परिवर्तन की बयार से रोशन हो रही है हजारों जिंदगियां

ऋतु जयसवाल

जानिए बिहार के सिवान जिले के गाँव नरेंद्रपुर के विषय में। कैसे संजीव जी ने इस गाँव को आर्थिक रूप से सशक्त किया है। इसी मॉडल को जानने और समझने के लिए  सिवान के नरेंद्रपुर गाँव में हमनें पूरा दिन बिताया। हिन्दू-मुसलमान और मंदिर-मस्जिद वाली राजनीति, भ्रष्टतंत्र, बेरोजगारी, अशिक्षा, अपराध वाली दुनिया से अलग भी एक संसार है हमारे बिहार में हीं। इस दुनिया को हम “परिवर्तन” के नाम से जानते हैं। मैं तो देख आई इसलिए सोंचा अपने फेसबुक परिवार को भी इसकी सैर कराई जाए।

चुनाव का समय है। सरकारी दफ्तर में पंचायत संबंधित काम कम ही हो रहे हैं। इसलिए यही समय है पंचायत के आर्थिक सशक्तिकरण के लिए अनुसंधान करने का, नई चीज़ें सीखने का और कुछ अलग मॉडल पंचायत में ला कर विशेष कर के महिलाओं को रोजगार देने का। इसी सिलसिले में भारत के प्रथम राष्ट्रपति पूजनीय राजेंद्र प्रसाद जी की जन्मस्थली जीरादेई से सटे गाँव नरेंद्रपुर जाना हुआ। जहां हमारी मुलाकात संजीव कुमार जी से हुई। अपने जीतोड़ मेहनत से इन्होंने जो भी कमाया, उसका एक बड़ा हिस्सा अपने गाँव में किये गए बहुत हीं असाधारण कार्य के लिए लगाया। सिवान शहर से तकरीबन 20 किलोमीटर दूर है पूजनीय राजेंद्र प्रसाद जी की जन्मस्थली जीरादेई गाँव। बस उसके बाद ही आया नरेंद्रपुर। इस गाँव में मुख्य सड़क पर ही एक बड़ा सा विश्वविद्यालय जैसा परिसर दिखा। गेट पर लिखा था “परिवर्तन”। अंदर जाने के बाद समझ आया इसके नाम का वास्तविक मतलब। गाँव की महिलाएं साइकल से बड़ी संख्या में प्रतिदिन आती हैं, यहाँ प्रशिक्षण के बाद अपने हस्तकला का जादू बिखेरती हैं, साड़ियां खुद से बनाती हैं, मूर्तियाँ बनाती हैं, कप प्लेट जैसी न जाने क्या क्या चीज़ें बनाती हैं। इनके द्वारा बनाई गई साड़ियाँ बहुत ही उम्दा गुणवत्ता और किसी भी तरह से आधुनिक ब्रांडेड साड़ियों से कम नहीं हैं। ये बाजार में अच्छे दाम पर बिकती हैं। उन पैसों से गाँव की इन सभी महिलाओं का घर चल रहा है, वो आर्थिक रूप से सशक्त हैं, उन्हें घरेलू हिंसा का शिकार नहीं होना पड़ता है। गाँव की महिलाओं को इससे ज्यादा और चाहिए क्या। ये महिलाएं समूह के माध्यम से समाज में फैली कुरीतियों के खिलाफ आवाज़ उठाती हैं, पीड़ितों को न्याय दिलाती हैं। और बहुत कुछ जिसे शब्दों में समेटना मुश्किल हो रहा है। खेल कूद में साइकलिंग की ऐसी अंतराष्ट्रीय स्तर की ट्रेनिंग दी जा रही है कि बिहार के 12 सदसिय अंडर 19 साइकल की टीम में 9 खिलाड़ी परिवर्तन से ही हैं। आंगनवाड़ी केंद्र भी सरकारी आंगनवाड़ी के तर्ज पर “बाल घर” के नाम से चलाया जाता है।  बालघर सरकारी आंगनवाड़ी के खर्चे से भी आधे खर्चे में चलता है और इसकी व्यवस्था आंगनवाड़ी वाले भ्रष्ट सरकारी तंत्र को शर्म से पानी पानी कर देने केलिए काफी है। गाँव के बच्चों केलिए लाइब्रेरी, जहाँ बहुत हीं छोटे बच्चे केलिए लेट कर पढ़ने की बेहद अलग तरह की व्यवस्था, कम्प्यूटर की शिक्षा, किसानों केलिए विशेषज्ञों के देख रेख में अलग व्यवस्था, ये सब देख कर अपने पंचायत को विकसित बनाने हेतु मेरा प्रतिबद्ध मन लालायित हो रहा था और अंदर ही अंदर प्रोत्साहित भी हो रही थी।

परिवर्तन की अपनी नाट्य मंडली है जो गाँव गाँव में जा कर सामाजिक चेतना को जगाने का काम करती है। ग्रुप के सदस्यों के साथ वक्त बिताना इतना अभुतपूर्व क्षण था की क्या बताऊँ। एक पल केलिए उनकी “गाँव चलो गाँव चलो” वाली गीत सुन कर भावुक हो गई और सोंचने लगी पता नहीं अपने पंचायत केलिए कभी ऐसा कुछ कर पाऊँगी या नहीं। जब तक गीत चल रहा था, मन में यही विचारों के भंवर उठ रहे थे कि अपने पंचायत की महिलाओं के हाथ में रोज़ का 100 रुपया ही सही, वो कैसे दिलाऊँ ताकि वो शोषण का शिकार न हो पाए। कैसे बच्चों को अच्छी शिक्षा दिला पाऊँ। कैसे बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था की जाए, किसानों को कैसे बेहतर आय हो। यही सब सोंचते सोंचते, संजीव कुमार जी को मन ही मन प्रणाम कर के उनसे मिल कर, राय विचार कर के, परिवर्तन की स्मृति चिन्ह उनके हाथों से प्राप्त करते हुए वहाँ से विदा लिया। रास्ते में आते आते अपने पंचायत सिंहवाहिनी की कुछ महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण को ले कर मन में कुछ विचार भी आ गए जिस पर हमनें काम शुरू कर दिया है। बहुत जल्द इस दिशा में आपके समक्ष नई उपलब्द्धि के साथ आऊँगी।

आगे तो बहुत लोग बढ़ते हैं पर अपनी जन्मभूमि की ओर लौट कर वहाँ के उत्थान केलिए काम करने की हिम्मत और नियत शायद ही किसी में होती है। संजीव जी के कार्यों से प्रेरणा ले कर आप सब भी अपने गाँव के उत्थान के लिए समय दें।

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