्याकाल में सामूहिक भोज का आयोजन होता था, जो अब नहीं होता।

इस सामूहिक भोजन का स्थान अब पैसों ने ले लिया है। अब लोगों को जो रोपनी का कार्य करते हैं उन्हें दिहाड़ी मिलती है जिसे स्थानीय भाषा में बनी कहते हैं। परिस्थिति अब इतनी खराब हो गयी है कि कृषि के समय मजदूर भी नहीं मिलते। आदिवासी समाज को नशा पान करने वाले समूह का पर्यायवाची मान लिया जाता है। यह दुखद है और अगर वर्तमान स्थिति को देखें तो मेरे गाँव और आसपास के गांव में नशाखोरी अत्यधिक है। सबसे चिंतनीय बात तो यह है कि दस वर्ष के बच्चे भी इसकी गिरफ्त में हैं। यह भयावह स्थिति है। नशापान इन्हें शिक्षा और मौलिकता से दूर छद्दम भौतिकवाद की ओर तेजी से खींच रहा है। गाँव में बिजली नहीं है, पर मोबाइल फोन है। सौर्य ऊर्जा से कुछ घरों में बत्तियां जलती हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य में कोई विशेष सुधार नहीं हुआ है। आज भी उच्च शिक्षा के लिए लोगों को गुमला आना पड़ता है। उच्च विद्यालय भी गांव से आठ किलोमीटर दूर है। हाल के दशकों में कुछ विद्यार्थी स्नातक और स्नातकोत्तर तक पढ़े हैं। स्वास्थ्य समस्या बहुत ही विकराल है। मलेरिया और दस्त से मृत्यु-दर बढ़ा ही है। निकटतम स्वासस्थ केंद्र गांव से चार किलोमेटर की दूरी पर है। अनेक प्रकार की योजनाएं होते हुए भी धरातल पर स्थिति दुखद है। आदिवासी क्षेेत्रों में अपनी पारम्परिक न्याय व्यवस्था है जो आज भी मान्य है। सरकार द्वारा जबरदस्ती थोपी गयी पाँचवी अनुसूची क्षेेत्रों में पंचायत चुनाव ने पारंपरिक न्याय व्यवस्था पर प्रहार किया है। घर-घर से लोग चुनाव में खड़े हो रहे हैं। अब पूरा खेल ही बदल गया है। जो गांव सामुहिकता के लिए जाना जाता था और ग्राम सभा के तर्ज पर चलता था, अब वह बिकाऊ मुख्य धारा की राजनीति के ढर्रे पर चल रहा है।

पंचायत चुनाव के दौरान गांव जाने का मौका लगा। इतना खंडित गांव मैंने कभी नहीं देखा था। एक ही गाँव के एक ही घर से भाभी-देवर एक ही पद के उम्मीदवार थे। घर में छद्दम राजनीति चल रही थी। बोलचाल बंद थी। गांव अनेक खेमों में बंटा था और बड़े नेताओं से सांठगांठ चल रही थी। शराब और कूटनीति का दौर चला हुआ था। चुनाव के दौरान हिंसा तक देखने को मिली। गाँव में ही गाँव में लोग बिक रहे हैं। यह बहुत बड़ी चोट है।

कुछ लोग पारम्परिक खेती की ओर लौट रहे हैं। पर गांवों में जो समूहिकता थी वो खत्म हो रही है। छोटे और बंद समूह में व्यक्तिवाद मजबूत होती जा रही है। अब सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यों के लिए भी लोग सरकार की ओर देखते हैं। अनेक ग्रामीण विकास के कार्य जिन्हें मैंने भी बाल्यवस्था में सामूहिक सहयोग से किया था, वह अब पूर्णत समाप्त हो गया है। पारम्परिक रूप से मछली मारना शिकार पर निकलना बंद है।
सहायक प्राध्यापक, नृशास्त्र विभाग, रांची कालेज, रांची।

About The Author

Related posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *