July 19, 2019

शिक्षा की गुणवत्ता में यूपी फिसड्डी..लेकिन नहीं बनता चुनावी मुद्दा:रूक्मिणी बनर्जी

11 वीं एनुअल स्टेटस आॅफ एजुकेशन रिपोर्ट (ग्रामीण) हुआ जारी

संतोष कुमार सिंह

नयी दिल्ली: देश में प्राथमिक स्कूलों में नामांकन दर साल दर साल बढ़ रहा है, लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता हमेशा सवालों के घेरे में रही है.वर्ष 2016 में बच्चों के दाखिले का आंकड़ा बढ़कर 96.9 फीसदी हो गया है।  विशेषज्ञ समझ नहीं पा रहे हैं कि जो सरकारें इनरौलमेंट को बढ़ाने पर इतना जोर देती हैं, वो शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार की दिशा में क्यों सफल नहीं हो पा रही है। ‘असर’ यानी एनुअल स्टेटस आॅफ एजुकेशन रिपोर्ट ग्रामीण द्वारा  जारी 2016 के रिपोर्ट के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में पढ़ने की क्षमता काफी सोचनीय है. ‘असर’ द्वारा प्रथम के सहयोग से वर्ष 2016 में देश के 589 ग्रामीण जिलों में सर्वे किया गया। इस दौरान 17,473 गांवों के 350.232 घरों में 3—16 वर्ष के आयु वर्ग के 562,305 बच्चों के बीच से सर्वे किया गया। नतीजे संतोष जनक कदापी नहीं है।

तीसरी कक्षा के आधे से ज्यादा बच्चे नहीं पढ़ सकते पहली कक्षा की पुस्तक   
पिछले कुछ सालों में बच्चों के पढ़ने की क्षमता बढ़ी है, लेेकिन कक्षा तीन के 2014 में जहां 40 फीसदी बच्चे कक्षा एक के पाठ्यक्रम पढ सकते थे, वह संख्या 2016 में 42 फीसदी हो गयी है. अक्सर ऐसी खबरें आती है कि बच्चों में पढ़ने की क्षमता का उचित विकास नहीं हो रहा है. मौजूदा समय में 6-14 आयु वर्ग में नामांकन दर 96.9 फीसदी है. माध्यमिक शिक्षा की बात करें तो 15-16 आयु वर्ग के लड़के और लड़कियों के नामांकन दर में सुधार हुआ है. राष्ट्रीय स्तर पर वर्ष 2014 में यह अनुपात 83.4 फीसदी था, जो 2016 में बढ़कर 84.7 फीसदी हाे गया.
ड्राप आउट की समस्या जस का तस
सरकार की योजनाओं के बावजूद ड्राप आउट रेट में कमी नहीं आयी है. अगर माध्यमिक स्तर पर लड़कियों के ड्राप आउट रेट की बात करें तो 11-14 आयु वर्ग में यह संख्या 8 फीसदी से अधिक है. इस मामले में राजस्थान और उत्तर प्रदेश काफी अागे हैं.
निजी स्कूलों के प्रति बढ़ रहा है आकर्षण
देश भर में समान शिक्षा प्रणाली अपनाने की मांग भले ही उठ रही हो लेकिन निजी स्कूलों के प्रति ग्रामीण इलाकों में आकर्षण बढ़ा है। यानी ग्रामीण परिवार भी चाहता है कि उसका बच्चा निजी स्कूलों में पढ़े। राष्ट्रीय स्तर पर 6-14 आयु वर्ग के 30.5 फीसदी बच्चे निजी स्कूलों में नामांकन लेते हैं. लेकिन अगर राज्यों के आंकड़ों पर गौर करें तो बिहार में 12.9 फीसदी, झारखंड में 17.4 फीसदी, आंध्र प्रदेश में 34.2 फीसदी, केरल में 54.8 फीसदी, उत्तर प्रदेश में 52.1 फीसदी और पश्चिम बंगाल में 9.3 फीसदी बच्चे निजी स्कूलों में दाखिला लेते हैं. यानि की सबसे शिक्षित केरल में निजी स्कूलों में दाखिला लेने वाले बच्चों की संख्या सबसे अधिक है.

शिक्षण स्तर के मामले में झारखंड से अागे हैं बिहार
असर रिपोर्ट के अनुसार राष्ट्रीय स्तर पर कक्षा तीन के 25.1 फीसदी बच्चे कक्षा दो का पाठ पढ़ने में सक्षम थे. इस मामले में बिहार राष्ट्रीय स्तर से पीछे है. बिहार में इस वर्ग के 20.7 फीसदी, झारखंड के 16.4 फीसदी बच्चे कक्षा दो का पाठ पढ़ने में सफल रहे. केरल में यह संख्या 45.5 फीसदी, महाराष्ट्र में 40.7 फीसदी, ओडिशा में 35.4 फीसदी है. बिहार और झारखंड के आगे पश्चिम बंगाल और उत्तराखंड हैं. अगर कक्षा 8 के स्तर पर बात करें तो राष्ट्रीय स्तर पर 73 फीसदी बच्चे कक्षा दो स्तर के पाठ्यक्रम पढ़ने में सक्षम थे, लेकिन इस मामले में बिहार के छात्रों की संख्या 75.1 फीसदी, झारखंड में 67.8 फीसदी, केरल में 85.3 फीसदी है.
गणित में आगे हैं बिहार के छात्र
अगर गणित की बात करें तो राष्ट्रीय स्तर पर कक्षा 8 के महज 43.2 फीसदी बच्चे ही भाग करने में सक्षम पाये गये. जबकि बिहार में यह संख्या 62.3 फीसदी, झारखंड में 42.7 फीसदी, केरल में 53 फीसदी, गुजरात में 65.4 फीसदी अौर उत्तर प्रदेश में 37.4 फीसदी रही. यानि की गणित के मामले में बिहार के छात्र केरल के छात्रों से बेहतर हैं.
मूलभूत सुविधाओं में आयी है बेहतरी
स्कूलों में पेयजल और शौचालयों की उपलब्धता की बात करें तो राष्ट्रीय स्तर पर 2016 में 74.1 फीसदी स्कूलों में पेयजल की सुविधा मौजूद थी. बिहार के 89.5 फीसदी, झारखंड के 81.5 फीसदी, केरल के 80.5 फीसदी, उत्तर प्रदेश के 82 फीसदी स्कूलों में पेयजल की सुविधा मौजूद थी. अगर स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालय सुविधा की बात करें तो 2016 में राष्ट्रीय स्तर पर 61.9 फीसदी स्कूलों में इसकी उपलब्धता थी. वहीं बिहार में 60.8 फीसदी, झारखंड में 61.4 फीसदी, केरल में 78.8 फीसदी, उत्तर प्रदेश में 51.5 फीसदी और पश्चिम बंगाल में 64.3 फीसदी स्कूलों में यह सुविधा थी. आंकड़ों पर गौर करें तो स्कूलों में लड़कियों को शौचालय मुहैया कराने में बिहार से अच्छा प्रदर्शन झारखंड का है.

कंप्यूटर शिक्षा के मामले में बिहार काफी पीछे
असर की रिपोर्ट के अनुसार राष्ट्रीय स्तर पर 2016 में 20 फीसदी स्कूलों में बच्चों के लिए कंप्यूटर की सुविधा उपलब्ध थी. लेकिन बिहार में यह संख्या 7.1 फीसदी, झारखंड में 4.3 फीसदी, केरल में 89 फीसदी, महाराष्ट्र में 55.1 फीसदी, कर्नाटक में 45 फीसदी, उत्तर प्रदेश में 2.7 फीसदी और पश्चिम बंगाल में 3.5 फीसदी स्कूलों में ही कंप्यूटर की सुविधा उपलब्ध है.
क्या कहते हैं विशेषज्ञ
प्रथम की निदेशक रूक्मिणी बनर्जी ने पंचायत खबर से बातचीत में कहा कि यह बात ठीक है कि बिहार के मुख्यमंत्री कहते हैं बिहार के रग—रग में गणित है. यदि ऐसा है तो भी तो वह रग ढ़ीला हो रहा है. जहां तक ​लर्निग के स्तर का सवाल है झारखंड की स्थिति बिहार से बेहतर है। और उसमें काफी सुधार है. यहां तक ओड़िसा,पश्चिम बंगाल आदि में भी सुधार है. जबकि उत्तर प्रदेश में बच्चों के अंदर लर्निग लेवल काफी निम्न है. उन्होने क​हा कि उत्तर प्रदेश में विधान सभा चुनाव हो रहा है लेकिन आश्चर्य है कि शिक्षा की स्थिति में सुधार किसी भी राज्य में कोई चुनावी मुद्दा नहीं बन पाता. रूक्मिणी बनर्जी ने कहा कि हम मान कर चलते हैं कि शिक्षा की व्यवस्था से माता—पिता का कोई लेना देना नहीं. यही कारण है कि इस पूरी प्रक्रिया में उन्हें भागीदार नहीं बनाया जाता.जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए। शिक्षण का पाठ्यक्रम साधारण हो। लक्ष्य ऐसे निर्धारित किये जायें जिन्हें पूरा किया जा सके। इस पूरी प्रक्रिया में माता—पिता को भागीदार बनाया जाए।

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एक दशक से भी ज्यादा से पत्रकारिता में सकिय। संसद से लेकर दूर दराज के गांवो तक के पत्रकारिता का अनुभव। ग्रामीण समाज व जनसरोकार से जुड़े विषयों पर पत्र पत्रिकाओं में लेखन। अब पंचायत खबर के जरिये आपके बीच।

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