November 14, 2019

सरकार की बेरुखी से हजारों टन गेहूं बर्बाद

पूरे उत्तर भारत में दो दिन से आंधी और बारिश के कारण अनाज मंडियों में खुले में रखा गेहूं खराब होने के आसार बन गए हैं। इसकी बड़ी वजह यह है कि कटाई के बाद गेहूं मंडियों में तो पहुंच रहा है, लेकिन न तो अनाज मंडियों में गेहूं सुरक्षित रखने के इंतजाम हैं और ना ही यह गेहूं गोदामों तक पहुंचाया जा रहा है। दरअसल, देश में खाद्यान उत्पादन के मुकाबले गोदामों की क्षमता भी काफी कम है, जिस कारण यदि बारिश इसी तरह जारी रही तो गेहूं के खराब होने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता।

ऐसी ही हालात राजधानी दिल्ली से लगभग 100 किलोमीटर की दूरी पर स्थित होडल में बनी अनाज मंडी का है जहां दो दिन से गेहूं भीग रहा है। आम तौर पर मंडियों में ऐसी खरीद के समय खाद्यान्‍न को अस्‍थाई रूप से बड़े-बड़े टीन शेड के नीचे सुरक्षित रखने की व्‍यवस्‍था की जाती है, लेकिन होडल की इस अनाज मंडी में लगभग 130 आढ़ती हैं और यहां प्रतिदिन लगभग 3 से 4 लाख क्विंटल गेंहू की आवक हो रही है, लेकिन यहां मात्र दो शेड हैं, जहां बमुश्किल 6 आढ़ती ही अपना खरीदा हुआ गेहूं रख पाते हैं। इसलिए रोजाना खरीदा जा रहा गेहूं बाहर खुले में पड़ा है।

इस मंडी में औसतन 2 लाख क्विंटल गेहूं रोजाना आता है, लेकिन साल के इस समय यह संख्या दोगुनी हो जाती है, क्योंकि हरियाणा सरकार ने चुनाव से ठीक पहले एक फैसला लिया था कि गेहूं खरीद के वक्त आढ़ती सीधे किसानों को भुगतान कर सकते हैं, जबकि आसपास के राज्यों, जिनमें उत्तर प्रदेश भी शामिल है, में व्यवस्था है कि किसानों का भुगतान बैंकों के माध्यम से किया जा रहा है। किसान इसके लिए तैयार नहीं हैं, बल्कि चाहते हैं कि वे जब अनाज बेचें ते उन्हें हाथोंहाथ पैसा मिल जाए। होडल अनाज मंडी की मार्केट कमेटी के अधिकारी बताते हैं कि होडल की इस मंडी में लगभग 60 से 70 प्रतिशत तक गेहूं पड़ोसी राज्‍यों से आ रहा है। लेकिन इस गेहूं को सुरक्षित रखने के इंतजाम नहीं हैं। इसलिए गेहूं खराब हो रहा है।

यहां शेड बनाने और खाद्यान्न को सुरक्षित रखने की जिम्मेवारी मार्केट कमेटी की है। मार्केट कमेटी द्वारा मंडियों में होने वाली इस खरीद फ़रोख्‍त के एवज में कुल 4 प्रतिशत का राजस्‍व आढ़तियों से वसूलता है। जिसमें से 2 प्रतिशत हरियाणा ग्रामीण विकास निधि में जाता है और शेष 2 प्रतिशत हरियाणा राज्‍य कृषि विपणन बोर्ड द्वारा प्रबंधित किया जाता है। अकेले होडल मंडी ने वर्ष 2018-19 में कुल 8,32,68,728 रुपए का राजस्‍व एकत्र कर सरकार को दिया था। लेकिन विगत वित्‍त वर्ष में लगभग 10 लाख रुपए की निधि मंडी में विकास के लिए स्‍वीकृत की गई। मार्केट कमेटी के अधिकारी मानते हैं कि मंडी में सुविधाएं मुहैया करवाना उनके विभाग का काम है मगर मंडी में जल-भराव जैसी समस्‍याओं के लिए वे शहर की खराब सीवरेज व्‍यवस्‍था को दोषी मानते हैं।

यह स्थिति अकेले होडल अनाज मंडी की नहीं हैं। देश की ज्यादातर अनाज मंडियों में भी यही इंतजाम हैं। मोदी सरकार द्वारा किसानों की आमदनी दोगुनी करने के लिए बनाई गई कमेटी ने भी यह मुद्दा उठाया था। कमेटी ने अपनी रिपोर्ट के तीसरे अध्याय में पोस्ट प्रोडक्शन एग्री-लॉजिस्टिक में कहा है कि खाद्यान्न उत्पादन के बाद कई बड़ी चुनौतियां सामने आती हैं। जैसे कि किसानों के खेतों से मंडी तक उत्पादन पहुंचाना और फिर मंडी से गोदामों तक सुरक्षित पहुंचाना।

रिपोर्ट में कहा गया है कि 2016 तक भारत में वेयर हाउस की भंडारण क्षमता 126.96 मिलियन टन थी।जबकि नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एग्रीकल्चरल इकोनॉमिक्स एंड पॉलिसी रिसर्च का अनुमान है कि 2020-21 में खाद्यान्न की मांग 281 मिलियन टन हो जाएगा, इसमें से 179 मिलियन टन घरों और 102 मिलियन टन चारा, बीज और औद्योगिक इस्तेमाल के लिए जरूरत होगी। ऐसे में, लगभग 196 मिलियन टन क्षमता वाले भंडारण का इंतजाम करना होगा।

भंडारण का इंतजाम न होने के कारण देश ही दुनिया भर में खाद्यान्न और खाद्य वस्तुओं को भारी नुकसान हो सकता है। इसी कमेटी की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भंडारण का इंतजाम न होने से किसानों के उत्पादों की खरीदारी नहीं होती या किसान अपने उत्पादों को सुरक्षित स्थान पर नहीं रख पाते, जिसकारण औसतन हर साल लगभग 63 हजार करोड़ रुपए का नुकसान किसानों को झेलना पड़ता है।

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