August 18, 2018

गाजीपुर में गाँव को काटती नदी

गंगा की गोद में उत्तर का मैदान फला-फूला है। इसका पानी यहां की जीवन रेखा है। लेकिन यही पानी गाजीपुर के कुछ गांवों के लिए अभिशाप बन गया है। इसमें गलती किसकी है? गंगा नदी की या फिर इंसान की। आखिर जीवनदायनी गंगा गाजीपुर के तकरीबन पचास गांवों के लिए पतन का सबब क्यों बन गई? प्रेमनाथ गुप्ता इस बारे में बहुत विस्तार से बताते है। वे गांव बचाओ आंदोलन समिति के संयोजक हैं। यह समिति संकटग्रस्त पचास गांवों को बचाने के लिए संघर्षरत है। प्रेमनाथ बताते है कि पहले सबकुछ ठीक था। गंगा की धारा हमारे लिए भी सुख और संपन्नता का प्रतीक थी। पर 1978 के बाद सब बदल गया। गंगा हमारे गांव को लीलने लगी। वे कहते है कि 1978 में गाजीपुर जिला मुख्यालय में गंगा पर एक पुल बना। इससे नदी के बहाव की दिशा बदल गई। इसके साथ ही शिवपुर समेरा समेत नदी के आसपास बसे गांवों का भाग्य भी बदल गया। हालांकि तब वहां के लोगों को इस बात का इल्म नहीं था कि भविष्य में गंगा उनके लिए परेशानी का कारण बन जाएगी। समय गुजरता गया और समस्या दिखने लगी। नदी ने गांव को कटाना शुरु कर दिया। पिछले दो-तीन दशक में हालात ये हो गयी हंै कि कुछ गांवों का तो अस्तित्व ही खत्म हो चुका हैं। और कुछ उसके कगार पर है। सैकड़ों लोग विस्थापन का दंश झेल रहे है। जो लोग संपन्न है वो तो अपने खेतों में अस्थाई निवास बनाकर रह रहे है। लेकिन जो गरीब हैं और जिनकी आजीविका का साधन खेतों में मजदूरी है उनकी स्थिति बहुत खराब है। कोई सड़क के किनारे प्लास्टिक डालकर रह रहा है तो कोई खुल आसमान के नीचे रहने के लिए मजबूर है। विस्थापितों के लिए जो राहत शिविर बनाए गए हैं उसकी स्थिति भी बहुत बेहतर नहीं है।

ganga

राहत के नाम पर विस्थापितों के साथ बस खिलवाड़ हो रहा हैं। इन लोगों का दर्द बांटने सियासत की आला कुर्सी पर बैठे लोग आते तो हंै लेकिन जमीन पर कोई कुछ करने के लिए तैयार नजर नहीं आता। आश्वासन बस जुबानी है। कोई 15 साल पहले गांव आंदोलन बचाओ समिति के लोगों ने 20 दिन का क्रमिक अनशन और पांच दिन का आमरण अनशन किया था। उस समय हर दल के नेता यहां पर आए थे। उसमें कांग्रेस, भाजपा, सपा और बसपा के कई बड़े नेता भी शामिल थे। उनमें से कुछ तो मौजूदा केंद्र और राज्य सरकार में मंत्री में भी है। हालांकि इस दिशा में किसी ने अभी तक कोई सार्थक प्रयास नहीं किया है। प्रेमनाथ गुप्ता कहते है कि पिछले 25 साल से हम लोग यह संघर्ष चला रहे है। संत्री से लेकर मंत्री तक हर जगह गुहार लगाई। सभी ने कहा समस्या का निराकण किया जाएगा। लेकिन वास्तव में अभी तक कुछ हुआ नहीं। राज्य सरकार का रवैया भी इस मसले पर बहुत उत्साहजनक नहीं है।

2012 में विधान सभा चुनाव के दौरान अखिलेश यादव गाजीपुर गए थे। उन्होंने वादा किया था कि नदी के कटान से गांव को बचाने के लिए पुख्ता इंतजाम किया जाएगा। 31 जुलाई 2012 को प्रदेश सरकार ने इस बाबत शासनादेश जारी किया। उसमें साफ तौर पर लिखा था कि किसी भी नदी के कटान से यदि कोई विस्थापित होता है तो उसे 250 वर्ग मी. जमीन दी जाएगी। इसके लिए राज्य सरकार ने जिला मुख्यालय को 2.14 करोड रूपया भी आवंटित किया। जमीन भी खरीद ली गई है लेकिन अभी तक किसी को दी नहीं गई है। इसकी वजह क्या है? यह अभी तक साफ नहीं हो पाया है। मसला बस इतना ही नहीं है। प्रभावित लोगों के आंकड़ों में भी हेरफेर किया गया है। प्रेमनाथ गुप्ता के मुताबिक सरकारी आंकड़ों के अनुसार विस्थापित परिवार की संख्या 558 हैं। उनका दावा है कि ये आंकड़े सही नहीं है। वास्तव में 1000 परिवार विस्थापित है। उनकी माने तो जो सरकारी आंकड़े है उसमें भी हेरफेर किया जा रहा है। खबर के मुताबिक 558 परिवारों में 377 को ही भूमि आवंटित की जा रही हैं। शेष 181 परिवारों का कोई माईबाप नहीं है। नदी कटान से प्रभावित लोगों की मांग है कि उन्हें बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में न बसाया जाए। मौजूदा समय में विस्थापितों को बसाने के लिए जिला प्रशासन ने जो जमीन खरीदी है वह बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में आती हैं। इसलिए वहां के लोग नाराज है। गांव बचाओ आंदोलन समिति की मांग है कि विस्थापित परिवार को राहत दी जाए और उनके पुर्नवास की व्यवस्था हो। साथ ही बीपीएल कार्ड भी जारी किया जाए। इन लोगों की मांग पर सरकार क्या रूख अपनाती हैं यह देखने वाली बात होगी।

 

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