March 24, 2019

ग्राम स्वराज की बात आखिर आगे बढ़े तो कैसे?

कमलेश पांडे
महात्मा गांधी ने अपनी हत्या के एक दिन पहले अपनी डायरी में आजादी, स्वराज, पंचायत, देश को जाना कहां है और जाएगा किधर आदि जो बातें आदतन लिखी हैं, उससे भविष्य के भारत को लेकर उनकी भावना का पता चलता है। इसलिए इसे उनका अंतिम वसीयत कहा जाता है। विकास के तमाम दावों के बीच आज भी गांव की तस्वीर और बापू की छवि देखने के बाद जो सवाल हमारे दिल में कौंधते हैं, उससे यही महसूस होता है कि आखिरकार कैसे इस विषमता को दूर किया जा सकता है।
महात्मा गांधी ने तब कहा था कि भले ही हमारा देश आजाद हो गया है, लेकिन 7 लाख गांव आज भी गुलाम हैं। जब तक ग्रामीण जनता को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक आजादी नहीं मिलती, तबतक अनौपचारिक चुनावों का कोई भी महत्व नहीं रह जाता। कुछ यही वजह रही होगी कि तब भी उन्होंने कांग्रेस को भंग करने की वकालत करते हुए लोक सेवक संघ बनाने का सुझाव समकालीन सहयोगियों को दिया था। उन्होंने कहा था कि हर गांव में 5 लोगों की पंचायत बने, जो देश को आगे ले जाए। इसे ही उनकी ग्राम स्वराज की परिकल्पना करार दिया जाता है।
महात्मा गांधी यह भी कहते थे कि दिल्ली में बैठे 20 लोग पूरे देश की समझ तय नहीं कर सकते। इसलिए हर गांव को वह मजबूत और स्वावलंबी बनाने के पक्षधर थे। इसे समझने के लिए ब्रिटिश पार्लियामेंट के बारे में हिन्द स्वराज (1909) में की गई उनकी तल्ख टिप्पणियों और उसकी समसामयिक महत्ता व प्रासंगिकता को यदि रेखांकित किया जाए, तो यह समझते देर नहीं लगेगी कि भारतीय संसदीय व्यवस्था में समय के साथ पनपी विकृतियों की चेतावनी उन्होंने सांकेतिक तौर पर हिन्द स्वराज में दे दी थी, जिससे बचे जाने की जरूरत है।
ग्राम स्वराज के मद्देनजर आजादी के 40 साल बाद भारतीय संविधान में किये गए 73वें और 74वें संशोधन के मद्देनजर यह सवाल आज भी उठता है कि निर्वाचित पंचायतों का अस्तित्व क्या है, उनकी जरूरत क्या है और उपयोगिता क्या है? जब तत्कालीन कई दिग्गज राजनेता भी भारत की परंपरागत राजव्यवस्था की बहाली के पक्षधर थे, तब आज यह सवाल उठना और उठाना लाजिमी है कि मौजूदा भारतीय संविधान में ग्राम स्वराज की अवधारणा कहां खड़ी है? और सत्ता व शक्तियों के जिस विकेंद्रीकरण की बात बापू ने उठाई और बढ़ाई थी, वह कहां है?
यह ठीक है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 40 में यह राज्यों की जिम्मेदारी तय की गई है कि वह ग्राम पंचायत बनाएगा और उन्हें तीसरी सरकार के रूप में समुचित संसाधनों से लैस करेगा, ताकि स्थानीय सरकार की उनकी परिकल्पना को मजबूती मिले। क्योंकि 73वें संविधान संशोधन के वक्त तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने अपने भाषण में कहा था कि हम गांधी के ग्राम स्वराज की उस परिकल्पना को साकार करने के हिमायती हैं जिसे लेकर संविधान सभा में भी बहस हुई थी।
शायद इसलिए भी आज यह सवाल मौजूं है कि इस संविधान संशोधन के लगभग ढाई दशक बाद भी ग्राम स्वराज की अवधारणा कहां खड़ी है? क्या इसे आधे अधूरे मन से लागू किया जा रहा है? क्या जो जिला योजना समिति बनी है और उसे जो 29 विषय सौंपे गए हैं, उनपर ईमानदारी पूर्वक अमल किया जा रहा है? क्या राज्य सरकारें उनकी स्वायत्तता के लिए समुचित कानूनी प्रावधान करेंगी या फिर कर रही हैं?
सवाल यह भी है कि क्या केंद्रीय और राज्य सरकारों से इतर बनाई जाने वाली तीसरी स्थानीय सरकार में वह पावर निहित है जो केरल, पश्चिम बंगाल और जम्मू-कश्मीर के मार्फ़त एक नया आकार उनके ग्रामीण क्षेत्रों में ले रही हैं, या फिर शहरी क्षेत्रों के लिए झारखंड में जो नई व्यवस्था बनाई गई है। उससे भी बड़ा सवाल यह कि शेष भारतीय राज्य इस दिशा में आगे क्यों नहीं बढ़ पा रहे हैं? क्या उनके सत्तागत हित आम आदमी के हितों से बड़े हैं?
इस बात में कोई दो राय नहीं कि ग्राम अथवा नगर पंचायतों के चुनाव और उनकी मजबूती को कैसे व्यवहारिक रूप में ला सकते हैं, उसके सारे रास्ते बताए जा चुके हैं। बस, उसे समझने और उसपर चलने की जरूरत है। महात्मा गांधी भी कहा करते थे कि सच्चा लोकतंत्र केंद्र में बैठे हुए 20 लोगों से नहीं चलाया जा सकता है। इसलिए ग्राम पंचायतों के वास्ते शक्तियों के सुनियोजित विकेंद्रीकरण से ही सारी समस्याओं का समाधान संभव है। भारतीय शासन व्यवस्था में ग्राम पंचायतें उत्तर ध्रुव हैं तो संसद दक्षिणी ध्रुव। लिहाज़ा दोनों में समन्वय जरूरी है।
बदलते वक्त की दरकार है कि ग्राम पंचायतों अथवा नगर निकायों को सोचने का अधिकार, करने का अधिकार और निर्णय लेने का अधिकार सरीखे तीनों अधिकार अविलम्ब सौंपने होंगे। क्योंकि सामाजिक न्याय और आर्थिक विकास की योजना बनाने में वे तभी सफल होंगे। इसके अलावा, केंद्रीय योजनाओं को भी सफलता पूर्वक लागू करवा पाएंगे। इसलिए गांवों को योजना, अवसर और साधन देने में कोताही बरतना समग्र राष्ट्रीय विकास को बाधित करने जैसा है।
यह सही है कि मौजूदा निर्वाचित बॉडी जिसमें 11 से 17 लोग होते हैं, में से एक अध्यक्ष होता है और अन्य सदस्य की हैसियत से उसका सहयोग करते हैं, में यदि कुछ खामियां हैं तो उनमें सुधार का तरीका भी है। क्योंकि मुखिया या सरपंच को ही सम्पूर्ण पंचायत या ग्राम सभा समझ बैठने की जो परम्परा चली आ रही है, वह भी अनुचित है। इसलिए ग्राम सभा अर्थात आमलोगों को भी उनके समग्र हितों के प्रति जागरूक करना बेहद जरूरी है। इस लिहाज से वोटिंग पैटर्न बदलने की भी जरूरत है।इस नजरिए से सिविल सोसाइटी और राज्य चुनाव आयोग को भी सतर्क रहना होगा। पंचायतों को कार्य, कर्मी और कोष की भी व्यवस्था करनी होगी। इस वास्ते केंद्रीय और राज्य संवर्ग की तरह पंचायत संवर्ग भी बनाने की जरूरत है, जैसा कि केरल और पश्चिम बंगाल में किया गया है। वहां इसके लिए कोष और कैडर की अलग अलग व्यवस्था है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार है)

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