August 20, 2019

गरीबी और जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए विश्वव्यापी वित्तीय प्रणाली को बदलना होगा : यूएन

संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व में साठ से अधिक अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने एक नई रिपोर्ट जारी कर यह चेतावनी दी कि अगर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रणालियों को दुरुस्त नहीं किया गया, तो विश्व के अनेक देशों की सरकारें 2030 तक जलवायु परिवर्तन को काबू करने और गरीबी मिटाने जैसे वादों को पूरा नहीं कर पाएंगी। गौरतलब है कि इन संगठनों में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक समूह और विश्व व्यापार संगठन शामिल हैं।

सतत् विकास हेतु वित्त पोषण पर केंद्रित 2019 की इस रिपोर्ट में अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने कुछ सकारात्मक पहलुओं को भी ​बताया गया है। रिपोर्ट कहती है कि कुछ देशों में इस मद में निवेश बढ़ा है और वे सतत् निवेश में रुचि ले रहे हैं। लगभग 75 प्रतिशत निवेशक इस बात में रुचि प्रदर्शित कर रहे हैं कि उनके निवेश से विश्व पर क्या असर हो रहा है।

हालांकि 2017 में ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन 1.3 प्रतिशत की दर से बढ़ा है, अनेक देशों में निवेश में गिरावट हुई है और 30 विकासशील देशों पर ऋण संकट मंडरा रहा है या उनके ऋणग्रस्त होने की आशंका है। इसके साथ विश्वव्यापी वृद्धि लगभग 3 प्रतिशत होने की उम्मीद है।

रिपोर्ट का कहना है कि सतत् विकास के लिए वित्त पोषण का अर्थ सिर्फ निवेश बढ़ाना ही नहीं है। विश्वव्यापी लक्ष्यों को पूरा करने के लिए सहयोगपरक वित्तीय प्रणालियां और लाभपरक विश्वस्तरीय एवं राष्ट्रीय नीतियां भी जरूरी हैं।

फिर भी रिपोर्ट चेतावनी देती है कि अनुकूल परिस्थितियां बनाना अधिक चुनौतीपूर्ण हो रहा है। तकनीक, भू-राजनीति और जलवायु हमारी अर्थव्यवस्थाओं और समाज का पुनर्निर्माण कर रहे हैं और मौजूदा राष्ट्रीय एवं बहुपक्षीय संस्थान इस परिवर्तन के साथ तालमेल बैठाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इन्हीं की मदद से अरबों लोग गरीबी के गर्त से बाहर निकले हैं। बहुपक्षीय प्रणाली में भरोसा कम हो रहा है, चूंकि उसके परिणामों को समान रूप से वितरित नहीं किया गया। विश्व के अधिकतर लोग ऐसे देशों में बसते हैं जहां असमानताएं बढ़ी हैं।

रिपोर्ट की प्रस्तावना में संयुक्त राष्ट्र महासचिव अंटोनियो गुटेरेश ने कहा है, ‘बहुपक्षीय प्रणाली में भरोसा टूट रहा है क्योंकि हम विश्व के सभी लोगों को समावेशी एवं टिकाऊ विकास का अंग नहीं बना पाए हैं। हम सबके सामने एक ही चुनौती है- अंतरराष्ट्रीय व्यापार एवं वित्तीय प्रणाली को कुछ इस प्रकार तैयार किया जाए कि उससे टिकाऊ विकास और निष्पक्ष भूमंडलीकरण को बढ़ावा मिले।’

रिपोर्ट विभिन्न देशों के लिए एक रोडमैप प्रस्तुत करती है जिसकी मदद से वे सरकारी और निजी वित्तीय प्रणालियों में सुधार करके टिकाऊ निवेश के लिए संसाधन जुटा सकते हैं। रिपोर्ट इन देशों के लिए कुछ उपाय भी सुझाती है ताकि वे अपनी वित्तीय नीतियों को राष्ट्रीय टिकाऊ विकास रणनीतियों और प्राथमिकताओं के अनुकूल बना सकें।

रिपोर्ट जिन अवसरों और चुनौतियों का जिक्र करती है, उनमें से एक है नई तकनीक और फिनटेक (वित्तीय क्षेत्र में डिजिटल नवाचार)। हाल के वर्षों में 50 करोड़ लोगों की पहुंच वित्तीय सेवाओं तक हुई है, इसलिए फिनटेक का आग्रह स्पष्ट है। लेकिन जैसे-जैसे इस क्षेत्र में नई कंपनियां प्रवेश कर रही हैं और वित्तीय बाजार को तेजी से प्रभावित कर रही हैं, विनियामकों को उनके साथ लगातार तालमेल रखने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। चूंकि फिनटेक का महत्व बढ़ रहा है, इसलिए अगर विनियामक संरचना से बाहर की गतिविधियों पर नजर न रखी जाए तो वित्तीय स्थिरता पर संकट आ सकता है।

विनियामक दृष्टिकोण के साथ फिनटेक के वादे को पूरा किया जा सकता है लेकिन इन्हें नए विचारों की कीमत पर लागू नहीं किया जा सकता। इस संबंध में रिपोर्ट कहती है कि फिनटेक कंपनियों, वित्तीय संस्थानों और विनियामकों के बीच बातचीत होनी चाहिए। रिपोर्ट के अनुसार, विनियामकों को वित्तीय गतिविधियों और उनके संभावित संकटों पर ध्यान देना चाहिए, भले ही उससे जुड़ी संस्था किसी भी प्रकृति की हो।

इस रिपोर्ट को आर्थिक एवं सामाजिक मामलों के अवर महासचिव और कार्यबल के अध्यक्ष श्री जेनमिन लियु ने जारी किया। उन्होंने कहा, ‘हमें 2019 में टिकाऊ वित्त पोषण से जुड़ी समस्याओं को दूर करने का अवसर उपलब्ध है। यह विभिन्न देशों की सरकारों की जिम्मेदारी है कि वे बहुपक्षीयता के प्रति दोबारा प्रतिबद्धता जताएं और ऐसी नीतिगत कार्रवाई करें जिनसे टिकाऊ एवं समृद्ध भविष्य का निर्माण हो।’

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