June 02, 2020

परंपराओं से जुड़कर वापस आ सकती है गांव की खुशहाली

वेंकटेश नारायण सिंह
मेरा गांव हेमतपुर आरा शहर से 13 किमी की दूरी पर है। यह 1961 दिसंबर से पक्की सड़क से जुड़ा हुआ था लेकिन शहरीकरण से बचते हुए भारतीय संस्कृति को संजोए हुए था। गाँव की गलियां कच्ची थी तथा गाँव में शायद ही कोई चप्पल पहनता था। बरसात में पैरों में कीचड़ लगना तथा बच्चों को ठेस लगकर पैरों की अंगुलियों का फूटना आम बात थी। गांव में सामाजिक नियंत्रण बहुत ही मजबूत था जो अधिकांश बुराईयों को नियंत्रित कर लेती थी। खेती हमारी मुख्य पेशा थी तथा यह गाय बैलों पर आधारित थी। सभी लोग मिश्रित खेती करते थे। खरीफ में मक्का, ज्वार, अरहर तथा रबी में गेहूं एवं चना की मिश्रित खेती से सभी की आवश्यकताएं पूरी हो जाती थी। बैलगाड़ी से मवेशियों का गोबर खेतों में डाला जाता था जो उर्वरकों की आवश्यकता की पूर्ति करता था। खाने के लिए सभी के पास पर्याप्त अन्न थे। मोटे अनाज जिन्हें आज हम न्यूट्री सेरेल कहते हैं, पर्याप्त मात्रा में उपजते थे जिन्हें लोग चाव से खाते थे।

गांव के युवक पढ़ने में कम, कुश्ती में ज्यादा दिलचस्पी रखते थे। 60 के दशक में मेरे पूर्वजों में एक राष्ट्रीय स्तर के पहलवान भी पैदा हुए थे जिसका नाम नन्दकेश्वर सिंह था। उनके द्वारा शुरू किया गया अखाड़ा आज भी मेरे गांव का गौरव-चिन्ह माना जाता है। 60 के दशक में लोगों की आवश्यकता एक-दूसरे के सहारे पूरी होती थी। खाने बनाने के लिए आग दूसरों के घरों से मांग लाने की व्यवस्था थी जिससे सुबह-शाम एक दूसरे से मिलना जुलना हो जाता था तथा किसके घर पर क्या पक रहा है, पता चल जाता था। सांस्कृतिक आयोजनों में एक-दूसरे के घर से बर्तन, चादर एवं अन्य सामान लाकर उपयोग किया जाता था। सभी गांव वाले मिलकर भोजन बनाते थे, जिससे सबकी सहभागिता एवं भावनात्मक लगाव बना रहता था। सभी घरों के दरवाजे पर बच्चे शाम में लालटेन से पढ़ने जरूर बैठते थे जिससे शिक्षा का स्तर सामान्य बना रहता था। गांव में एक मध्य विद्यालय था जिसके सहायक शिक्षक महात्तम राय जी पर गांव के शिक्षा की पूरी जिम्मेवारी थी। वे स्कूल के साथ-साथ ट्यूशन भी पढ़ाया करते थे। कुछ लड़के पढ़कर उच्च शिक्षा तथा नौकरियों में निकल जाया करते थे बाकी खेती का काम करते थे। मैं उन्हीं में से एक रहा हूं जो उच्च शिक्षा प्राप्त कर सरकारी सेवा में हूं। गांव से मैं भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ हूँ।

ग्रामीण संस्कृतिक रीति-रिवाजों एवं पुरानी मान्यताओं में मुझे वैज्ञानिक आधार दिखता है। मुझे गांव जाने में प्रसन्नता महसूस होती है, इसलिए मैं यदा-कदा गांव जाने का अवसर ढूंढ़ ही लेता हूं। अपनी इसी आंतरिक शक्ति के सहारे मैंने अपने गांव में किसानों को आर्गेनिक खेती के लिए प्रोत्साहित किया है तथा अपने यादों में सुरक्षित बचपन की गाय-बैल आधारित मिश्रित खेती को वापस लाना चाहता हूँ। हमारे गांव में होली, दशहरा, छठ के अलावा फसल-कटाई से संबंधित त्योहार मकर संक्रांति एवं सतुआन बडी श्रद्धा से मनाया जाता है। मकर संक्रांति में गंगा स्नान के बाद गुड़ की जलेबी का स्वाद आज भी मेरे बच्चों को ललचाता है। मेरे यहां धान की खेती नहीं होती थी। मकर संक्रांति हेतु चुड़ा एवं गुड़ हमारे दखिन के रिश्तेदार भिजवा देते थे, बदले में हम उन्हें चना, अरहर का दाल उपहार स्वरूप भेज देते थे।
आज के गांव में बहुत बदलाव आया है। सामाजिक नियंत्रण कमजोर हुए है। कोई किसी की बात नहीं सुनता है। पहले गांवों में कुछ बुढ़े लोग गांजा पिया करते थे, आज अधिकांश नौजवान शराब पीता है। राज्य में नशाबंदी से सड़कों एवं शादी-समारोहों में हुड़दंग में कमी आई है लेकिन पीने वालों की संख्या में कमी नजर नहीं आ रही है। गांव में लगभग हर घर में कोई न कोई मिलिट्री, अर्धसैनिक बल की सेवा में है जो गांव की समृद्धि का मुख्य आधार है। मेरे बचपन के समय में किसी के पास साईकिल भी नहीं हुआ करती थी। मैं हाई स्कूल की शिक्षा लेते समय बड़ी मुश्किल से अपने लिए साइकिल जुगाड़ कर पाया था। आज गांव में 100 से ज्यादा मोटर साईकिल तथा 10 से ज्यादार चार चक्का की गाड़ियां है। सरकारी योजनाओं ने गांव के भौतिक स्वरूप को बदल दिया है। गांव का मिडिल स्कूल दो मंजिला हो गया है। सभी गलियां पक्की हो गयी है। सरकार द्वारा चलायी गयी ओडीएफ एवं स्वचछता मिशन की योजना से कुछ शौचालय तो बन गए, गांव के सड़कों के किनारे की गंदगी में कमी हुई, लेकिन ग्रामीणों में शौचालय के उपयोग की प्रवृति विकसित नहीं हो पाया है। लोग अब लुंगी गंजी कम, पैंट शर्ट पहने हुए ज्यादा नजर आते हैं। पहले से चली आ रही दशहरा पर नाटक की परंपरा समाप्त हो गई है, लेकिन इसी मौके पर अयोजित होने वाली दंगल प्रतियोगिता अभी भी जारी है, बल्कि इसके स्वरूप में विगत दिनों काफी विस्तार हुआ है। मेरे गांव में सोमवार एवं शुक्रवार को लगने वाला हाट तथा दिसंबर-जनवरी में लगने वाला पशुमेला अब बंद हो चुका है।

भोजपुर के किसी भी गांव की चर्चा मशहुर लिट्टी-चोखा एवं सत्तु के बिना अधूरी रहेगी। पहले घरों में कुछ विशेष आयोजनों पर ही लिट्टी-चोखा बनता था, आज यह सभी आयोजनों तथा कुछ परिवरों में प्रत्येक शनिवार को खाया जाने लगा है। सत्तु खाने की परंपरा समाप्त हो गई है लेकिन इसके पीने का प्रचलन बढ़ गया है। गांव में शांति बरकरार है। सुख के समय साथ रहने वाले लोग तो शहरों में भी मिल जाते हैं। लेकिन दुखः में साथ रहने वाले केवल गांव में ही मिलते है। गांव में अभी भी कोयल की कुक सुनाई देती है तथा कौए दिखाई पड़ते है। अच्छी बिजली की उपलब्धता ने ग्रामीण जीवन को आरामदेह बना दिया है।

हालांकि गांव में शिक्षा स्तर बहुत बुरी तरह गिरा है, कोई भी बच्चा कभी पढ़ता हुआ नहीं दिखता है। मुफ्त की इंटरनेट सेवा ने ग्रामीण व्यवस्था को चौपट कर दिया है। विडंबना यह भी है कि गांव के फुटबाॅल का मैदान अब खेत बन गया है, गांव में बच्चे न खेलते हैं और न पढ़ते हैं जिससे उनका स्वास्थ्य भी प्रभावित होता है। शादी समारोहों में गाया जाने वाला लोक गीत अब फिल्मी गानों की तर्ज पर फूहड़ तरीके से गाए जाने लगे हैं। उर्वरक एवं कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग ने हमारे अन्न को जहरीला बना दिया है। इतना ही नहीं खेती पर आधारित ग्रामीण व्यवस्था का जरूरी आयाम जाने वाले गांव से बैल एवं बैलगाड़ी गायब हो गई हैं। सभी लोग मिश्रित नस्ल की गाय पालते हैं। पहले दूध बेचना अपमानजनक समझा जाता था, अब गांव में ही सुधा डेयरी का कलेक्शन सेंटर खुल गया हैं। दुग्ध व्यवसाय का पुरा व्यवसायीकरण हुआ है जो पशुपालकों के हित में है।
लियोनेस कर्टिल ने ”हमारे गांवों को गोबर का ढ़ेर कहा है,” गांवों में पड़े इसी गोबर के ढ़ेर को अगर हम खेतों पर डालने की व्यवस्था कर सकें तो हमारे गांव जहरमुक्त अनाज पैदा करेंगे जिससे मानव स्वास्थ्य में सुधार होगा तथा लोग गांव की तरफ आकर्षित होंगे। इसी उद्देश्य से मैंने अपने गांव में आर्गेनिक खेती की शुरूआत की है तथा लोगों को प्रशिक्षित किया है। देश प्रदेश व गांव—गंवई के लोगों को जैविक खेती की ओर प्रेरित करने के लिए मैंने जैविक खेती पर एक पुस्तक भी लिखी है जिसका नाम ”जैविक खेती के नुस्खे” है। ग्रामीणों के जैविक उत्पाद अब स्थानीय रूप से मिलने भी लगे है। इससे गांव की समृद्धि वापस लायी जा सकती है।
संयुक्त निदेशक (रसायन) कम्पोस्ट एवं बायोगैस। पटना।

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